Tuesday, 13 December 2016

विजय विनीत(Vijay Vineet) :साहसिक पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर

विजय विनीत ने उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में आतंकवाद और सांप्रदायिक दंगों की उस समय रिपोर्टिंग की, जब लोग साहसिक रिपोर्टिंग करने के बारे में सोच भी नहीं पाते थे। उन्होंने न सिर्फ  पत्रकारिता को नैतिक स्वर दिया, बल्कि पीड़ित समाज के उत्थान के लिए कई बार अपने जीवन की बाजी भी लगाई। वह न कभी झुके, न टूटे और न कभी हताश हुए। पेशेवर नहीं, एक जिम्मेदार नागरिक की तरह उन्होंने देशप्रेम ही नहीं, सामाजिक दायित्वों को बखूबी निभाया है। सरकार कोई भी रही हो, उसका प्रवक्ता अथवा सुपारी किलर बनकर कभी काम नहीं किया।

बेहद जुझारू, अक्खड़, ठेठ बनारसी पत्रकार विजय हर समय  पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत ‘तटस्थता’ का और पाठकों के प्रति ईमानदारी का मूल्य अदा किया। इनकी रचनाओं में जीवन का मुक्त सच, जीवन का संघर्ष झलकते हैं। देश के किसानों और आम आदमी की विवशता का दर्दनाक चित्रण करना विजय विनीत का प्रिय शगल रहा है। ग्रामीण परिवेश में बदरंग जन-जीवन और कमजोर हो चुकी जिंदगियों को बचाने में, भ्रष्टाचारियों को राष्ट्रवाद और समाजवाद का इंजेक्शन लगाने में कभी पीछे नहीं रहे।

विजय विनीत हमेशा मानते रहे हैं कि पत्रकार खुद खबर नहीं होते, लेकिन समाज उससे एक बुनियादी और ईमानदारी की मांग हमेशा जरूर करता है। पत्रकार के लिए खबर से अधिक अहम कुछ नहीं है, अपनी जिंदगी भी नहीं। वर्ष 2002 में बनारस के ओंकालेश्वर मंदिर परिसर में हुए दंगे में इनके सिर में गंभीर चोटें आईं, फिर भी बुलंद हौसले के साथ खबरें लिखीं।[5]

समाज में लगातार बढ़ती बेईमानी, छल-कपट और सियासी हथकंडों के दौर में भी विजय विनीत कभी न झुके, न टूटे। तमाम अवसर आए जब झूठ के खिलाफ, पाखंड के खिलाफ पूरे दमखम और साहस के साथ कलम की ताकत से लड़े। खासतौर पर समाज के आखिरी के मुद्दों पर किसी खबर को मरने नहीं दिया। चाहे एमसीसी के नक्सलियों के गढ़ रहे नौगढ़ (चंदौली) के कुबराडीह की भुखमरी रही हो या भूख से बिलखती महिलाओं और तड़पते लकड़ी चबाते बच्चों की बेबसी। इनकी बेबसी को अपनी कलम की ताकत देकर तरक्की की नई इबारत लिखी। पत्रकार विजय विनीत के संघर्षों की देन है कि नौगढ़ में अब नक्सली नहीं, कंगाली नहीं-हरियाली है। रूदन के स्थान पर मंगल गीत गाए जा रहे हैं। घर-घर में टीवी है, डिश एंटिना है, कुकर पर भोजन पकता है। साइकिल के बदले मोटरसाइकिल और नंग-धड़ंग बच्चे और अधनंगे बूढ़े अब चमचमाते कपड़ों से लैस हैं। सिर्फ कुबराडीह ही मगन नहीं, मानो समूचा नौगढ़ मुस्कुरा रहा हो।
सिर्फ पूवार्चल ही नहीं, उत्तर प्रदेश उत्तराखंड के तराई इलाकों में जिन रास्तों पर कंक्रीट नहीं ढले थे, जिन छतों को लिंटर नहीं मिला था, जो पैर चमड़े के जूते से दूर थे, जिन हाथों ने कभी घड़ी नहीं पहनी और जो कमजोर आंखें चश्मों के लिए मोहताज़ थे, उनके उत्थान के लिए, उनकी तरक्की के लिए विजय विनीत एक बड़े वेग साबित हुए।

दिल्ली, लखनऊ के तमाम तथाकथित बड़े पत्रकारों के नाम आज भी आधी आबादी के लिए कोई मायने नहीं रखते जिन्हें दो वक्त की रोटी किसी तरह से नसीब हो पाती है, जिन्हें नैसर्गिक न्याय नहीं मिल पाता। 13 जुलाई 1991 को विजय विनीत की एक खोजी रपट ने 25 बरस बाद उन 11 निर्दोष नागरिकों के परिजनों को न्याय दिलाई है जिन्हें पीलीभीत पुलिस ने उग्रवादी बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था। मारे गए सभी सिख तीर्थयात्रा से लौट रहे थे। सीबीआई के विशेष जज लल्लू सिंह ने 29 मार्च 2016 को फैसला सुनाते हुए 47 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

कलम के जादूगर विजय विनीत ने स्वस्थ समाज के लिए आतंकवाद के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ, तमाम बिद्रुपों के खिलाफ अनगिनत रपटें लिखीं। समाज की खुरदरी और विशाल चट्टानों को पिघलाने में कामयाब रहे। कठिन चुनौतियों के बावजूद न कभी झुके, न कभी टूटे...।
बदायूं का दंगा रहा हो अथवा बरेली का। बुलंद हौसले के साथ शोषित समाज के लिए हमेशा लड़ते रहे। पत्रकारिता को हमेशा को आजीविका का साधन नहीं, मिशन माना। यही वजह रही कि उन्होंने न तो कभी मर्यादा के पहाड़ को लांघा और न ही पथरीले रास्तों पर फिसले। सिर्फ दिलेरी ही नहीं, हौसला ही नहीं, अपनी रचनाओं में समाज को बोल-चाल की भाषा ही परोसी।

वरिष्ठ  पत्रकार विजय विनीत को साहसिक पत्रकारिता के लिए कई अवार्ड मिल चुके हैं। इसमें पीपुल्स विजलेंस कमेटी आन ह्यूमन राइट्स (पीवीसीएचआर) एवं ह्यूमन राइट्स ला नेटवर्क (एचआरएलएन) का जनमित्र अवार्ड भी शामिल है। 10 दिसंबर 2013 को दिल्ली के रफी मार्ग स्थित कांस्ट्यूशन क्लब के स्पीकर हाल में इन्हें सम्मानित किया गया।[3]

चंदौली (यूपी) के चकिया प्रखंड के उतरौत गांव में 29 मार्च 1965 को किसान परिवार में जन्मे विजय विनीत के पिता डा.रणवीर सिंह पेशे से शिक्षक और चिकित्सक रहे हैं। वे उन्हें पिता अपनी थाती सौंपना चाहते थे, लेकिन उन्होंने चुना पत्रकारिता का रास्ता। देश के जाने-माने अखबार दैनिक जागरण, अमर उजाला [6] और हिन्दुस्तान में लंबे समय तक साहसिक पत्रकरिता की। मौजूदा समय में वे जनसंदेश टाइम्स के वाराणसी संस्करण में सशक्त रूप से संपादकीय टीम का नेतृत्व कर रहे हैं। दूरदर्शी के नाम से इनका विशेष कालम इन दिनों काफी लोकप्रिय है।[2]

संपर्कः +91-7068509999, +91-9415201470
Email: vijayvineet.vns@gmail.com
वाराणसी,उत्तर प्रदेश
 
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Source: https://www.everipedia.com/8218abca-88e8-415f-bd6c-1de9c76f084b/#ixzz4SjxilIuX

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