Tuesday, 13 December 2016

दिमाग का रासायनिक लोचा नहीं है ‘प्यार’

काशी के एक चिकित्सक का बेहतरीन साक्षात्कार
जाने-माने किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ.संजय गर्ग शहर के ऐसे चिकित्सक हैं जिन्होंने पूर्वांचल में पहली बार किसी मरीज को किडनी ट्रांसप्लांट किया। यह सफल आपरेशन तब किया जब बीएचयू के विशेषज्ञ चिकित्सक भी इस बारे में सोच नहीं पाते थे। 272 मरीजों की किडनी ट्रांसप्लांट करने का रिकार्ड बना चुके डा.गर्ग ने महज 48 साल की उम्र में अपने बूते पर न सिर्फ बड़ा अस्पताल खड़ा किया, बल्कि मेडिकल कालेज से लेकर कई शिक्षण संस्थाएं खोली हैं। वे कभी मंजिल से नहीं भटके। खुद को ‘वर्क अल्कोहलिक’ मानने वाले डा.गर्ग गर्व के साथ कहते हैं कि मेरी ताकत और तरक्की की आधारशिला मेरी पत्नी डा.रितु हैं।
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सीधी बातचीत--------
0 यह है ईश्वर का अनमोल तोहफा जो जीवन को भरता है खुशियों से
0 चाइना का सामान ही नहीं, प्यार के मामले में उनका शोध भी है घटिया
विजय विनीत
वाराणसी। चीन के चिकित्सक ‘प्यार’ को महज दिमाग में होने वाली रासायनिक क्रिया (फेरोमोन्स) मानते हैं,लेकिन शहर के जाने-माने चिकित्सक डा. संजय गर्ग इस शोध से इत्तेफाक नहीं रखते। कहते हैं, ‘प्यार ईश्वर का अनमोल तोहफा है जो जीवन को खुशियों से भर देता है। स्त्री के चेहरे पर चमक, सादगी और आत्मीयता भरी मुस्कान किसी भी इंसान की तरक्की की सीढ़ी बन सकती है। ये तीनों बातें मेरी पत्नी डॉ.रितु गर्ग में है। यही मेरी सफलता का राज है।’
डा.गर्ग के अनुभव, शोध और दावे में दम है। अंग्रेज़ी के जाने-माने साहित्यकार विलियम शेक्सपियर के एक प्रसिद्ध कथन का अगर हिंदी में अनुवाद करें तो हम कहेंगे कि प्यार और खूबसूरती तो देखने वाले की आंखों में होती है। किसी को किसी की आवाज भाती है, तो कोई कजरारे नयनों पर और कोई स्त्रियों की मुस्कान पर ही फिदा हो जाता है। दरअसल यह चायनीज प्यार नहीं, जिसे पेकिंग यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर माओ लिहुआ दिमागी अनुभव के अलावा कुछ नहीं मानते। डा. संजय गर्ग ‘जनसंदेश टाइम्स’ के दफ्तर में आए तो चिकित्सा विज्ञान की बारीकियों पर ढेरों चर्चा की। साथ ही अपनी निजी जिंदगी के कई राज भी खोले। चीनी के चिकित्सकों के शोध पर तंज कसते हुए डा.संजय गर्ग कहते हैं, ‘सिर्फ चीन का सामान ही नहीं, वहां के चिकित्सकों का शोध और सोच भी घटिया है। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं कि प्यार में जरूरत होती है धैर्य की,सहनशीलता की, जज्बे की और पति-पत्नी की भावनाओं को अच्छी तरह समझने की।’
पत्नी डा.रितु से बेपनाह मुहब्बत करने वाले डा.गर्ग बेबाकी के साथ कहते हैं, ‘प्यार को दिमागी लोचा मानने वाले चीनी चिकित्सकों की पत्नियां अगर उन्हें भारतीय महिलाओं की तरह स्नेह और समर्पण का सुखद एहसास कराएं तो प्यार पर उनका शोध व नजरिया दोनों बदल जाएगा। डा.रितु को ही लें,यदा-कदा सार्वजनिक तौर पर मैं उनपर तीखे और झनझनाते सवाल भी दागता हूं, लेकिन वह कभी रिएक्ट नहीं करतीं। आंखों में भले ही आंसू होते हैं, लेकिन चेहरे पर होती है मीठी मुस्कान। ठीक वैसी ही, जैसे मेडिकल की पढ़ाई के दौरान पहली बार मिली थीं, उन पर रीझीं थीं। तब से आज तक न तो उनका व्यवहार बदला और न बातचीत का अनोखा अंदाज। न तो उन्होंने कभी गहनों की फरमाइश की और न ही कोई ऐसा तोहफा मांगा जिसके लिए कभी ताना मारने की जरूरत पड़े। बेमेल कुंडली के बावजूद मैने डा.रितु से शादी की और सफलता की सीढ़ी चढ़ता गया।’ दरअसल डा.संजय गर्ग का स्त्रियों की स्वतंत्रता को लेकर विचार काफी उदारवादी है। ये मानते हैं कि परिजन सहयोग दें तो स्त्रियां हर रोज तरक्की का नया आयाम रच सकती हैं।
इनसेट-----
क्या है ‘प्यार’ पर चीन का नया शोध
वाराणसी। पेकिंग विवि के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर माओ लिहुआ के हालिया शोध के मुताबिक किसी के प्रति आकर्षित होने पर तंत्रिका तंत्र के जरिए फेरोमोन्स दिमाग में पहुंचकर पीयुष ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन के स्राव को बढ़ाते हैं। इससे दिल की धड़कन तेज हो जाती है और बढ़ जाती है सांसों की गति। इंसान इसे प्यार मान बैठता है,जबकि यह एक रासायनिक क्रिया है और कुछ नहीं।

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