इन दिनों------
बनारस के गली-कूचों में, मोहल्लों-चौबारों में, चाय-पान की अड़ियों और हजामत बनाने वालों में जब से चाचा-भतीजे की चर्चा ने जोर पकड़ी है तब से तेलियाबाग में सिनेमाघर पर हुजूम जुट रहा है। सिनेमाघर के मालिक पर बड़ा दबाव है। रिक्शावाले, ठेलावाले, सब्जीवाले, मोची और पल्लेदारों की डिमांड है कि इन दिनों ‘चाचा-भतीजा’ फिल्म दिखाएं। वे भी ‘बुरे काम का बुरा नतीजा, क्यों भई चाचा.., हां भतीजा... गुनगुनाएं...।’
दूरदर्शी ने सुना है कि इन दिनों ये गाना लखनऊ में झमझमा रहा है। गाना इतना झक्कास है कि समूचे यूपी के लोग ‘दाद’ दे रहे हैं। मनोरंजन के लिए कोई शिवपाल को सराह रहा है, कोई अमर को। कुछ लोग मुलायम और अखिलेश के कसीदे पढ़ रहे हैं। जूते की ताल पर बज रहा यह फिल्मी गाना काशी के लोगों को भी दीवाना बना रहा है।
बुजुर्गवार पड़ोसी मंगरू चचा घर आए तो उन्होंने भी ‘चाचा-भतीजा’ राग छेड़ दिया। बोले, ‘दूरदर्शी तुमने बहुत फिल्म देखी होगी, लेकिन ‘चाचा-भतीजा’ जैसी नहीं। इसके सभी एक्टर समाजवादी कुनबे के हैं। जो बाहरी हैं, वे मुलायमवादी है। शायद अखिलेश को सत्ता जाने का डर है। इसलिए वह चाहते हैं कि सभी पात्र खुद तय करें। मगर शिवपाल हैं कि मानते ही नहीं।’
जब से चाचा-भतीजे में जंग शुरू हुई है तब से दूरदर्शी को महाभारत काल याद आ रहा है। उस समय भी कौरवों-पांडवों के कुनबे में भीषण युद्ध हुआ था। तब फसाद की जड़ में थे गांधारी के भाई शकुनी। अबकी मुलायम के कुनबे में, घर में, पार्टी में जूतम-पैजार हो रही है तो शकुनी का रोल अदा कर रहे हैं अमर सिंह। यह दूरदर्शी नहीं, मुलायम के भाई रामगोपाल कह रहे हैं। वे बेहद भयभीत हैं। उन्हें लग रहा है कि अमर सिंह अब समर सिंह बन बैठे हैं। कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते। जिन लोगों ने उन्हें अपमानित कर पार्टी से निकलवाया था, शकुनी की तरह वह भी उन्हें बरबाद करके छोड़ेंगे।
लखनऊ से सैफई तक अखिलेश-शिवपाल समर्थकों में चल रही लट्ठ से मगरू चचा दहल गए हैं। वह इस बात से आहत हैं कि अखिलेश एक ओर विपक्षी दलों से लड़ रहे हैं तो दूसरी ओर, अपने कुनबे से। अब उनके समर्थक भी आपस में जूतम-पैजार कर रहे हैं। यह सब कब तक चलेगा? आखिर चाल और चरित्र भी कोई चीज होती है?
दूरदर्शी ने कहा, ‘राजनीति और चरित्र का परस्पर मेल कैसा? ये दो अलग-अलग ध्रुवों की भिन्न विचारधाराएं हैं! असली नेता वही है जो जिस थाली में खाए, उसी में छेद करे। सपाइयों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए। उनके पास मल्ल-युद्ध का पुराना अनुभव है। वे आपस में निपट लेंगे। रही बात मुलायम की तो उनकी महिमा विचित्र है। बड़े-बड़े नेता और समाजवादी कहते हैं कि उनकी भक्ति के बिना उनको समझा नहीं जा सकता। भक्ति के बाद भी उन्हें कोई जान ले इसकी गारंटी नहीं है। वह ऐसे समाजवादी हैं जो शायद ही किसी को जीवन भर साथ लेकर चले हों। देखा नहीं, विहार चुनाव में उन्होंने नीतीश-लालू को कैसा झटका दिया? कभी माया से दोस्ती गांठी तो कभी ममता से। मौका आया तो वामपंथियों को, कांग्रेसियों को, कल्याण को, अजित को किनारे करने में तनिक संकोच नहीं किया।’
पिछली दफा सपा सत्ता में आई थी, तब भी चाचा-भतीजे में ‘टशन’ हुई थी। उस समय मुलायम की आंखों पर पुत्र मोह की पट्टी बंधी थी। अब उतर गई है। इन दिनों भाई के साथ खड़े हैं। लोग-बाग कह रहे हैं कि उन्हें डर सता रहा है कि अगर पार्टी और सरकार, अखिलेश के कब्जे में रही तो वे शिवपाल को, उनके बीवी-बेटे को दूध की मक्खी की तरह बाहर फेंक सकते हैं। डर मुलायम को ही नहीं, शिवपाल को भी है, उनकी बीवी और बेटे को भी है। लोग-बाग कहते हैं कि इस्तीफा बम में लुत्ती मुलायमवादी अमर सिंह के अलावा उनकी पत्नी और बेटे ने लगाई थी।
मुलायम इन दिनों अपने कुनबे की पंचायत में मशगूल हैं तो राहुल बाबा खाट सभा और मूढ़ा पंचायत में। काशी के ज्योतिषी नेताओं का भाग्य बांचने में जुटे हैं। शिवपाल पर राहू और अखिलेश पर केतु का प्रकोप बता रहे हैं। ज्योतिषीय गणना से निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि ये युद्ध विराम स्थायी नहीं, तात्कालिक है। वर्चस्व की ये लड़ाई बड़े युद्ध का आगाज है। मुलायम के कुनबे का झगड़ा काशी के लोगों को मजा दे रहा है। जहां देखिए, दो पक्ष मंचासीन होकर खम ठोकते नजर आते हैं।
लड़ाई सड़क पर है, लेकिन मुलायम का कुनबा दुहाई दे रहा है कि मीडिया को चाचा-भतीजा का घर झांकने की आदत सी पड़ गई है। कहते हैं, ‘यह तो मीडिया ही है, जो हमें लड़ाए जा रहा है। इन दिनों जो कुछ हो रहा है वह समाजवादी सत्ता-विमर्श है। दूरदर्शी को पता है कि जिस पार्टी में कुनबा सर्वोपरि होता है, वहां थालियां खनकती ही हैं। मुद्दा चाहे माफिया को समाजवादी बनाने का हो अथवा मंत्रियों की बर्खास्तगी का।’
और अंत में....
तमन्ना जब किसी की नाकाम होती है,
जिंदगी उसकी एक उदास शाम होती है।
दिल के साथ दौलत ना हो जिसके पास,
मोहब्बत उस गरीब की नीलाम होती है।।
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