Monday, 2 January 2017

Tuesday, 13 December 2016

काशी की संस्कृति में कलाकारों ने भरा आस्था का रंग

राजनीति का गलियारा नहीं मेरी जिंदगी का पड़ाव

कशी की तालियाँ कलाकारो को बनाती है विश्वविख्यात

मानवता के लिए धड़कता है पारुल का दिल

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जिंदा है इंसानियत---
0 भारतीय मूल की महिला जला रही शिक्षा और मानवाधिकार की लौ
0 मानवाधिकार चर्चा का नहीं, आचरण का विषय, अनिवार्य हो शिक्षा
0 पारुल की प्रेरणा से तमाम लड़कियां मलाला बनने का रखती हैं इरादा 
विजय विनीत
वाराणसी। स्वीडन की जानी-मानी अधिवक्ता पारुल शर्मा बनारस में एक ऐसी शमा जला रही हैं जिसकी लौ भुखमरी, कुपोषण और मानवाधिकार हनन रफ्ता-रफ्ता खत्म होता जा रहा है। पिछले डेढ़ दशक चल रही है यह मुहिम। इरादे नेक हैं, इसलिए कामयाबी भी मिली है। जिन मलिन बस्तियों के बच्चे क..ख...ग...घ... नहीं जानते थे वे अब अंग्रेजी के जुमले बोलते हैं। इनकी प्रेरणा और सहयोग से सैकड़ों लड़कियां कालेज जाती हैं। पारुल के दिल में भारत के गरीब और निरक्षर लोगों के लिए हर वक्त खदबदाहट मची रहती हैं। यही खदबदाहट इन्हें बनारस खींच लाती है। दरअसल इनका दिल मानवता के लिए धड़कता है। वह जब भी काशी आती हैं तो रख जाती हैं इंसानियत की ऐसी आधारशिला रख जाती हैं जिसकी मिसाल देश में कहीं देखने को नहीं मिलती। इस बार वह शहर की उन अभावग्रस्त छात्राओं को साइकिल वितरित करेंगी, जिन्हें स्कूल-कालेज पहुंचने के लिए रोजाना जद्दोजहद करनी पड़ती है। 
भारतीय मूल की पारुल शर्मा स्वीडन के स्टाकहोम में जानी-मानी अधिवक्ता हैं। मानवाधिकार के लिए जंग लड़ती हैं। न्याय के मंदिरों में और आम जनता के बीच भी। बनारस के आयर मुसहर बस्ती हो या सोनभद्र की घसिया बस्ती। यहां लोग बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज थे। इनकी चिंता न तो सरकार को थी, न ही सुनहरे •ाविष्य का ख्वाब दिखाकर वोट हासिल करने वाले नेताओं को। पारुल की मदद से दोनों गांवों में पंप हाउस और पानी की टंकियां हैं। अनेई की दलित बस्ती में पेयजल की मुश्किलें दूर करने जा रही हैं। पारुल शर्मा की मुहिम का नतीजा है कि शहर की बघवानाला बस्ती की लड़कियां स्कूल-कालेजों में पढ़ रही हैं। इन्होंने यहां शिक्षा ही नहीं, प्रेरणा-आदर्श की ऐसी सशक्त मिसाल पेश की है जिससे इस बस्ती की सभी बेटियां मलाला की तरह अपने देश का नाम रौशन करने का इरादा रखती हैं। ये बेटियां उन लोगों की हैं जिन्हें इलाके के लोग पहले शराबी और नशेड़ी के रूप में जानते थे। पारुल ने जिले के दर्जन भर आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों को खेलने के लिए झूला भी दिया है। पीवीसीएचआर से सहयोग से मानवीयता के लिए शुरू की गई इनकी मुहिम अब रंग लाने लगी है। 
पारुल शर्मा ने मानवाधिकार के लिए पारुल जयपुर, दिल्ली में भी भूख के खिलाफ जेहाद छेड़ा है। ये फियान की स्वीडन चेप्टर की अध्यक्ष हैं। यह संस्था पूरी दुनिया में भोजन अधिकार की मुहिम चला रही है। पारुल कहती हैं, जब तक भूख-प्यास और अमानवीयता के खिलाफ जंग में हमारी जीत नहीं हो जाती तब तक मानवाधिकार का हनन होता रहेगा। अधिवक्ता पारुल शर्मा स्वीडन से काशी आईं तो जनसंदेश टाइम्स के दफ्तर में अपने विचारों को साझा किया। इनकी रुचि देश-दुनिया में होने वाली सामाजिक और मानवता से जुड़ी बातों में है। वह अपना प्रचार नहीं चाहतीं। कहती हैं, मानवाधिकार चर्चा का नहीं, आचरण का विषय है। दुनिया भर में मानवाधिकार पर बहस और चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन जरूरतमंदों को फायदा पहुंचाने की बात आती है लच्छेदार बात करने वाले भाग खड़े होते हैं। मानवाधिकार का सबसे बड़े दुश्मन वे लोग हैं जो सिर्फ ढोल पीटते हैं। गरीबों के श्रम और संपदा का शोषण करते हैं। देशों की प्राकृतिक संपदा पर नजरें गड़ाए रहते हैं। पूंजी अपने आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में बुराई है। आज दुनिया में सिर्फ खुद को बेहतर दिखाने और बर्चस्व की जंग मची है। मानवाधिकार सभी के लिए समान होता है, लेकिन वास्तव में इसका फायदा उसे ही मिल पाता है जिसे या तो इसकी जाकारी हो या कोई संसाधन। सुश्री शर्मा मानती हैं कि भारत में मानवाधिकार व्यक्ति की हैसियत देखकर मिलता है। वह इसे गलत और शर्मनाक मानती हैं। कहती हैं कि मानावाधिकार का हनन उन्हीं इलाकों में अधिक होता है जहां साक्षरता का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है। बताती हैं कि मेरे पिता शशिकांत शर्मा इंजीनियर हैं। मां शिक्षिक हैं। स्विडिश इंग्लिश और सोशल साइंस पढ़ाती हैं। पंजाब के जालंधर के मूल निवासी हैं। •ाले ही हम स्वीडन में बस गए हैं, लेकिन हिन्दुस्तान की संस्कृति, सभ्यता, तीज-त्योहार हर पल याद आता है। पंद्रह साल की उम्र से भारत आ रही हूं। कानून की दोहरी डिग्री ली है (डबल एलएसएम)। मानवाधिकार हनन रोकने के लिए अपने जीवन सदुपयोग करना चाहती हूं। यही मेरे जीवन का मकसद है। इस मुहिम को गति देने के लिए मैने स्टाकहोम में पीपुल्स मूवमेंट संस्था गठित की है, जिससे दो सौ से अधिक लोग जुड़े हैं। पारुल शर्मा अब तक चार पुस्तकें लिख चुकी हैं। इनकी पुस्तक ह्यूमन राइट्स आफ इंडिया काफी चर्चित हुई है। इनका मानना है कि जीवन में हर चीज का बैलेंस होना चाहिए।

किसानो की आँखों में आंसुओं की धुंध

दिमाग का रासायनिक लोचा नहीं है ‘प्यार’

काशी के एक चिकित्सक का बेहतरीन साक्षात्कार
जाने-माने किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ.संजय गर्ग शहर के ऐसे चिकित्सक हैं जिन्होंने पूर्वांचल में पहली बार किसी मरीज को किडनी ट्रांसप्लांट किया। यह सफल आपरेशन तब किया जब बीएचयू के विशेषज्ञ चिकित्सक भी इस बारे में सोच नहीं पाते थे। 272 मरीजों की किडनी ट्रांसप्लांट करने का रिकार्ड बना चुके डा.गर्ग ने महज 48 साल की उम्र में अपने बूते पर न सिर्फ बड़ा अस्पताल खड़ा किया, बल्कि मेडिकल कालेज से लेकर कई शिक्षण संस्थाएं खोली हैं। वे कभी मंजिल से नहीं भटके। खुद को ‘वर्क अल्कोहलिक’ मानने वाले डा.गर्ग गर्व के साथ कहते हैं कि मेरी ताकत और तरक्की की आधारशिला मेरी पत्नी डा.रितु हैं।
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सीधी बातचीत--------
0 यह है ईश्वर का अनमोल तोहफा जो जीवन को भरता है खुशियों से
0 चाइना का सामान ही नहीं, प्यार के मामले में उनका शोध भी है घटिया
विजय विनीत
वाराणसी। चीन के चिकित्सक ‘प्यार’ को महज दिमाग में होने वाली रासायनिक क्रिया (फेरोमोन्स) मानते हैं,लेकिन शहर के जाने-माने चिकित्सक डा. संजय गर्ग इस शोध से इत्तेफाक नहीं रखते। कहते हैं, ‘प्यार ईश्वर का अनमोल तोहफा है जो जीवन को खुशियों से भर देता है। स्त्री के चेहरे पर चमक, सादगी और आत्मीयता भरी मुस्कान किसी भी इंसान की तरक्की की सीढ़ी बन सकती है। ये तीनों बातें मेरी पत्नी डॉ.रितु गर्ग में है। यही मेरी सफलता का राज है।’
डा.गर्ग के अनुभव, शोध और दावे में दम है। अंग्रेज़ी के जाने-माने साहित्यकार विलियम शेक्सपियर के एक प्रसिद्ध कथन का अगर हिंदी में अनुवाद करें तो हम कहेंगे कि प्यार और खूबसूरती तो देखने वाले की आंखों में होती है। किसी को किसी की आवाज भाती है, तो कोई कजरारे नयनों पर और कोई स्त्रियों की मुस्कान पर ही फिदा हो जाता है। दरअसल यह चायनीज प्यार नहीं, जिसे पेकिंग यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर माओ लिहुआ दिमागी अनुभव के अलावा कुछ नहीं मानते। डा. संजय गर्ग ‘जनसंदेश टाइम्स’ के दफ्तर में आए तो चिकित्सा विज्ञान की बारीकियों पर ढेरों चर्चा की। साथ ही अपनी निजी जिंदगी के कई राज भी खोले। चीनी के चिकित्सकों के शोध पर तंज कसते हुए डा.संजय गर्ग कहते हैं, ‘सिर्फ चीन का सामान ही नहीं, वहां के चिकित्सकों का शोध और सोच भी घटिया है। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं कि प्यार में जरूरत होती है धैर्य की,सहनशीलता की, जज्बे की और पति-पत्नी की भावनाओं को अच्छी तरह समझने की।’
पत्नी डा.रितु से बेपनाह मुहब्बत करने वाले डा.गर्ग बेबाकी के साथ कहते हैं, ‘प्यार को दिमागी लोचा मानने वाले चीनी चिकित्सकों की पत्नियां अगर उन्हें भारतीय महिलाओं की तरह स्नेह और समर्पण का सुखद एहसास कराएं तो प्यार पर उनका शोध व नजरिया दोनों बदल जाएगा। डा.रितु को ही लें,यदा-कदा सार्वजनिक तौर पर मैं उनपर तीखे और झनझनाते सवाल भी दागता हूं, लेकिन वह कभी रिएक्ट नहीं करतीं। आंखों में भले ही आंसू होते हैं, लेकिन चेहरे पर होती है मीठी मुस्कान। ठीक वैसी ही, जैसे मेडिकल की पढ़ाई के दौरान पहली बार मिली थीं, उन पर रीझीं थीं। तब से आज तक न तो उनका व्यवहार बदला और न बातचीत का अनोखा अंदाज। न तो उन्होंने कभी गहनों की फरमाइश की और न ही कोई ऐसा तोहफा मांगा जिसके लिए कभी ताना मारने की जरूरत पड़े। बेमेल कुंडली के बावजूद मैने डा.रितु से शादी की और सफलता की सीढ़ी चढ़ता गया।’ दरअसल डा.संजय गर्ग का स्त्रियों की स्वतंत्रता को लेकर विचार काफी उदारवादी है। ये मानते हैं कि परिजन सहयोग दें तो स्त्रियां हर रोज तरक्की का नया आयाम रच सकती हैं।
इनसेट-----
क्या है ‘प्यार’ पर चीन का नया शोध
वाराणसी। पेकिंग विवि के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर माओ लिहुआ के हालिया शोध के मुताबिक किसी के प्रति आकर्षित होने पर तंत्रिका तंत्र के जरिए फेरोमोन्स दिमाग में पहुंचकर पीयुष ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन के स्राव को बढ़ाते हैं। इससे दिल की धड़कन तेज हो जाती है और बढ़ जाती है सांसों की गति। इंसान इसे प्यार मान बैठता है,जबकि यह एक रासायनिक क्रिया है और कुछ नहीं।