Wednesday, 15 June 2016

काशी में आत्महत्या करने वालों में हर पांचवां एक ‘आशिक’



0 मुहब्बत में 20 फीसदी और करियर न संवरने पर चार फीसदी यंगस्टर्स देते हैं जान
जिंदगी पर Yभारी पड़ता प्रेम------------
-बनारस में 50 फीसदी लोग गंगा नदी अथवा ट्रेन के आगे कूदकर कर लेते हैं आत्महत्या
-प्यार में मौत के लिए 20 फीसदी लोग खाते हैं जहरीली अथवा नशीली दवाएं
-30 फीसदी युवक फांसी अथवा गन शाट से लगाते हैं मौत को गले
विजय विनीत
वाराणसी। शहर के दौलतपुर मोहल्ले में बैजनाथ नामक युवक ने अपने सिर में तमंचे से गोली मारकर जान दे दी। इस आत्महत्या के पीछे भी थी प्रेम की एक दर्द भरी कहनी। दरअसलजब कोई युवक और युवती एक दूसरे को चाहने लगते हैं अथवा पसंद करते हैं। शादी करना चाहते हैं और परिवार के लोग जब अनुमति नहीं देते तब यंगस्टर्स आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं। पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि  बनारस में पढ़ाई के मुकाबले प्यार में जिंदगी हारने वाले नौजवानों की संख्या पांच गुना ज्यादा है। यहां आत्महत्या करने वाले हर सौ लोगों में 40 पारिवारिक और 20दांपत्य कलह से ऊबकर जिंदगी को अलविदा कहते हैं। प्रेम में चोट खाकर आत्महत्या करने वालों की संख्या 20 फीसदी होती है। इसके  विपरीत सिर्फ चार फीसदी युवा शैक्षिक करियर संवार न पाने के कारण मर जाना बेहतर समझते हैं।
वाराणसी में इस साल पिछले पांच महीनों में 36 लोगों ने जान दी। इसी अवधि में बीते साल सिर्फ 25 लोगों ने आत्महत्या की थी। इनमें ऐसे लोगों को संख्या सर्वाधिक है जिन्होंने अवसाद चलते आत्महत्या करने की। आंकड़े बताते हैं कि आत्महत्या करने वाले 80 फीसदी लोग 16 से 30 साल के थे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक डिप्रेशन के शिकार लोगों में से 15 फीसदी लोग आत्महत्या जरूर कर लेते हैं। देश में आत्महत्याओं की दर6.8 प्रति एक लाख जनसंख्या है। मरने वालों में हर आठवां व्यक्ति अपनी जिंदगी का काम खुद तमाम कर लेता है। बिहार की अपेक्षा यूपी के पूर्वांचल में ज्यादा लोग जान देते हैं। बाहर से काशी में आकर जान देने वालों की संख्या कम नहीं है। ऐसे सौ लोगों में 51 लोग 20 से 30 साल के होते हैं और इनमें से 24 फीसदी किसी न किसी मानसिक समस्या से ग्रसित होते हैं।
प्यार में जान देने वाली घटनाओं के अध्ययन पर गौर किया जाए तो बनारस में सर्वाधिक 60 फीसदी लोग गंगा नदी अथवा ट्रेन के आगे कूदकर जान देते हैं। प्यार में जान देने वाले 20 फीसदी लोग जहरीली अथवा नशीली दवाओं से और30 फीसदी युवक फांसी पर लटक जाते हैं। प्यार में आत्महत्या का प्रयास करने वाले इस प्रक्रिया को दो से तीन बार दोहराते हैं। बीएचयू के मनोचिकित्सकों का मानना है कि आत्महत्या के प्रयास से बच जाने वाले दस फीसदी लोग उपचार अथवा काउंसिलिंग न होने पर अगले दस सालों में जरूर आत्महत्या कर लेते हैं। ऐसा करने वाले आम नागरिकों के मुकाबले मनोरोगियों की संख्या पांच से 12 गुना ज्यादा होती है। शोधकर्ता ऐसा ाी मानते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं डिप्रेशन से अधिक प्राावित होती हैं। इनमें उनकी  संख्या ज्यादा होती हैं जिनका कोई इतिहास होता है जैसे कि वो पहले काी सेक्सुअली एब्यूज हुई हों या फिर उन्हें किसी प्रकार की इकॉनामिक परेशानी हुई हो। डिप्रेशन के 15 से 20 फीसदी रोगी ठीक नहीं हो पाते। काशी में मनोचिकित्सकों की भारी कमी भी आत्महत्या के ग्राफ को बढ़ा रही है।
० स्कूल में होनी चाहिए बच्चों की काउंसिलिंग
वाराणसी। वाराणसी में बीएचयू के मनोचिकित्सा विज्ञान के विभागाध्यक्ष डा.संजय गुप्ता के मुताबिक प्यार में जान देने की युवाओं में तेजी से बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए स्कूल में ही काउंसिलिंग होनी चाहिए।  प्यार की दीवानगी में फंसे युवाओं को डांटने के बजाय समझाने की कोशिश की जानी चाहिए। पढ़ाई अथवा अन्य किसी असफलता पर युवाओं को फटकारने के बजाए प्रोत्साहित करने की कोशिश करनी चाहिए। जाहिर है कोई व्यक्ति अपने सुनहरे सपनों और बहुमूल्य जीवन का अंत खुशी से नहीं करेगा। अगर वे आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठाते हैं या कोशिश करते हैं तो इसके पीछे उनकी कोई बहुत बड़ी विवशता होती है।
इनसेट--------
कानूनी व नैतिक अपराध है आत्महत्या
वाराणसी। आत्महत्या को  नैतिक और कानूनी दोनों ही दृष्टिकोण से अपराध की संज्ञा दी जाती है। यह  सभी दुखों का अंत लगती हैहो सकता है कुछ लोगों को यह बात सही ना लगे लेकिन सच यही है कि अगर युवक आत्महत्या करने की कोशिश करता है तो इसके पीछे उसका परिवार और आसपास का वातावरण पूर्ण उत्तरदायी होते हैं। अभिभावकों का अपने बच्चे से अत्याधिक अपेक्षाएं रखना,उनका तुलनात्मक स्वभाव और नंबर कम आने पर ढेर सारी डांट या मार बच्चे को मानसिक रूप से बहुत परेशान करती है। अवसाद यंगस्टर्स की ऊर्जा को कम और कभी-कभी खत्म कर देता है। जिंदगी नर्क जैसी लगने लगती है। अवसाद लाइलाज बीमारी नहीं है। इसे अनदेखा कर लोगयावह नतीजे भुगतते हैं। लड़कों  की अपेक्षा लड़कियों में अवसाद दोगुना होता है। लड़की अपने प्रेमी से निराश होती है तो उसे संभालने की जिम्मेदारी भी अभिभावकों की होनी चाहिए।

आत्महत्या से बचने के उपाय
0 6-8 घंटे की नींद लें और सोशल साइट्स पर देर रात तक जागना छोड़ें।
0 पौष्टिक भोजन करें और खाने में फल व सब्जी मिलाएं।
0 अपना लक्ष्य निर्धारित करें और उसको पाने के लिए ध्यान केंद्रित करें।
0 शराब और सिगरेट को ना कहें। यह तनाव कम नहीं करते,बढ़ाते हैं।
0 परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं। घूमने भी जाएं।
अस्थमानेत्र विकार और हृदय जन्य बीमारियों का इलाज कराएं।

Thursday, 9 June 2016

राजदरी-देवदरी जलप्रपात में बसता है जन्नत

राजदरी-देवदरी जलप्रपात में बसता है जन्नत
0 प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है नौगढ़ के चंद्रप्रभा का नैसर्गिग सौंदर्य
दीवाना बनाता है झरना ---
तिलिस्मी उपन्यास चंद्रकांता के नौगढ़ के गढ़ में है यह मनोरम स्थल
यूपी के सासे सुंदरतम स्थल को हासिल है दूसरे कश्मीर का खिताब
विंध्य पर्वत की वादियों में जो आता है यहीं का होकर रह जाता है
विजय विनीत
चंदौली के राजदरी-देवदरी जल प्रपात में जन्नत बसता है। काशी नरेश की राजधानी चकिया (चंदौली) में है यह रमणीय स्थल। मनमोहक पहाड़ी श्रृंखला। चौतरफा हरियाली। काफी ऊंचाई से गिरती शीतल जलधारा। पक्षियों की चहचहाहट, जंगली जीवों के पदचाप से गुलजार रहने वाला यह स्थल रोम-रोम को पुलकित कर देता है। हवाओं की बयार, झरनों की फुहार न सिर्फ मन को सुकून देती है, बल्कि सैलानियों को रोमांचित भी करती है। यूपी के इस सासे सुंदरतम स्थल को हासिल है दूसरे कश्मीर का खिताब राजदरी-देवदरी में बारिश के दिनों में सैलानियों का सैलाब उमड़ रहा है।
प्रकृति की अद्भुत छटा चकिया-नौगढ़ मार्ग के करीब चंद्रप्रभा वन्यजीव विहार की सीमा से करीा दो किमी दूर है। तिलस्मी उपन्यास चंद्रकांता के जिस नौगढ़ को पूरी दुनिया जानती है उसी की मनोरम वादियों में है राजदरी-देवदरी जलप्रपात। घने जंगलों और पहाड़ों की मनोरम वादियां न सिर्फ सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, बल्कि वहां पहुंचने वाले सैलानियों को सुकून देती हैं। महंगे टिकट और कुव्यवस्था के बावजूद जल प्रपात की खूबसूरत वादियां सैलानियों को अपनी ओर खींचती है। बारिश सीजन में सैकड़ों लोग रोजाना यहां पहुंचते हैं और इस रमणीय स्थल का लुत्फ उठाते हैं। जल प्रपात की जलधारा में स्रान भी करते हैं। जल की शीतलता के आगे सैलानियों की मुश्किलें काफूर हो जाती हैं।
चंद्रप्रभा नदी के राजदरी जल प्रपात का सौंदर्य और शीतलता  का एहसास कराने वाला पानी सैकड़ों फीट नीचे खाईं में गिरता है तो मनोरम दृश्य मन मोह लेता है। यहां चीतल, खरगोस, लंगूर, बंदर और सांपों को विचरण करते हुए देखा जा सकता है। राजदरी में आनने वाला पानी ऊंची पहाड़ी से झरने से गिरता है तो मन मोह लेता है। पानी की ओस सरीखी बूंदे बादलों की छटा विखेरती रहती हैं। यहां आने वाले सैलानी जल प्रपात के दूसरे छोर तक पत्थर फेंकते हैं। हवाओं के बयार के बीच पत्थर फेंकने का रोमांच पूरी थकान को मिटा देती है। राजदरी से एक किमी दूर है देवदरी जल प्रपात। राजदरी जल प्रपात के पास तीन गेस्ट हाउस हैं। इन गेस्ट हाउसों में सैलानी नहीं, आमतौर पर अफसर और नेता ही ठहरते हैं। घने जंगलों के बीच लगे बीएसएनएल के मोबाइल टावर सैलानियों को परेशान करता है। लुंज-पुंज व्यवस्था के चलते आमतौर पर नेटवर्क गाया रहता है। झरने में कोई फंस जाए तो अफसरों को सूचना देने और पर्यटकों को सचेत करने का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है।

Sunday, 5 June 2016

हुजूर! शिवदासपुर की बेटियां धंधा नहीं करतीं

हुजूर! शिवदासपुर की बेटियां धंधा नहीं करतीं

0 रेडलाइट एरिया के बच्चे भी बन रहे हैं इंजीनियर और डॉक्टर 
दर्द न जाने कोए-------
0 यौनकर्मियों की जिंदगी में भूख हैबेबसी हैलाचारी है,आहेंकराहें और सिसकियां हैं
0 अतीत नहीं छोड़ता पीछा,इनकी जिंदगी में एंट्री पॉइंट तो हैलेकिन एक्जिट पॉइंट नहीं
0 नगर वधुओं को जिस्म का सौदा करने का अफसोस है,लेकिन कुंठा और अपराध बोध नहीं
विजय विनीत
वाराणसी। सूबे का सबसे फेमस रेडलाइट इलाका है शिवदासपुर। कैंट स्टेशन से महज तीन किमी दूर। ऊबड़-खाबड़ सड़क के बाहर खड़ी लड़कियां ग्राहकों को उसी पारंपरिक तरीके से रिझाती नजर आती हैंजैसे एक समय दालमंडी के कोठों में चलन में था। फर्क यह है कि दालमंडी की तरह शिवदासपुर में न तबलों की थाप सुनाई देती हैन ही घुंघुरुओं की झंकार। यहां कुछ है तो सिर्फ भूख हैबेबसी हैलाचारी है, आहें  हैं, कराहें हैं और हैं सिसकियां। नगर बहुएं बेबाकी से स्वीकार करती हैंजो लोग हमारे बदन को रौंदने आते हैं,वे हमारे बच्चों की भूख की दवा हैं। अधिसंख्य यौनकर्मियों की जिंदगी पहाड़ जैसी है। शिवदासपुर की शबाना बानो सीना ठोककर कहती है-मैं भी इस मुल्क की सचाई हूं हुजूर। मैं इसी रेड लाइट एरिया की बेटी हूं। धंधा नहीं करतीपढ़ती हूं। अफसर बनना चाहती हूं।इस रेडलाइट एरिया के बेटे अब इंजीनियर बन रहे हैं और बेटियां डाक्टर व नर्स। शिवदासपुर की नगर वधुएं अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर घिनौने दलदल से बाहर निकालना चाहती हैं। खुद ये जिस्मफरोशी का धंधा छोड़ना चाहती हैंलेकिन अतीत पीछा नहीं छोड़ता। दरअसल इनकी जिंदगी ऐसी है कि जिसमें एंट्री पॉइंट तो हैलेकिन एक्जिट पॉइंट नहीं।
शिवदासपुर गांव है। लहरतारा से सटा है। इस गांव के लिए जो बदहाल रास्ता जाता है उसके किनारे नगर बधुएं ग्राहकों का बाट जोहती हैं। मेहमान के इंतजार में घंटों खड़ी रहती हैं। एक-दो ग्राहक आ जाएं तो बात अलग है। नगर वधू संजू को एक इस बात से रंज है कि शहर की पढ़ी-लिखी लड़कियां कालगर्ल बनकर उनका धंधा चौपट कर रही हैं। कहती है-बीमारी और चिड़चिड़ापन हमारी जिंदगी का हिस्सा है। तनाव है तो ग्राहकों के न आने का। लाचारी में कम पैसों में यौन सेवाएं देनी पड़ रही है। संगीता की भीगी आखों का जवाब सीने को भेद देता है। इसे जिस्म का सौदा करने का अफसोस हैलेकिन कुंठा नहींअपराध बोध नहीं। न तो खुद को यौनकर्मी होने पर घृणा महसूस होती है और न स्त्री होने का अफसोस। दड़बेनुमा और सीलन भरे  कमरे में जिस्म का सौदा इनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है। सकीना कहती हैहमारे यहां बुजुर्ग नगर वधुएं खाना बनाती हैं,बर्तन धोती हैं और कपड़े भी। जिन नगर बधुओं में धंधे में गर्माहट लाने की क्षमता है वे घरेलू काम से मुक्त हैं। वे या तो ग्राहक की सेवा कर रही होती हैं अथवा मेहमानों का इंतजार।
शिवदासपुर में पश्चिम बंगाल,दिल्लीमुंबईसिलीगुड़ी, नेपाल की नगर वधुएं हैं। इनकी जिंदगी भी मोबाइल है। धंधा मंदा पड़ता है तो शहर बदल जाता है। हर वक्त जारी रहती है जिंदगी की जद्दोजहद। 
शिवदासपुर की नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तींलेकिन हर किसी के हाथ में अब मोबाइल फोन है। धंधा करने वाली ज्यादातर नगर वधुओं ने भले ही स्कूल  का मुंह न देखा हो,लेकिन अपने बच्चों को स्कूल जरूर भेजने की जद्दोजहद में जुटी रहती हैं। इसके लिए वे एक-एक दिन में चार-पांच ग्राहकों को निपटाती हैं। दिन भर की कमाई चार-पांच सौ हो जाए तो काफी है। यहां दलालों का रेट भी बंधा है। किराया देना है। घर भेजना है। बच्चे का भविष्य है।
पुलिस के रेड से शिवदासपुर में कई कोठों पर ताले लगे हैं। गाहे-बगाहे पुलिस की रेड पड़ती रहती है। जेल जाने से उन्हें बचाते भी हैं पुलिस वाले। इलाकाई थाना पुलिस तंग करती हैलेकिन यह सब रुटीन का हिस्सा है। एक यौनकर्मी की बेटी मनीषा (बदला नाम) वाराणसी गर्ल्स डिग्री कालेज में स्रातक की छात्रा है। वह खुद को शहर में तैनात एक सिपाही की बेटी बताती है। दरअसल सिपाही ही उसकी पढ़ाई का खर्च उठा रहा है। कुरेदने पर मनीषा बताती है कि मेरी जिंदगी का मकसद है अधिवक्ता बनना। गरीबों और उन महिलाओं का केस लड़ना चाहती हूं जिनका जिस्म रौंदा जाना नियति बन गई है।रेशमा और सलमा के जीवन में कोई यादगार क्षण नहीं है। वेश्यावृत्ति के दलदल में फंसी दोनों बहनें बोलती कमज्यादा मुस्कुराती हैं। इनकी  ख्वाहिश है खूब धन-दौलत कीआजाद घूमने की और फिल्में देखने की। लेकिन इनके पास न तो छुट्टी है और न ही धन-दौलत। पास-पड़ोस के लोगों से मेलजोल हो तो नगर वधुएं खुलकर बात करती हैंलेकिन इन्हें तस्वीरें खींचने से सख्त परहेज है। ज्यादातर को बुढ़ापे का खौफ बहुत डराता है। कारण-असुरक्षित भविष्य। अधिकांश यौनकर्मियों का मतदाता सूची में नाम नहीं है। पीएम नरेंद्र मोदी के दबाव में कुछ के खाते तो खुले हैं,लेकिन धन नदारद है। यौनकमिर्यों को न तो पूरी तरह नागरिक अधिकार प्राप्त हैं और न ही उनकी नागरिक भूमिका सक्रिय रूप से बन पाती है। कई वेश्याएं एड्स पीड़ित भी हैं,जिनका उपचार चुनौती है।

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अब सिनेमा नहीं देख पातीं नगर वधुएं 
वाराणसी। काशी में जब से सिनेमाघर माल में बदल गए हैं तब से नगर वधुएं सिनेमा नहीं देखतीं। खाली समय में टीवी देखती हैं। पर्व और त्योहारों में पर ग्राहकी थोड़ी बढ़ जाती है। पहले नगर वधुओं का कोठा शिवदासपुर नहींदालमंडी में था। यहां गणिकाओं की परंपरा काफी समृद्ध थी। जब शिवदासपुर गांव में खदेड़ा गया तो इनका दर्द बढ़ गया। सिने स्टार नरगिस (संजय दत्त की मां) की मां जद्दन बाई ठुमरी की सम्राज्ञी थीं। दालमंडी में इनके कोठे पर कद्रदानों की लाइन लगती थी। शिवदासपुर की कुछ नगर वधुएं ठुमरी-चैता तो जानती हैंलेकिन जद्दन बाई को नहीं। 90 के दशक के बाद शादी-विवाह आदि समारोहों में नाच-गाने की परंपरा पर टूटनी शुरू हुई तो जिस्म बेचना इनकी मजबूरी बन गई।
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सुखद जिंदगी का इंतजाम करने लगी हैं नगर वधुएं
वाराणसी। शिवदासपुर अब देश का पहला रेडलाइट एरिया है जहां बाल वेश्याएं नहीं हैं। फिर भी सरकार इनके पुनर्वास के लिए नहीं सोच रही है। गुड़ियासंस्था की कोआर्डिनेटर सांत्वना मंजू कहती हैं कि उनकी संस्था यौनकर्मियों के बच्चों को फैशन डिजाइनिंगब्यूटीशियनफिल्म मेकिंगकंप्यूटर के अलावा मेडिटेशन की ट्रेनिंग देती है। शिक्षा से नगर वधुओं के पंख लगने लगे हैं। रेड लाइट एरिया का युवक देश की एक नामी कंपनी में साफ्टवेयर इंजीनियर है तो कई लड़कियां नर्स की ट्रेनिंग लेकर अपनी सुखद जिंदगी का इंतजाम करने लगी हैं। मंजू बताती हैं कि रेड लाइट एरिया के कई बच्चे दलाल बनने के बजाए सैलून में काम करते हैं। कुछ टैंपो चलाते हैं और कुछ रिक्शे। आपसी साहचर्य के तौर पर इनके बीच पारिवारिक रिश्ते हैं। एक कोठे पर रहने वाली लड़कियां आपस में बहनें हैं। इनके बच्चे अब अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं। पर्व-त्योहार (हिंदू और मुस्लिम अथवा अन्य धार्मिक परंपरा के अनुसार) सभी मिल कर मनाते हैं। इनका अल्लाह में भी विश्वास है और ईश्वर में भी। बिना किसी गिला-शिकवा के। यही है इनके आपसी साहचर्य का माध्यम।