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इन दिनों-----
दूरदर्शी के एक मित्र हैं। स्वभाव से थोड़े विचित्र हैं। पहले वह काशी के पार्षदों से चिढ़ते थे। मिलने पर खरी-खोटी सुनाते थे। इन दिनों उनपर प्यार बरसा रहे हैं। दरअसल जिस रोज पार्षदों का जत्था सैर-सपाटे पर रवाना हुआ उसी दिन उनकी गोद हरी हुई। मतलब उनकी पत्नीश्री ने बेटे को जन्म दिया। मित्र को लग रहा है जैसे समूचे काशी की सूनी गोद हरी-भरी हो गई हो...। तभी से वे इठला रहे हैं। उन्हें जो भी बधाई देने जा रहा है उससे कह रहे हैं, ‘नगर निगम की तरह सालों बाद हमारा आंगन गुलजार हुआ है। दुआ करो कि बेटे का भाग्य काशी के पार्षद जैसा हो..। वह भी जनता के पैसे से फोकट में सैर-सपाटे पर जाए...। फ्लाइट में सेल्फी-सेल्फी खेले...। होटलों में ईलू...ईलू...गुनगुनाए।’
दूरदर्शी को लग रहा है कि वाकई काशी के पाषर्दों के भाग्य बुलंद हैं। हजारों लोग बाढ़ में घिरे हैं। रो रहे हैं, दाना-पानी के लिए बिलख रहे हैं। पार्षदों को देखिए मुफ्त में सैर कर रहे हैं। होटलों में मचल रहे हैं। कोच्चि से कन्याकुमारी तक मस्ती ही मस्ती...। सेल्फी ही सेल्फी...। हैं न भाग्यवान, कलयुगी दीपिका जैसी सीता मैया की तरह। देखा नहीं, वनवास जाने की बजाए वह कैसे संसद में पहुंच गईं।
दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरु चचा ने जब से सुना है कि जनता के पैसे से काशी के पार्षद सैर-सपाटे पर निकले हैं तब से वह कुढ़ रहे हैं। उनका पोर-पोर उदास है। रोम-रोम में गुस्सा है। कहते हैं, ‘वे जब एमएलसी के चुनाव में बिके थे, तब उतनी कोफ्त नहीं हुई, लेकिन अब हो रही है। बाढ़ से घिरे लोग खून के आंसू रो रहे हैं। सबकी नींद हराम है। पार्षद फ्लाइटों और होटलों में मौज ले रहे हैं...। अरे भाई, सैर-सपाटा करने के बजाए कुछ दिन बाढ़ में फंसे लोगों के आंसू पोछ लेते तो जनता उनसे घर-द्वार थोड़े ही मांग लेती। अब कौन सुनेगा जनता का दुख-दर्द...? कौन संवारेगा काशी को...? कौन दिलाएगा पुलिस उत्पीड़न से छुटकारा...?’
दूरदर्शी ने मंगरू चचा को समझाया, ‘अब कुढ़ने से क्या फायदा। काशी के पार्षदों ने न रामराज लाने का ठेका ले रखा है, न काशी को क्योटो बनाने का। चुनाव के समय वोटर भी तो बिके थे। जनता बिकेगी... तो पार्षद भी बिकेंगे। अब काहे की कोफ्त। उन्हें सैर-सपाटा करने दीजिए। बाढ़ से घिरे लोगों की धमनियों में खून अभी खौल रहा है। जब ठंडा होगा तो लोग फिर उन पर लट्टू हो जाएंगे...।’
दूरदर्शी की बात सुनकर मंगरू चचा निरुत्तर हो गए। उन्हें लगा कि इन दिनों एक हठीले नाग से पार्षद ज्यादा खतरनाक होता है। नाग जब काटता है तो एक व्यक्ति की मौत होती है। पार्षद जब सैर-सपाटे पर जाता है तो सैकड़ों लोग यूं ही मर जाते हैं। कोई सीवर के पानी से मरता है, कोई बाढ़ में मरता है।
दूरदर्शी ने मंगरू चचा को ढांढस दिलाया और कहा, ‘पार्षद का मतलब ढोल का पोल। उनके लकलकाते कुर्ते को देख नगर निगम के अफसर सिर्फ प्रभावित होने का ढोंग करते हैं, मगर होते नहीं। भला उनकी सुनता ही कौन है? क्या पार्षदों का दिल घूमने के लिए नहीं मचलता? मेयर क्योटो घूम सकते हैं तो वे सैर क्यों नहीं कर सकते? मेयर जापान से सीखकर क्या लाए? काशी की जनता को न बजबजाते नाला-नालियों से निजात दिला पाए, न कूड़े के पहाड़ से। आखिर जनता पार्षदों से ही क्यों उम्मीद करती है। उनकी भी मजबूरियां होती हैं। दायरा सीमित होता है। चाहते हैं कुछ और होता है कुछ और। फिर करेक्टर कोई स्थायी चीज थोड़े ही है। वह तो आनी-जानी है। आज है कल नहीं। स्थायी चीज है पार्षदजी की मुस्कुराहट। उनकी सेल्फी, उनका सैर-सपाटा। जहां तक जनता के बाढ़ से घिरे होने का सवाल है तो लोगों को वोट देने से पहले ही सोच लेना चाहिए था कि पार्षद उनके बनिहार नहीं है...चौकीदार नहीं हैं...।’
‘चौकीदार चोर को देखकर चिल्लाता है, जबकि पार्षद जनता के धन से सैर-सपाटा करने की जिम्मेदारी निभाता है। चौकीदार घूम-घूमकर पहरा देता है, पार्षद मिनी सदन में चीखने का प्रहसन करता है, कुर्सी तोड़ता है। चौकीदार वफादार होता है, पार्षद दगाबाज। यानि चौकीदार लाठी है, तो पार्षद सांप। मंगरू चचा समझ गए आप।’
और अंत में....
सच्चे शब्दों में सच के अहसास लिखेंगे,
वक्त पढ़े जिसको कुछ इतना खास लिखेंगे।
गीत-गजल हम पर लिखेंगे, लिखने वाले,
दूरदर्शी ने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे।।
इन दिनों-----
दूरदर्शी के एक मित्र हैं। स्वभाव से थोड़े विचित्र हैं। पहले वह काशी के पार्षदों से चिढ़ते थे। मिलने पर खरी-खोटी सुनाते थे। इन दिनों उनपर प्यार बरसा रहे हैं। दरअसल जिस रोज पार्षदों का जत्था सैर-सपाटे पर रवाना हुआ उसी दिन उनकी गोद हरी हुई। मतलब उनकी पत्नीश्री ने बेटे को जन्म दिया। मित्र को लग रहा है जैसे समूचे काशी की सूनी गोद हरी-भरी हो गई हो...। तभी से वे इठला रहे हैं। उन्हें जो भी बधाई देने जा रहा है उससे कह रहे हैं, ‘नगर निगम की तरह सालों बाद हमारा आंगन गुलजार हुआ है। दुआ करो कि बेटे का भाग्य काशी के पार्षद जैसा हो..। वह भी जनता के पैसे से फोकट में सैर-सपाटे पर जाए...। फ्लाइट में सेल्फी-सेल्फी खेले...। होटलों में ईलू...ईलू...गुनगुनाए।’
दूरदर्शी को लग रहा है कि वाकई काशी के पाषर्दों के भाग्य बुलंद हैं। हजारों लोग बाढ़ में घिरे हैं। रो रहे हैं, दाना-पानी के लिए बिलख रहे हैं। पार्षदों को देखिए मुफ्त में सैर कर रहे हैं। होटलों में मचल रहे हैं। कोच्चि से कन्याकुमारी तक मस्ती ही मस्ती...। सेल्फी ही सेल्फी...। हैं न भाग्यवान, कलयुगी दीपिका जैसी सीता मैया की तरह। देखा नहीं, वनवास जाने की बजाए वह कैसे संसद में पहुंच गईं।
दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरु चचा ने जब से सुना है कि जनता के पैसे से काशी के पार्षद सैर-सपाटे पर निकले हैं तब से वह कुढ़ रहे हैं। उनका पोर-पोर उदास है। रोम-रोम में गुस्सा है। कहते हैं, ‘वे जब एमएलसी के चुनाव में बिके थे, तब उतनी कोफ्त नहीं हुई, लेकिन अब हो रही है। बाढ़ से घिरे लोग खून के आंसू रो रहे हैं। सबकी नींद हराम है। पार्षद फ्लाइटों और होटलों में मौज ले रहे हैं...। अरे भाई, सैर-सपाटा करने के बजाए कुछ दिन बाढ़ में फंसे लोगों के आंसू पोछ लेते तो जनता उनसे घर-द्वार थोड़े ही मांग लेती। अब कौन सुनेगा जनता का दुख-दर्द...? कौन संवारेगा काशी को...? कौन दिलाएगा पुलिस उत्पीड़न से छुटकारा...?’
दूरदर्शी ने मंगरू चचा को समझाया, ‘अब कुढ़ने से क्या फायदा। काशी के पार्षदों ने न रामराज लाने का ठेका ले रखा है, न काशी को क्योटो बनाने का। चुनाव के समय वोटर भी तो बिके थे। जनता बिकेगी... तो पार्षद भी बिकेंगे। अब काहे की कोफ्त। उन्हें सैर-सपाटा करने दीजिए। बाढ़ से घिरे लोगों की धमनियों में खून अभी खौल रहा है। जब ठंडा होगा तो लोग फिर उन पर लट्टू हो जाएंगे...।’
दूरदर्शी की बात सुनकर मंगरू चचा निरुत्तर हो गए। उन्हें लगा कि इन दिनों एक हठीले नाग से पार्षद ज्यादा खतरनाक होता है। नाग जब काटता है तो एक व्यक्ति की मौत होती है। पार्षद जब सैर-सपाटे पर जाता है तो सैकड़ों लोग यूं ही मर जाते हैं। कोई सीवर के पानी से मरता है, कोई बाढ़ में मरता है।
दूरदर्शी ने मंगरू चचा को ढांढस दिलाया और कहा, ‘पार्षद का मतलब ढोल का पोल। उनके लकलकाते कुर्ते को देख नगर निगम के अफसर सिर्फ प्रभावित होने का ढोंग करते हैं, मगर होते नहीं। भला उनकी सुनता ही कौन है? क्या पार्षदों का दिल घूमने के लिए नहीं मचलता? मेयर क्योटो घूम सकते हैं तो वे सैर क्यों नहीं कर सकते? मेयर जापान से सीखकर क्या लाए? काशी की जनता को न बजबजाते नाला-नालियों से निजात दिला पाए, न कूड़े के पहाड़ से। आखिर जनता पार्षदों से ही क्यों उम्मीद करती है। उनकी भी मजबूरियां होती हैं। दायरा सीमित होता है। चाहते हैं कुछ और होता है कुछ और। फिर करेक्टर कोई स्थायी चीज थोड़े ही है। वह तो आनी-जानी है। आज है कल नहीं। स्थायी चीज है पार्षदजी की मुस्कुराहट। उनकी सेल्फी, उनका सैर-सपाटा। जहां तक जनता के बाढ़ से घिरे होने का सवाल है तो लोगों को वोट देने से पहले ही सोच लेना चाहिए था कि पार्षद उनके बनिहार नहीं है...चौकीदार नहीं हैं...।’
‘चौकीदार चोर को देखकर चिल्लाता है, जबकि पार्षद जनता के धन से सैर-सपाटा करने की जिम्मेदारी निभाता है। चौकीदार घूम-घूमकर पहरा देता है, पार्षद मिनी सदन में चीखने का प्रहसन करता है, कुर्सी तोड़ता है। चौकीदार वफादार होता है, पार्षद दगाबाज। यानि चौकीदार लाठी है, तो पार्षद सांप। मंगरू चचा समझ गए आप।’
और अंत में....
सच्चे शब्दों में सच के अहसास लिखेंगे,
वक्त पढ़े जिसको कुछ इतना खास लिखेंगे।
गीत-गजल हम पर लिखेंगे, लिखने वाले,
दूरदर्शी ने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे।।

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