सोनम गुप्ता! जान पर बन आई, ये तेरी बेवफाईhttps://www.facebook.com/vijay.vineet.9/posts/1254468261258341
इन दिनों-----
काशी में हर साल गाजी मियां की शादी होती है और टूट जाती है। पहले समाज की बंदिशें टूटती थीं। रवायतें टूटती थीं। सर्द रातों में ताले टूटते थे। तिजोरियां टूटती थीं। एटीएम टूटते थे। कानून व्यवस्था टूटती थी। धारा-144 टूटती थी। पुलिस की बैरिकेडिंग टूटती थीं। काशी में अब गुल्लक टूट रहे हैं। आपसी भाईचारा और एकता टूट रही है। अगर कुछ नहीं टूट रहा है तो लोगों का धैर्य।
नगद नारायण के लिए एटीएम और बैंकों पर लगी लाइन नहीं टूट रही है। जहां ‘नो कैश’ के बोर्ड झिलमिला रहे हैं, वहां भी तड़पतीं मछलियां बेहोशी की लाइन में लगी हैं। देश के सारे तालाब सूख गए हैं, मगर ‘काले घड़ियालों’ को पकड़ने के लिए अपने ‘पंत प्रधान’ की ललकार नहीं टूट रही है। देश को ‘कैशलेस’ बनाने के लिए उनकी ‘डिजिटली हुंकार’ नहीं टूट रही है...।
काशी में लाइन लगाने का चलन तब से बढ़ा है जब से पांच सौ और एक हजार के नोट ‘लाइन हाजिर’ हुए हैं। तेलियाबाग में आमने-सामने लंबी लाइन लग रही है। एक ओर सिनेमाहाल में ‘लतखोर’ फिल्म देखने के लिए और उसके ठीक सामने बैंक आॅफ इंडिया में ‘गुलाबी दोहजारी’ के लिए। लगता है कि काशी के लोगों को लाइन में लगने की आदत सी हो चली है। फोकट वाला जीओ सिम या कोई नई फिल्म हो... तो खिड़की पर लंबी लाइन। स्कूल में लाडले का एडमिशन हो या एक्जाम के फार्म के लिए लाइन। राशन-पानी हो या पेट्रोल की लाइन। हर जगह लाइन का अनुशासन बरकरार है। जो लोग पहले भूख से मरते थे और अब लाइन में मर रहे हैं।
दूरदर्शी को याद है कि बनारस पहले गाता-बजाता था। मेले करता था। जितना फक्कड़ था, उतना ही झक्कड़ था। लड़ता था और लड़ाता भी था। अब लाइन में नगद नारायण के लिए लड़ रहा है। पड़ोसी मंगरू चचा ने पूछा, ‘काशी की महान परंपरा और मर्यादा क्यों टूट रही है?’ हमने कहा, यह पंत प्रधान की ‘कैशलेस’ और ‘डिजिटली लीला’ है। दीगर बात है कि काशी में कभी ‘लीलने’ की परंपरा नहीं रही।
बनारसी चौचक माल ‘चाभने’ का शौकीन रहा है। भांग छानने और ठंडई पीने का शौकीन रहा है। मगही, देसी, जगन्नाथी, कलकतिया, सांची पान का लुक्मा घुलाने का शौकीन रहा है। थोड़ा सा कत्था, तनी सा चूना, एक डाली सोपाड़ी, एक चुटकी सुरती, जरा सी पिपरमिंट, थोड़ा सा किमाम और चार दाना लाची खाने के बाद बिना छलकाए बोलने का उस्ताद रहा है। दिव्य बूटी गटकने के बाद ‘गुरु’ का सर्टिफिकेट देने और मूड़ी हिलाकर महान विचारक की तरह ‘राय’ फरमाने का शौकीन रहा है।
दूरदरर्शी ने सुना है कि अपने ‘पंत प्रधान’ के पास नायाब ‘जमालगोटा’ है, जिसे खाकर समूची इंडिया चार्टर्ड अकाउंटेंट और बैंकर्स के यहां भाग रही है। जिन्हें लोग साल में एकाध बार भी दुआ-सलाम नहीं करते थे वे अचानक दुलारे बन बैठे हैं। हर कोई उनसे रिश्ते गांठने में जुटा है। जमालगोटे का असर यह है ‘चिकनगुनिया’ का प्रकोप कम हो गया है। नई बीमारी ‘नोटगुनिया’ तेजी से फैल रही है।
‘नोटगुनिया’ को ढूंढा है बनारसी कवि ओम धीरज के बलियाटिक मित्र डा.राजेश मिश्र ने। दूरदर्शी ने उनसे जानना चाहा कि आखिर ‘नोटगुनिया’ बेकाबू क्यों होती जा रही है? जवाब मिला, ‘यह सोनम गुप्ता की ‘बेवफाई’ का असर है।’ अजीबो-गरीब है यह बीमारी और उसका लक्षण। मुंह लटकाकर जाड़े में ‘कठुआते’ हुए एटीएम और बैंकों के सामने तंबू गाड़ देना...। दिन भर सोनम गुप्ता की बेवफाई के गीत गुनगुनाना...। नोट बदलने के नियम बार-बार देखना... । कैशलेस लेन-देने के तौर-तरीकों की जानकारी हासिल करना...। बिना विषय की समझ के एक्सपर्ट की तरह बकबकाना। झूठा ज्ञान बघारना। यह जताने की कोशिश करना कि अंदर की बात सिर्फ उसे ही मालूम है...।
कवि ओम धीरज इन दिनों अपनी कविताओं में ‘नोटगुनिया’ का दर्द छलका रहे हैं। काशी के लोगों को वह ‘धीरज’ रखने का दिलासा दिला रहे हैं। बीमारी की मुश्किलों से जनता को रूबरू करा रहे हैं। ‘नोटगुनिया’ का शर्तिया इलाज बता रहे हैं। चंगा होने की तरकीब सिखा रहे हैं। ‘नोटगुनिया’ से निजात दिलाने के लिए हंसना और रोना सिखा रहे हैं...।
दूरदर्शी को लगता है कि ‘नोटगुनिया’ सिर्फ शहरी बीमारी नहीं। यह गांवों में भी तेजी से पांव पसार रही है। पोलियो, प्लेग, चेचक, हैजा जैसी संक्रामक बीमारियों के फैलने पर इल्जाम पहले सरकार के सिर पर जाता था। पंत प्रधान के भक्त अब कन्नी काट रहे हैं। ‘नोटगुनिया’ सरकार फैला रही है, यह कहने में सकुचा रहे हैं। भक्त हैं कि सोनम गुप्ता की ‘बेवफाई’ न हजम कर पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं...।
और अंत में....
दिल के जख्मों को छुपाना पड़ रहा है
पलकें भीगीं, पर मुस्कुराना पड़ रहा है।
कैसे उलट गए हैं जमाने के ये रिवाज
रूठना था, पर उनको मनाना पड़ रहा है।
० दूरदर्शी
इन दिनों-----
काशी में हर साल गाजी मियां की शादी होती है और टूट जाती है। पहले समाज की बंदिशें टूटती थीं। रवायतें टूटती थीं। सर्द रातों में ताले टूटते थे। तिजोरियां टूटती थीं। एटीएम टूटते थे। कानून व्यवस्था टूटती थी। धारा-144 टूटती थी। पुलिस की बैरिकेडिंग टूटती थीं। काशी में अब गुल्लक टूट रहे हैं। आपसी भाईचारा और एकता टूट रही है। अगर कुछ नहीं टूट रहा है तो लोगों का धैर्य।
नगद नारायण के लिए एटीएम और बैंकों पर लगी लाइन नहीं टूट रही है। जहां ‘नो कैश’ के बोर्ड झिलमिला रहे हैं, वहां भी तड़पतीं मछलियां बेहोशी की लाइन में लगी हैं। देश के सारे तालाब सूख गए हैं, मगर ‘काले घड़ियालों’ को पकड़ने के लिए अपने ‘पंत प्रधान’ की ललकार नहीं टूट रही है। देश को ‘कैशलेस’ बनाने के लिए उनकी ‘डिजिटली हुंकार’ नहीं टूट रही है...।
काशी में लाइन लगाने का चलन तब से बढ़ा है जब से पांच सौ और एक हजार के नोट ‘लाइन हाजिर’ हुए हैं। तेलियाबाग में आमने-सामने लंबी लाइन लग रही है। एक ओर सिनेमाहाल में ‘लतखोर’ फिल्म देखने के लिए और उसके ठीक सामने बैंक आॅफ इंडिया में ‘गुलाबी दोहजारी’ के लिए। लगता है कि काशी के लोगों को लाइन में लगने की आदत सी हो चली है। फोकट वाला जीओ सिम या कोई नई फिल्म हो... तो खिड़की पर लंबी लाइन। स्कूल में लाडले का एडमिशन हो या एक्जाम के फार्म के लिए लाइन। राशन-पानी हो या पेट्रोल की लाइन। हर जगह लाइन का अनुशासन बरकरार है। जो लोग पहले भूख से मरते थे और अब लाइन में मर रहे हैं।
दूरदर्शी को याद है कि बनारस पहले गाता-बजाता था। मेले करता था। जितना फक्कड़ था, उतना ही झक्कड़ था। लड़ता था और लड़ाता भी था। अब लाइन में नगद नारायण के लिए लड़ रहा है। पड़ोसी मंगरू चचा ने पूछा, ‘काशी की महान परंपरा और मर्यादा क्यों टूट रही है?’ हमने कहा, यह पंत प्रधान की ‘कैशलेस’ और ‘डिजिटली लीला’ है। दीगर बात है कि काशी में कभी ‘लीलने’ की परंपरा नहीं रही।
बनारसी चौचक माल ‘चाभने’ का शौकीन रहा है। भांग छानने और ठंडई पीने का शौकीन रहा है। मगही, देसी, जगन्नाथी, कलकतिया, सांची पान का लुक्मा घुलाने का शौकीन रहा है। थोड़ा सा कत्था, तनी सा चूना, एक डाली सोपाड़ी, एक चुटकी सुरती, जरा सी पिपरमिंट, थोड़ा सा किमाम और चार दाना लाची खाने के बाद बिना छलकाए बोलने का उस्ताद रहा है। दिव्य बूटी गटकने के बाद ‘गुरु’ का सर्टिफिकेट देने और मूड़ी हिलाकर महान विचारक की तरह ‘राय’ फरमाने का शौकीन रहा है।
दूरदरर्शी ने सुना है कि अपने ‘पंत प्रधान’ के पास नायाब ‘जमालगोटा’ है, जिसे खाकर समूची इंडिया चार्टर्ड अकाउंटेंट और बैंकर्स के यहां भाग रही है। जिन्हें लोग साल में एकाध बार भी दुआ-सलाम नहीं करते थे वे अचानक दुलारे बन बैठे हैं। हर कोई उनसे रिश्ते गांठने में जुटा है। जमालगोटे का असर यह है ‘चिकनगुनिया’ का प्रकोप कम हो गया है। नई बीमारी ‘नोटगुनिया’ तेजी से फैल रही है।
‘नोटगुनिया’ को ढूंढा है बनारसी कवि ओम धीरज के बलियाटिक मित्र डा.राजेश मिश्र ने। दूरदर्शी ने उनसे जानना चाहा कि आखिर ‘नोटगुनिया’ बेकाबू क्यों होती जा रही है? जवाब मिला, ‘यह सोनम गुप्ता की ‘बेवफाई’ का असर है।’ अजीबो-गरीब है यह बीमारी और उसका लक्षण। मुंह लटकाकर जाड़े में ‘कठुआते’ हुए एटीएम और बैंकों के सामने तंबू गाड़ देना...। दिन भर सोनम गुप्ता की बेवफाई के गीत गुनगुनाना...। नोट बदलने के नियम बार-बार देखना... । कैशलेस लेन-देने के तौर-तरीकों की जानकारी हासिल करना...। बिना विषय की समझ के एक्सपर्ट की तरह बकबकाना। झूठा ज्ञान बघारना। यह जताने की कोशिश करना कि अंदर की बात सिर्फ उसे ही मालूम है...।
कवि ओम धीरज इन दिनों अपनी कविताओं में ‘नोटगुनिया’ का दर्द छलका रहे हैं। काशी के लोगों को वह ‘धीरज’ रखने का दिलासा दिला रहे हैं। बीमारी की मुश्किलों से जनता को रूबरू करा रहे हैं। ‘नोटगुनिया’ का शर्तिया इलाज बता रहे हैं। चंगा होने की तरकीब सिखा रहे हैं। ‘नोटगुनिया’ से निजात दिलाने के लिए हंसना और रोना सिखा रहे हैं...।
दूरदर्शी को लगता है कि ‘नोटगुनिया’ सिर्फ शहरी बीमारी नहीं। यह गांवों में भी तेजी से पांव पसार रही है। पोलियो, प्लेग, चेचक, हैजा जैसी संक्रामक बीमारियों के फैलने पर इल्जाम पहले सरकार के सिर पर जाता था। पंत प्रधान के भक्त अब कन्नी काट रहे हैं। ‘नोटगुनिया’ सरकार फैला रही है, यह कहने में सकुचा रहे हैं। भक्त हैं कि सोनम गुप्ता की ‘बेवफाई’ न हजम कर पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं...।
और अंत में....
दिल के जख्मों को छुपाना पड़ रहा है
पलकें भीगीं, पर मुस्कुराना पड़ रहा है।
कैसे उलट गए हैं जमाने के ये रिवाज
रूठना था, पर उनको मनाना पड़ रहा है।
० दूरदर्शी

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