Sunday, 5 June 2016

हुजूर! शिवदासपुर की बेटियां धंधा नहीं करतीं

हुजूर! शिवदासपुर की बेटियां धंधा नहीं करतीं

0 रेडलाइट एरिया के बच्चे भी बन रहे हैं इंजीनियर और डॉक्टर 
दर्द न जाने कोए-------
0 यौनकर्मियों की जिंदगी में भूख हैबेबसी हैलाचारी है,आहेंकराहें और सिसकियां हैं
0 अतीत नहीं छोड़ता पीछा,इनकी जिंदगी में एंट्री पॉइंट तो हैलेकिन एक्जिट पॉइंट नहीं
0 नगर वधुओं को जिस्म का सौदा करने का अफसोस है,लेकिन कुंठा और अपराध बोध नहीं
विजय विनीत
वाराणसी। सूबे का सबसे फेमस रेडलाइट इलाका है शिवदासपुर। कैंट स्टेशन से महज तीन किमी दूर। ऊबड़-खाबड़ सड़क के बाहर खड़ी लड़कियां ग्राहकों को उसी पारंपरिक तरीके से रिझाती नजर आती हैंजैसे एक समय दालमंडी के कोठों में चलन में था। फर्क यह है कि दालमंडी की तरह शिवदासपुर में न तबलों की थाप सुनाई देती हैन ही घुंघुरुओं की झंकार। यहां कुछ है तो सिर्फ भूख हैबेबसी हैलाचारी है, आहें  हैं, कराहें हैं और हैं सिसकियां। नगर बहुएं बेबाकी से स्वीकार करती हैंजो लोग हमारे बदन को रौंदने आते हैं,वे हमारे बच्चों की भूख की दवा हैं। अधिसंख्य यौनकर्मियों की जिंदगी पहाड़ जैसी है। शिवदासपुर की शबाना बानो सीना ठोककर कहती है-मैं भी इस मुल्क की सचाई हूं हुजूर। मैं इसी रेड लाइट एरिया की बेटी हूं। धंधा नहीं करतीपढ़ती हूं। अफसर बनना चाहती हूं।इस रेडलाइट एरिया के बेटे अब इंजीनियर बन रहे हैं और बेटियां डाक्टर व नर्स। शिवदासपुर की नगर वधुएं अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर घिनौने दलदल से बाहर निकालना चाहती हैं। खुद ये जिस्मफरोशी का धंधा छोड़ना चाहती हैंलेकिन अतीत पीछा नहीं छोड़ता। दरअसल इनकी जिंदगी ऐसी है कि जिसमें एंट्री पॉइंट तो हैलेकिन एक्जिट पॉइंट नहीं।
शिवदासपुर गांव है। लहरतारा से सटा है। इस गांव के लिए जो बदहाल रास्ता जाता है उसके किनारे नगर बधुएं ग्राहकों का बाट जोहती हैं। मेहमान के इंतजार में घंटों खड़ी रहती हैं। एक-दो ग्राहक आ जाएं तो बात अलग है। नगर वधू संजू को एक इस बात से रंज है कि शहर की पढ़ी-लिखी लड़कियां कालगर्ल बनकर उनका धंधा चौपट कर रही हैं। कहती है-बीमारी और चिड़चिड़ापन हमारी जिंदगी का हिस्सा है। तनाव है तो ग्राहकों के न आने का। लाचारी में कम पैसों में यौन सेवाएं देनी पड़ रही है। संगीता की भीगी आखों का जवाब सीने को भेद देता है। इसे जिस्म का सौदा करने का अफसोस हैलेकिन कुंठा नहींअपराध बोध नहीं। न तो खुद को यौनकर्मी होने पर घृणा महसूस होती है और न स्त्री होने का अफसोस। दड़बेनुमा और सीलन भरे  कमरे में जिस्म का सौदा इनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है। सकीना कहती हैहमारे यहां बुजुर्ग नगर वधुएं खाना बनाती हैं,बर्तन धोती हैं और कपड़े भी। जिन नगर बधुओं में धंधे में गर्माहट लाने की क्षमता है वे घरेलू काम से मुक्त हैं। वे या तो ग्राहक की सेवा कर रही होती हैं अथवा मेहमानों का इंतजार।
शिवदासपुर में पश्चिम बंगाल,दिल्लीमुंबईसिलीगुड़ी, नेपाल की नगर वधुएं हैं। इनकी जिंदगी भी मोबाइल है। धंधा मंदा पड़ता है तो शहर बदल जाता है। हर वक्त जारी रहती है जिंदगी की जद्दोजहद। 
शिवदासपुर की नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तींलेकिन हर किसी के हाथ में अब मोबाइल फोन है। धंधा करने वाली ज्यादातर नगर वधुओं ने भले ही स्कूल  का मुंह न देखा हो,लेकिन अपने बच्चों को स्कूल जरूर भेजने की जद्दोजहद में जुटी रहती हैं। इसके लिए वे एक-एक दिन में चार-पांच ग्राहकों को निपटाती हैं। दिन भर की कमाई चार-पांच सौ हो जाए तो काफी है। यहां दलालों का रेट भी बंधा है। किराया देना है। घर भेजना है। बच्चे का भविष्य है।
पुलिस के रेड से शिवदासपुर में कई कोठों पर ताले लगे हैं। गाहे-बगाहे पुलिस की रेड पड़ती रहती है। जेल जाने से उन्हें बचाते भी हैं पुलिस वाले। इलाकाई थाना पुलिस तंग करती हैलेकिन यह सब रुटीन का हिस्सा है। एक यौनकर्मी की बेटी मनीषा (बदला नाम) वाराणसी गर्ल्स डिग्री कालेज में स्रातक की छात्रा है। वह खुद को शहर में तैनात एक सिपाही की बेटी बताती है। दरअसल सिपाही ही उसकी पढ़ाई का खर्च उठा रहा है। कुरेदने पर मनीषा बताती है कि मेरी जिंदगी का मकसद है अधिवक्ता बनना। गरीबों और उन महिलाओं का केस लड़ना चाहती हूं जिनका जिस्म रौंदा जाना नियति बन गई है।रेशमा और सलमा के जीवन में कोई यादगार क्षण नहीं है। वेश्यावृत्ति के दलदल में फंसी दोनों बहनें बोलती कमज्यादा मुस्कुराती हैं। इनकी  ख्वाहिश है खूब धन-दौलत कीआजाद घूमने की और फिल्में देखने की। लेकिन इनके पास न तो छुट्टी है और न ही धन-दौलत। पास-पड़ोस के लोगों से मेलजोल हो तो नगर वधुएं खुलकर बात करती हैंलेकिन इन्हें तस्वीरें खींचने से सख्त परहेज है। ज्यादातर को बुढ़ापे का खौफ बहुत डराता है। कारण-असुरक्षित भविष्य। अधिकांश यौनकर्मियों का मतदाता सूची में नाम नहीं है। पीएम नरेंद्र मोदी के दबाव में कुछ के खाते तो खुले हैं,लेकिन धन नदारद है। यौनकमिर्यों को न तो पूरी तरह नागरिक अधिकार प्राप्त हैं और न ही उनकी नागरिक भूमिका सक्रिय रूप से बन पाती है। कई वेश्याएं एड्स पीड़ित भी हैं,जिनका उपचार चुनौती है।

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अब सिनेमा नहीं देख पातीं नगर वधुएं 
वाराणसी। काशी में जब से सिनेमाघर माल में बदल गए हैं तब से नगर वधुएं सिनेमा नहीं देखतीं। खाली समय में टीवी देखती हैं। पर्व और त्योहारों में पर ग्राहकी थोड़ी बढ़ जाती है। पहले नगर वधुओं का कोठा शिवदासपुर नहींदालमंडी में था। यहां गणिकाओं की परंपरा काफी समृद्ध थी। जब शिवदासपुर गांव में खदेड़ा गया तो इनका दर्द बढ़ गया। सिने स्टार नरगिस (संजय दत्त की मां) की मां जद्दन बाई ठुमरी की सम्राज्ञी थीं। दालमंडी में इनके कोठे पर कद्रदानों की लाइन लगती थी। शिवदासपुर की कुछ नगर वधुएं ठुमरी-चैता तो जानती हैंलेकिन जद्दन बाई को नहीं। 90 के दशक के बाद शादी-विवाह आदि समारोहों में नाच-गाने की परंपरा पर टूटनी शुरू हुई तो जिस्म बेचना इनकी मजबूरी बन गई।
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सुखद जिंदगी का इंतजाम करने लगी हैं नगर वधुएं
वाराणसी। शिवदासपुर अब देश का पहला रेडलाइट एरिया है जहां बाल वेश्याएं नहीं हैं। फिर भी सरकार इनके पुनर्वास के लिए नहीं सोच रही है। गुड़ियासंस्था की कोआर्डिनेटर सांत्वना मंजू कहती हैं कि उनकी संस्था यौनकर्मियों के बच्चों को फैशन डिजाइनिंगब्यूटीशियनफिल्म मेकिंगकंप्यूटर के अलावा मेडिटेशन की ट्रेनिंग देती है। शिक्षा से नगर वधुओं के पंख लगने लगे हैं। रेड लाइट एरिया का युवक देश की एक नामी कंपनी में साफ्टवेयर इंजीनियर है तो कई लड़कियां नर्स की ट्रेनिंग लेकर अपनी सुखद जिंदगी का इंतजाम करने लगी हैं। मंजू बताती हैं कि रेड लाइट एरिया के कई बच्चे दलाल बनने के बजाए सैलून में काम करते हैं। कुछ टैंपो चलाते हैं और कुछ रिक्शे। आपसी साहचर्य के तौर पर इनके बीच पारिवारिक रिश्ते हैं। एक कोठे पर रहने वाली लड़कियां आपस में बहनें हैं। इनके बच्चे अब अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं। पर्व-त्योहार (हिंदू और मुस्लिम अथवा अन्य धार्मिक परंपरा के अनुसार) सभी मिल कर मनाते हैं। इनका अल्लाह में भी विश्वास है और ईश्वर में भी। बिना किसी गिला-शिकवा के। यही है इनके आपसी साहचर्य का माध्यम।

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