Tuesday, 13 December 2016

ये बलमा बेईमान हमें पटियाने आए हैं...!

ये बलमा बेईमान हमें पटियाने आए हैं...!

इन दिनों-------
काशी के लोगों को अब दूल्हे और बरातों से चिढ़ होने लगी है। लगता है कि अब दूल्हों का कोई ईमान रहा ही नहीं। चुनाव महोत्सव की घोषणा बाकी है। इससे पहले ही कई दूल्हे अकड़ रहे हैं। नए दूल्हे तो कम हैं। खूसट और खड़ूस ज्यादा हैं। एक से बढ़कर एक। खिजाब पोते चेहरों वाले दूल्हों की मासूम मुस्कान तो कमाल की है। 
दूल्होें की गोड़धरिया से पड़ोसी मंगरू चचा आजिज आ गए हैं। कुछ रोज पहले ही दूरदर्शी से पूछा कि सेहरे की लड़ियों में चुनाव घोषणा-पत्र सजाए तमाम दूल्हों को घोड़ियों का अभी से इंतजार क्यों है? नई बारातों के जो दूल्हे हैं वे इस कदर फड़क रहे हैं जैसे ‘चट मंगनी, चट ब्याह’ होने वाला है। शहर के सभी सरकारी-गैरसरकारी अस्पताल डेंगू के मरीजों से खचाखच भरे हैं। हजारों लोग बुखार से तप रहे हैं। तीमारदार प्लेटलेट के लिए दौड़ रहे हैं। आखिर इन दूल्हों को ये बेबस और परेशान लोग क्यों नजर नहीं आते? 
दूरदर्शी ने मंगरू चचा को बताया कि इन दिनों ज्यादातर दूल्हे आश्वासनों की बंदनवार तले ढकोसलेबाजी के मंगलघट सजा रखे हैं। इनमें कुछ रतौंधी के शिकार हैं, कुछ जनता रूपी दूल्हनों को बेवा करने में माहिर हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो कब्र में पैर लटकाए हुए हैं। फिर भी लालायित हैं कि परमपिता परमात्मा की असीम अनुकंपा मिले तो कुंवारी कन्या की मांग में सिंदूर डाल दें। 
शहर की पुरानी दूल्हनें आंचल भर-भरकर कोस रही हैं, ‘मुआ हमें छोड़कर नई बहुरिया लाने चला है। इस सहालग में बजा ले शहनाई नासपीटे... जमानत जब्त नहीं करा दी तो कहना। पिछली दफा कैसे चाव से शादी रचाई और गोद भरने से पहले दूसरे पर डोरे डालने लगा...।’
दूरदर्शी को इन दिनों किसिम-किसिम के दूल्हों से मिलने का मौका मिल रहा हैं। कुछ मिलते हैं कलफदार पोशाक में तो कुछ अपने शरीर को मजार सरीखा गुंबदनुमा सजाए। इत्र-फुलेल लगाए ये दूल्हे खबरचियों को देखते ही अपनी औकात बताने लगते हैं। 
चश्मा लपेटे और ठोढ़ी पर चवन्नी भर दाढ़ी उगाए एक दूल्हे से दूरदर्शी ने पूछा, ‘क्या-क्या दहेज है? मतलब चुनावी वायदे।’
जवाब मिला, ‘यह क्या होता है? क्या घुड़चढ़ी और पहला गौना आने की कोई रस्म है क्या?’
‘पिछली दफा आप फलनवां पार्टी... के कैंडिडेट नहीं थे क्या? इस पर वह अकबकाने लगे।’
दूरदर्शी ने कहा, ‘आप धन्य हैं ढेकनवा पार्टी से छुट्टा-छुट्टी के बाद नई नवेली दूल्हन लाने जा रहे हैं। सुहागरात में इरादा क्या है?’
दूरदर्शी की बात सुनकर लजाए और खींस निपोरते हुए दांत से नाखून कुतरने लगे। कुछ देर बाद बोले, ‘धत्त आप भी कमाल के हैं। दूरदर्शी हैं और ऐसी-वैसी बात करते हैं। आपकी शादी नहीं हुई क्या जो भोले बन रहे हैं...।’
दूरदर्शी ने कहा, ‘मेरी और आपकी शादी में फर्क है। मैं तो ठहरा खबरची। आप हैं कि कोई भी सुघड़ कन्या (पार्टी) देखते ही लार टपकाने लगते हैं। देश भर में तीन तलाक पर बहस चल रही है। और आप हैं कि तलाक पर तलाक दिए जा रहे हैं। तलाक और सगाई का कोई मौका छोड़ते ही नहीं। 
दूरदर्शी की बात सुनते ही दूल्हे मियां गुस्सा गए और बात काटकर बोले, ‘घोबी का कुत्ता न घर का होता है और न घाट का। मौका मिलता है तो कभी साइकिल पर सवार हो जाते हैं और कभी हाथी पर। जब कोई नहीं मिलता तो बाजार से बिकाऊ दूल्हनें खरीद लाते हैं...।’
एक रोज मंगरू चचा ने राजनीतिक दूल्हों की जोड़ियों पर राय पूछी तो दूरदर्शी ने बताया कि जनता जिनकी बरातों में बैंडबाजों पर... और ढोल-ताशों पर... नाचती है...झूमती है...ठहाके लगाती है...वे उन्हें पूरे पांच साल तक विश्वास के साथ चुगते हैं। कम से कम अपने काशी की परंपरा तो यही रही है। वरना डेंगू से, दिमागी बुखार से, पीलिया से अपने शहर के लोग यूं ही बेमौत नहीं मरते। पीएम नरेंद्र मोदी जब शहर को ‘आक्सीजन’ नहीं दे पा रहे हैं तो खाली ‘सिलेंडर’ लेकर घूमने वाले क्या देंगे? 
राजनीतिक बारातों के दूल्हों को देखकर दूरदर्शी को कई तरह के कटु अनुभव हुए हैं। पिछले चुनाव में काशी के लोग राम, रोटी और अच्छे दिन पर मोहित हुए थे। अबकी उनके नकाब भी उतरने लगे हैं। दूरदर्शी शायर के शब्दों में गुनगुना रहा है- 
‘वे लोग बने बैठे हैं, इस शहर के मुंसिफ,
जिन लोगों ने किश्तों में हमें कत्ल किया है।’
वैसे भी चुनावी बारात कोई कुंभ का मेला नहीं, जो बारह बरस से पहले आएगा ही नहीं। कल की ही तो बात है, दूरदर्शी को घर छोड़ने ई-रिक्शा वाला आया। नाम था कल्लन। पूछा, अबकी वोट किसको दोगे? हलक का सारा बलगम एक झटके में गले से बाहर डिपाजिट करते हुए बोला-
‘ये बलमा बेईमान हमें पटियाने आए हैं।
अबकी चांदी के जूते से जुतियाने आए हैं।।’
0 दूरदर्शी

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