Tuesday, 13 December 2016

काशी में कुर्सियों पर कब्जे की संस्कृति

काशी में कुर्सियों पर कब्जे की संस्कृति

इन दिनों-------
‘रगड़ा क्लब’ में अपने लगुआ-भगुआ को कुर्सी पर बैठाने के लिए बधाई बीरू भाई। अपने चहेतों को उपकृत करने के लिए आपने वही तरीका अपनाया, जो गुलामी के दिनों में ब्रितानी हुकूमत के नुमाइंदे अपनाया करते थे। क्लब के मोह में... वहां की सुरा-सुंदरी में... आप इतने मदहोश हो जाएंगे, यह काशी को पता नहीं था। अब लोगों को लगने लगा है कि दुनिया पर शासन करने वाले अंग्रेजों से भी आप ज्यादा कुटिल, होशियार और मजबूत हैं। जनरल डायर की क्या औकात रही होगी। बनारस में ‘रगड़ा क्लब’ बनाने वाला रहा होगा कोई अंग्रेज अफसर, उसकी ऐसी की तैसी। आपका कोई क्या बिगाड़ लेगा। फिलहाल चुनाव आयोग तो आपके साथ है ही। चुनावी काम-धाम चल रहा है, तब तक कोई माई का लाल आपको हटा नहीं पाएगा। फिर डरना क्या? बता दीजिए सबकी औकात।
इन दिनों काशी में एक ही बात की चर्चा है कि आपने ‘रगड़ा क्लब’ में अपने चहेतों को कुर्सी पर बैठाने के लिए एक नामी डाक्टर के खिलाफ एफआईआर तक करा दी। नर्सिंग होम पर ताला लगवा दिया। आखिर कच्ची गोलियां थोड़ी ही खेली हैं। अनुभव भी कोई चीज होती है। आपने सपा के नगर उपाध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी को धूल चटा दी तो डाक्टर-वाक्टर की क्या औकात। फटे बांस में पैर फंसाने की आपकी अदा को सलाम...। फिर अनुभवी और परिपक्व खिलाड़ी की यह विशेषता होती है कि वह हमेशा को वर्तमान को ही ध्यान रखता है। वह भूत और भविष्य की चिंता नहीं करता।
दूरदर्शी को याद है कि पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैतालीस से पहले अपने देश में अंग्रेजों का राज था। फिर कांग्रेस राज आया जो धीरे-धीरे खानदान राज में बदल गया। देसाई राज, चरणराज, वीपी राज, चंद्रशेखर राज आया, वह भी जनता को रास नहीं आया। ठीक इसी तरह काशी में दूरदर्शी ने नेताराज, गुंडाराज, डंडाराज देखे हैं, मगर अब बीरूराज देख रहा है।
दूरदर्शी को याद है कि काशी में जब-जब कोई ‘घाघ’ आदमी किसी कुर्सी की ओर देखता है वह थरथराने लगती है। जहां कुर्सी को छुआ, वहीं उसका दम निकल निकलने लगता है। कुर्सी आखिर कुर्सी है। कोई हिमालय तो है नहीं जो बड़ी-बड़ी तोंद वालों के कुंटलों वजन से भी न दबे और न चिपके। कुर्सी कोई मेयर-पार्षद की नहीं, जिसपर किसी बात का असर न हो।
मंगरू चचा ने एक दिन पूछा कि काशी में कुर्सी कब्जाने की नई संस्कृति क्या गुल खिलाएगी? दूरदर्शी ने चचा को समझाया कि वह जितनी बड़ी होती है उस पर बैठने और बैठाने वाला उतना बड़ा जालिम होता है। बैठते ही सैर-सपाटे पर निकल जाता है। कभी क्योटो, कभी केरल, कभी ऊंटी...। तब काशी और इस शहर के वासी उसे याद ही नहीं रहते। कुर्सी से हटते ही उसे शहर ही नहीं, पूरे देश के लिए खदबदाहट मचने लगती है। कुर्सी के चक्कर में, कई बार कुर्सी को भी चक्कर आने लगता है। कुर्सी अक्सर बदनाम होती है। गेहूं के साथ घुन की तरह पिसती है। कोई जालिम नेता उसकी ओर देखता है तो उसकी हुलिया बैरंग हो जाती है। कुर्सी की बेबसी पर विचार करने लगा, तो आंखें गीली हो गईं। बेचारी कितना सहती है, फिर भी हंसमुख और जवान बनी रहती है।
काशी के माहमहिम तुम धन्य हो। तुम्हारा काम धन्य है। तुम कुर्सी प्रेमियों के प्रेरणा हो। अभी तो बहुत सारी कुर्सियां बची हैं। उन पर भी बैठो। न बैठ सको तो अपने लगुओं-भगुओं को बैठाओ। भड़वा क्लब...जलवा क्लब.. हलुवा क्लब... फलनवां क्लब... डेकनवां क्लब...की कुर्सियां खाली हैं। चेले-चपाटी न मिलें तो मक्खन सिंह की तरह बाहरी लोगों को आयात कर लो। काशी के लोगों का ध्यान बंटा रहेगा तो न सड़क-बिजली का रोना रोएंगे, न सीवर-सफाई का...।
कुर्सी पुराण सुनकर मंगरू चचा ने कहा, ‘कृष्ण-कन्हैया’ की ‘कसम’ खाकर कहता हूं। ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’ बीरू भाई पहले ‘प्यार का देवता’ था। सुरा-सुंदरी के मोह और अपने चेले-चपाटियों को उपकृत करने के चक्कर में इंसानियत का दुश्मन बन गया। ‘गंगा की सौगंध’ खाकर कहता हूं कि अब ‘बगावत’ करूंगा...।
दूरदर्शी ने मंगरू चचा को सलाह दी कि अगर विधायकी चाहिए, ‘रगड़ा क्लब’ की कुर्सी चाहिए, लूट की छूट चाहिए तो बीरू भाई की चरण-वंदना कीजिए। देखा नहीं, किसी अंग्रेज अफसर ने भी ऐसा अत्याचार, अनाचार, कदाचार न किया होगा। ऐसा हाहाकार न मचा होगा। अबकी ‘रगड़ा क्लब’ का झगड़ा ठलुआ क्लब को भी नया संदेश दे गया।
विरोधियों को किनारे लगाकर बीरू भाई ने बड़ा संकेत दिया है। इस संकेत को समझने वाले बीरू भाई को समझ रहे हैं। जो न समझें वह अनाड़ी हैं। मतलब साफ, बीरू भाई के इशारे पर पुलिस किसी पर भी चार सौ बीस का मुकदमा दर्ज कर लेगी। बाद में भूख और प्यास भी रोकेगी। काला दिवस मनाने पर अड़े साधु-संतों की तरह नरजबंद कर देगी। कुर्सी चाहे ‘रगड़ा क्लब’ की हो या ‘अगर-मगर एसोसिएशन’ की। जो बीरू भाई को खुश नहीं रखेगा, वह कुर्सी नहीं पाएगा। अलबत्ता बीरू भाई बार-बार ढिंढोरा जरूर पीटेंगे। जनता का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जाएगा...बर्दाश्त नहीं किया जाएगा...बर्दाश्त नहीं किया जाएगा...।
और अंत में...
जिनसे हम उम्मीद करते थे संवारेंगे इसे/कर गए मुल्क को वो लोग ही चौपट मियां।
पीढ़ियों को कौन समझाएगा कल पूछेंगी जब/लाज क्या होती है, क्या चीज है घूंघट मियां।।
0 दूरदर्शी

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