Tuesday, 13 December 2016

हमें ‘स्मार्ट’ बनाने आवेंगे 22 अरब

हमें ‘स्मार्ट’ बनाने आवेंगे 22 अरब
इन दिनों--------------
दूरदर्शी ने जब से सुना है कि अपने शहर को ‘स्मार्ट’ बनाने के लिए 22 अरब आवेंगे तब से दिल बाग-बाग कर रहा है। एक दशक पहले भी दिल धड़का था, जब प्यासे शहर और पानी निकासी के लिए अरबों रुपये आए थे। कुछ ही सालों में सारा का सारा धन साफ हो गया। शहर तब भी प्यासा था और अब भी है। फर्क इतना है कि पहले सरकारी नलों से सीवर मिला पानी आता था, अब साथ में केंचुए, गोजर और सांप के बच्चे भी आते हैं। 
जिस रोज काशी को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा हुई, उसके अगले दिन मंगरू चचा सूट-बूट पहनकर दूरदर्शी के घर आए। अंदाज कुछ ऐसा था मानों द्वारपूजा के लिए दूल्हा निकलता है। दूरदर्शी कभी मंगरू चचा के सूट-बूट को, तो कभी उनकी स्मार्टनेस को देख रहा था। कुछ पूछता इससे पहले ही चचा बोले, हम ‘स्मार्ट’ बनने वाले हैं। सोचा क्योंं न अभी से ‘स्मार्ट’ बनने का प्रैक्टिस शुरू कर दें। 
दूरदर्शी ने मंगरू चचा को याद दिलाया कि एक दशक पहले जेएनएनयूआरएम योजना से काशी में अरबों रुपये आए थे तब अफसरों ने सिंगापुर से लेकर होनोलूलू तक खूब हवाई सैर की थी। शासन-प्रशासन जब-जब अपने शहर को प्रगति के पथ पर अग्रसर दिखाता है तब-तब दूरदर्शी को ‘मुफ्त का चंदन, घिस मेरे नंदन’ की याद आती है। अनुभवी अफसर सरकारी चंदन घिसने में बेमिसाल दरियादिली दिखाते हैं। जब जेएनएनयूआरएम का सारा धन लील गए तो स्मार्ट सिटी में क्या रखा है। नौकरशाही सरकार को दिखा देगी कि उसका रोपा हुआ पौधा आज कितना बड़ा वटवृक्ष बन चुका है। भ्रष्टाचार का वह पौधा इन दिनों कितना पूज्यनीय और महान है। सरकारी धन से बनी पानी की टंकियां खड़ी हैं। कुछ वैसे ही, जैसे लखनऊ में मिर्जापुरी पत्थरों से हाथियां बनकर तनी हैं। 
दूरदर्शी को लगता है कि इन दिनों भ्रष्टाचार का युग धर्म है। इसको अपनाने का मर्म सिर्फ नौकरशाही ही समझती है। सालों-साल से जमे अफसर धार्मिक नगरी काशी में धर्म निरपेक्षता के साथ शानदार ढंग से भ्रष्टाचार धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। पुराने हुक्मरानों ने जो परंपराएं स्थापित की थीं, उस पथ पर तेजी से बढ़ रहे हैं। काशी के लोग भले ही संतुष्ट न हों, पर नेता-परेता खुश हैं। दूरदर्शी ने सुना है कि स्मार्ट सिटी के लिए पुरानी परंपरा के वारिसों की तलाश शुरू हो गई है। ऐसे धृतराष्ट्रों को भी खोजा जा रहा है जो भ्रष्टाचार की पटकथा लिखने में माहिर हों। 
दूरदर्शी का तर्क सुनने के बाद मंगरू चचा को भी लगने लगा कि अपनी काशी में अफसर और नेता ही भ्रष्टाचार के मीठे फल खाते हैं। जनता तो सूखी गुठलियों के लिए भी ललचती है। भ्रष्टाचार की चाशनी जितनी नौकरशाही को भाती है, उतनी नेताओं की रातें भी रंगीन बनाती है। दूरदर्शी को दोनों ‘लक्ष्मी’ और ‘सरस्वती’ नजर आते हैं, जो हर समय चमत्कार दिखाते हैं। 
दूरदर्शी ने सुना है कि काशी में ईमानदारी के नश्वर शरीर के नीचे भ्रष्टाचार पलता है, जो हर किसी की उज्जवल आत्मा को छलता है। स्मार्ट बनाने का जिम्मा जिन लोगों के कंधे पर है, वे भला भ्रष्टाचार की मिठास कैसे छोड़ पाएंगे। कटी पतंग की डोर हाथ आने पर भला किसी ने तोड़ी है या छोड़ी है, जो स्मार्ट सिटी की डोर छोड़ दें।
पुछल्ला...
पानी पिलाने के बहाने लूटिए, पानी निकलवाने के लिए लूटिए। टंकी बनवाने के लिए लूटिए। पुल टूटे तो लूटिए, सड़क बने तब भी लूटिए। बारिश में बह चुकी सड़कों के गड्ढों को भरने से पहले अपने पेट का गड्ढा भरिए। ईमानदारी से गड्ढे भर गए तो पेट का गड्ढा कैसे भर पाएगा? छाती मत कूटिए, जमकर लूटिए। दीया चाटनेवाला नहीं, दीमक बनिए। जो मिले सब कुछ चट कर जाइए। काशी का हर नागरिक तुम्हारा इंतजार कर रहा है। शूरवीर की तरह आगे बढ़ो। काशी की बेबस जनता के खून-पसीने की कमाई को चूसने की परंपरा का निर्वाह करो। लूट की परंपरा को कैश करके ऐश करो। काशी को स्मार्ट बनाना है। जिसके पास कुछ नहीं, उसे भी लूटो। स्मार्ट सिटी का बंपर धमाका निकला है, जिसके इनामी ड्रा में चूक गए तो ताउम्र पछताओगे। 
और अंत में----
काशी की कचौड़ी गली से मेरा जनाजा निकला
पर वो न निकले जिनके लिए जनाजा निकला।
उनका घर आते ही लोग-बाग सीटी बजाने लगे
रख मेरा जनाजा स्मार्ट सिटी का गुण गाने लगे।।
0 दूरदर्शीhttps://www.facebook.com/vijay.vineet.9/posts/1182943701744131

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