Tuesday, 13 December 2016

बनारस में दुनिया का अनूठा कवि सम्मेलन

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भांग, पान और ठंडाई की जुगलबंदी के साथ अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़बाजी के रंगों में घुली बनारसी होली की बात ही निराली है। फागुन का सुहानापन बनारस की होली में ऐसी जीवंतता भरता है कि फिजा में रंगों का बखूबी अहसास होता है। फाल्गुनी बयार में किसी को रंगे बिना नहीं छोड़ने वाली काशी की होली ही नहीं, गालियां भी नायाब होती हैं। दुनिया की सांस्कृतिक राजधानी में होली के दिन शाम को टाउनहाल मैदान (मैदागिन) में अनूठा कवि सम्मेलन होता है, जिसमें जुटते हैं बड़ी संख्या में शहर के गण्यमान्य नागरिक और काव्य प्रेमी। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां सिर्फ गालियों की कविता पढ़ी जाती है, जिसमें होता है व्यग्य का पुट। यहां श्रोताओं को कोई रचना उत्तम नहीं लगती तो हूट नहीं करते, बल्कि बनारसी अंदाज में कहते हैं भाग-भाग भोसड़ी के...।
बाबा विश्वनाथ की नगरी में 1980 में इस अनूठे कवि सम्मेलन की शुरुआत की थी मशहूर कवि चकाचक बनारसी ने। पहले यह सम्मेलन अस्सी पर होता था। चकाचक के निधन के बाद पिछले 21 साल से टाउनहाल में यह सम्मेलन हो रहा है। इस कवि सम्मलेन में हास्य रचनाएं पढ़ने वाले कवि भाषा की सभी वर्जनाओं को खुला छोड़ देते हैं। कविता की मुख्य धारा से उनका कोई सीधा संबंध नहीं होता। देश का कोई मंत्री हो या संतरी, भारत की सरकार हो या अमेरिका की, बनारस के कलेक्टर हों या पुलिस कप्तान। यहां गालियों की बौछार से सबकी बखिया उधेड़ी जाती है। हंसी-मजाक के बीच संस्कृति, समाज और राष्ट्र की मौजूदा गतिविधियों पर तंज कसते हुए उससे रूबरू कराया जाता है। गाली से पिरोई गई रचनाओं पर बनारस के लोग खूब झूमते हैं और ठहाके लगाते हैं। भांग-ठंडई के सुरूर और अबीर-गुलाल की रंगीनियत के बीच अल्हड़पन अंदाज में हास्य कविताओं का ऐसा दौर शुरू होता है कि शाम से आधी रात कब हो जाती है, किसी को पता ही नहीं चलता। होली के दिन काशी में गालियां शुभ मानी जाती हैं और इससे किसी को परहेज भी नहीं होता। इस सम्मेलन में पढ़ी गई कविताओं का एक संकलन भी निकलता है जिसे हर कोई पढ़ना चाहता है, लेकिन घर में रखना कोई नहीं चाहता।
मित्रों के विशेष आग्रह पर अनूठे कवि सम्मेलन में इस साल मैने भी शिरकत की। जैसे कवि थे, श्रोता भी उनसे उन्नीस नहीं थे। हर कोई गाली को सम्मान देता नजर आया। अश्लीता के सवाल पर चकाचक बनारसी को अपना गुरु बताने वाले मंच संचालक बद्री विशाल का तर्क था कि यह मंच साहित्य परोशने के लिए नहीं, सामाजिक और राजनीतिक सच को बेबाकी के साथ उधेड़ने के लिए है। गालियां सिर्फ बेहूदगी और फूहड़पन का पर्याय नहीं। पूर्वांचल में शादी-विवाह जैसे अवसरों पर महिलाएं भी गालियों की बैछार करती हैं, जिसे शुभकर माना जाता है। समाज कोई भी हो गाली अपना स्थान खुद ही तलाश लेती है...।

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