Tuesday, 13 December 2016

माई डियर रावण... हैपी दशहरा...!

माई डियर रावण... हैपी दशहरा...!

इन दिनों.....
हे कालजयी दशानन, तुम वाकई महान हो। जब तुम्हारे पुतले में इतना आकर्षण, इतनी चमक और इतनी ताकत है तो तुम्हारी महानता पर संदेह करना, घोर नर्क के दरवाजे खटखटना नहीं तो और क्या है? अब अपने शहर को लीजिए। यहां तुम्हारे सैकड़ों प्रतिरूप बनाए गए हैं। तुम्हारी काया को ज्यादा सुदर्शन, ऊंची और भयानक बनाने की होड़ में किसी ने तुम्हारे सिर्फ एक सिर बनाए तो किसी ने दस। बनारस के डीरेका में, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के मैदान में तुम हर साल जलाए जाते हो। लोग तुम्हें हजारों साल से मार रहे हैं फिर भी तुम हर साल जी उठते हो।
हे दशानन, तुम्हारे रंग बदलने की कला से दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरु चचा भी परेशान हैं। मैं भी हतप्रभ हूं कि तुम हर साल खुशी-खुशी मरते हो। अगले साल फिर पैदा हो जाते हो। पहले से ज्यादा कलरफुल और सोर्सफुल होकर।
दूरदर्शी की तल्ख टिप्पणी सुनकर रावण बोला, सत्य की असत्य पर विजय का प्रतीक अब झूठा होता जा रहा है। मैं थक गया हूं नरलीला खेलते-खेलते। इन दिनों काशी में हमारे तमाम हमशक्ल पैदा हो गए हैं। सबको निमंत्रण देने के लिए मुझे भी मोबाइल की जरुरत पड़ने लगी है। एक नहीं, मुझे दस-दस मोबाइल चाहिए। दूरदर्शी, तुम मुझे लोन पर मोबाइल दिला दो। दशहरे का सीजन है। आफर सीमित है। सोचता हूं क्यों न लाभ उठा लूं।
दूरदर्शी ने रावण ने समझाया, मोबाइल लेने से पहले कुछ गूढ़ बातें समझ लो। मोबाइल के बिल में कई तरह के टैक्स जुड़े होते हैं। काल का चार्ज, सवाल का चार्ज, सर्विस टैक्स, सर्विस टैक्स पर सेस, सेस पर फिर सर्विस टैक्स, फिर सर्विस टैक्स पर इनकम टैक्स, फिर इनकम टैक्स पर काल चार्ज वगैरह-वगैरह...।
हे दशानन, मोबाइल लेने से पहले अपने चेहरे का मेकओवर करो। देखते नहीं, टीवी में, सिनेमा में पुरुषों को गोरा बनाने वाली क्रीम आ गई है। इन दिनों दसों मुंह के लिए स्पेशल पैकेज आफर हैं। मोबाइल के साथ-साथ क्रीम के फाइनेंस की सुविधा भी है। बस तुम्हें सोने का अपना वह महल गिरवी रखना होगा, जिसमें तुम सीताजी को ले जाना चाहते थे। दशानन, तुम्हारे सामने हजारों आप्शन हैं। चुनाव तुम्हें करना है। बिल अदा न करने पर सर्कस में नाचना होगा। जनता मजा लेगी और पैसे भी देगी।
दूरदर्शी की बात सुनकर रावण की आंखों से नीर झरने लगा। बोला, हर कोई मुझे घृणा की नजर से देखता है। हर कोई कोसता है कि मैने राम की पत्नी का अपहरण किया, लेकिन क्या लोगों को याद नहीं, उन्होंने बस जरा-सी बात पर मेरी सुंदर बहन शूर्पनखा की नाक लक्ष्मण से कटवाई थी। तब हमारे यहां अदालतें नहीं थीं, जहां मैं बहन की नाक काटने का प्रकरण लेकर जाता।
मैने तो सीताजी का अपहरण करने के बाद उन्हें पूरा सम्मान दिया। छुआ तक नहीं। कलयुग में कोई एक ऐसा नेता बताओ जिसने किसी महिला का अपहरण करने के बाद उससे दुर्व्यवहार न किया हो, मनमानी न की हो। दूरदर्शीजी मैं चाहता हूं कि आप अपने नेताओं को बताओ कि असल में रावण का अर्थ है क्या? अगर किसी को रावण की उपमा दी जाए तो उसकी औकात क्या होनी चाहिए? आप नेताओं को बताएं कि वे अकारण मेरी उपमा एक-दूसरे को न दें। अपनी औकात में रहें। संस्कृति को समझें। कोई मेरे जैसा दिखे, तभी वे मेरी उपमा दें...।
और अंत में...
दशहरे आते रहें, दीप जलाते रहें
हम आपको, आप हमें याद आते रहें।
जब तक जिंदगी है, दुआ है हमारी,
आप चांद की तरह जगमगाते रहें।
0 दूरदर्शी

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