Tuesday, 13 December 2016

काशी की संस्कृति में कलाकारों ने भरा आस्था का रंग

राजनीति का गलियारा नहीं मेरी जिंदगी का पड़ाव

कशी की तालियाँ कलाकारो को बनाती है विश्वविख्यात

मानवता के लिए धड़कता है पारुल का दिल

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जिंदा है इंसानियत---
0 भारतीय मूल की महिला जला रही शिक्षा और मानवाधिकार की लौ
0 मानवाधिकार चर्चा का नहीं, आचरण का विषय, अनिवार्य हो शिक्षा
0 पारुल की प्रेरणा से तमाम लड़कियां मलाला बनने का रखती हैं इरादा 
विजय विनीत
वाराणसी। स्वीडन की जानी-मानी अधिवक्ता पारुल शर्मा बनारस में एक ऐसी शमा जला रही हैं जिसकी लौ भुखमरी, कुपोषण और मानवाधिकार हनन रफ्ता-रफ्ता खत्म होता जा रहा है। पिछले डेढ़ दशक चल रही है यह मुहिम। इरादे नेक हैं, इसलिए कामयाबी भी मिली है। जिन मलिन बस्तियों के बच्चे क..ख...ग...घ... नहीं जानते थे वे अब अंग्रेजी के जुमले बोलते हैं। इनकी प्रेरणा और सहयोग से सैकड़ों लड़कियां कालेज जाती हैं। पारुल के दिल में भारत के गरीब और निरक्षर लोगों के लिए हर वक्त खदबदाहट मची रहती हैं। यही खदबदाहट इन्हें बनारस खींच लाती है। दरअसल इनका दिल मानवता के लिए धड़कता है। वह जब भी काशी आती हैं तो रख जाती हैं इंसानियत की ऐसी आधारशिला रख जाती हैं जिसकी मिसाल देश में कहीं देखने को नहीं मिलती। इस बार वह शहर की उन अभावग्रस्त छात्राओं को साइकिल वितरित करेंगी, जिन्हें स्कूल-कालेज पहुंचने के लिए रोजाना जद्दोजहद करनी पड़ती है। 
भारतीय मूल की पारुल शर्मा स्वीडन के स्टाकहोम में जानी-मानी अधिवक्ता हैं। मानवाधिकार के लिए जंग लड़ती हैं। न्याय के मंदिरों में और आम जनता के बीच भी। बनारस के आयर मुसहर बस्ती हो या सोनभद्र की घसिया बस्ती। यहां लोग बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज थे। इनकी चिंता न तो सरकार को थी, न ही सुनहरे •ाविष्य का ख्वाब दिखाकर वोट हासिल करने वाले नेताओं को। पारुल की मदद से दोनों गांवों में पंप हाउस और पानी की टंकियां हैं। अनेई की दलित बस्ती में पेयजल की मुश्किलें दूर करने जा रही हैं। पारुल शर्मा की मुहिम का नतीजा है कि शहर की बघवानाला बस्ती की लड़कियां स्कूल-कालेजों में पढ़ रही हैं। इन्होंने यहां शिक्षा ही नहीं, प्रेरणा-आदर्श की ऐसी सशक्त मिसाल पेश की है जिससे इस बस्ती की सभी बेटियां मलाला की तरह अपने देश का नाम रौशन करने का इरादा रखती हैं। ये बेटियां उन लोगों की हैं जिन्हें इलाके के लोग पहले शराबी और नशेड़ी के रूप में जानते थे। पारुल ने जिले के दर्जन भर आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों को खेलने के लिए झूला भी दिया है। पीवीसीएचआर से सहयोग से मानवीयता के लिए शुरू की गई इनकी मुहिम अब रंग लाने लगी है। 
पारुल शर्मा ने मानवाधिकार के लिए पारुल जयपुर, दिल्ली में भी भूख के खिलाफ जेहाद छेड़ा है। ये फियान की स्वीडन चेप्टर की अध्यक्ष हैं। यह संस्था पूरी दुनिया में भोजन अधिकार की मुहिम चला रही है। पारुल कहती हैं, जब तक भूख-प्यास और अमानवीयता के खिलाफ जंग में हमारी जीत नहीं हो जाती तब तक मानवाधिकार का हनन होता रहेगा। अधिवक्ता पारुल शर्मा स्वीडन से काशी आईं तो जनसंदेश टाइम्स के दफ्तर में अपने विचारों को साझा किया। इनकी रुचि देश-दुनिया में होने वाली सामाजिक और मानवता से जुड़ी बातों में है। वह अपना प्रचार नहीं चाहतीं। कहती हैं, मानवाधिकार चर्चा का नहीं, आचरण का विषय है। दुनिया भर में मानवाधिकार पर बहस और चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन जरूरतमंदों को फायदा पहुंचाने की बात आती है लच्छेदार बात करने वाले भाग खड़े होते हैं। मानवाधिकार का सबसे बड़े दुश्मन वे लोग हैं जो सिर्फ ढोल पीटते हैं। गरीबों के श्रम और संपदा का शोषण करते हैं। देशों की प्राकृतिक संपदा पर नजरें गड़ाए रहते हैं। पूंजी अपने आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में बुराई है। आज दुनिया में सिर्फ खुद को बेहतर दिखाने और बर्चस्व की जंग मची है। मानवाधिकार सभी के लिए समान होता है, लेकिन वास्तव में इसका फायदा उसे ही मिल पाता है जिसे या तो इसकी जाकारी हो या कोई संसाधन। सुश्री शर्मा मानती हैं कि भारत में मानवाधिकार व्यक्ति की हैसियत देखकर मिलता है। वह इसे गलत और शर्मनाक मानती हैं। कहती हैं कि मानावाधिकार का हनन उन्हीं इलाकों में अधिक होता है जहां साक्षरता का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है। बताती हैं कि मेरे पिता शशिकांत शर्मा इंजीनियर हैं। मां शिक्षिक हैं। स्विडिश इंग्लिश और सोशल साइंस पढ़ाती हैं। पंजाब के जालंधर के मूल निवासी हैं। •ाले ही हम स्वीडन में बस गए हैं, लेकिन हिन्दुस्तान की संस्कृति, सभ्यता, तीज-त्योहार हर पल याद आता है। पंद्रह साल की उम्र से भारत आ रही हूं। कानून की दोहरी डिग्री ली है (डबल एलएसएम)। मानवाधिकार हनन रोकने के लिए अपने जीवन सदुपयोग करना चाहती हूं। यही मेरे जीवन का मकसद है। इस मुहिम को गति देने के लिए मैने स्टाकहोम में पीपुल्स मूवमेंट संस्था गठित की है, जिससे दो सौ से अधिक लोग जुड़े हैं। पारुल शर्मा अब तक चार पुस्तकें लिख चुकी हैं। इनकी पुस्तक ह्यूमन राइट्स आफ इंडिया काफी चर्चित हुई है। इनका मानना है कि जीवन में हर चीज का बैलेंस होना चाहिए।

किसानो की आँखों में आंसुओं की धुंध

दिमाग का रासायनिक लोचा नहीं है ‘प्यार’

काशी के एक चिकित्सक का बेहतरीन साक्षात्कार
जाने-माने किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ.संजय गर्ग शहर के ऐसे चिकित्सक हैं जिन्होंने पूर्वांचल में पहली बार किसी मरीज को किडनी ट्रांसप्लांट किया। यह सफल आपरेशन तब किया जब बीएचयू के विशेषज्ञ चिकित्सक भी इस बारे में सोच नहीं पाते थे। 272 मरीजों की किडनी ट्रांसप्लांट करने का रिकार्ड बना चुके डा.गर्ग ने महज 48 साल की उम्र में अपने बूते पर न सिर्फ बड़ा अस्पताल खड़ा किया, बल्कि मेडिकल कालेज से लेकर कई शिक्षण संस्थाएं खोली हैं। वे कभी मंजिल से नहीं भटके। खुद को ‘वर्क अल्कोहलिक’ मानने वाले डा.गर्ग गर्व के साथ कहते हैं कि मेरी ताकत और तरक्की की आधारशिला मेरी पत्नी डा.रितु हैं।
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सीधी बातचीत--------
0 यह है ईश्वर का अनमोल तोहफा जो जीवन को भरता है खुशियों से
0 चाइना का सामान ही नहीं, प्यार के मामले में उनका शोध भी है घटिया
विजय विनीत
वाराणसी। चीन के चिकित्सक ‘प्यार’ को महज दिमाग में होने वाली रासायनिक क्रिया (फेरोमोन्स) मानते हैं,लेकिन शहर के जाने-माने चिकित्सक डा. संजय गर्ग इस शोध से इत्तेफाक नहीं रखते। कहते हैं, ‘प्यार ईश्वर का अनमोल तोहफा है जो जीवन को खुशियों से भर देता है। स्त्री के चेहरे पर चमक, सादगी और आत्मीयता भरी मुस्कान किसी भी इंसान की तरक्की की सीढ़ी बन सकती है। ये तीनों बातें मेरी पत्नी डॉ.रितु गर्ग में है। यही मेरी सफलता का राज है।’
डा.गर्ग के अनुभव, शोध और दावे में दम है। अंग्रेज़ी के जाने-माने साहित्यकार विलियम शेक्सपियर के एक प्रसिद्ध कथन का अगर हिंदी में अनुवाद करें तो हम कहेंगे कि प्यार और खूबसूरती तो देखने वाले की आंखों में होती है। किसी को किसी की आवाज भाती है, तो कोई कजरारे नयनों पर और कोई स्त्रियों की मुस्कान पर ही फिदा हो जाता है। दरअसल यह चायनीज प्यार नहीं, जिसे पेकिंग यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर माओ लिहुआ दिमागी अनुभव के अलावा कुछ नहीं मानते। डा. संजय गर्ग ‘जनसंदेश टाइम्स’ के दफ्तर में आए तो चिकित्सा विज्ञान की बारीकियों पर ढेरों चर्चा की। साथ ही अपनी निजी जिंदगी के कई राज भी खोले। चीनी के चिकित्सकों के शोध पर तंज कसते हुए डा.संजय गर्ग कहते हैं, ‘सिर्फ चीन का सामान ही नहीं, वहां के चिकित्सकों का शोध और सोच भी घटिया है। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं कि प्यार में जरूरत होती है धैर्य की,सहनशीलता की, जज्बे की और पति-पत्नी की भावनाओं को अच्छी तरह समझने की।’
पत्नी डा.रितु से बेपनाह मुहब्बत करने वाले डा.गर्ग बेबाकी के साथ कहते हैं, ‘प्यार को दिमागी लोचा मानने वाले चीनी चिकित्सकों की पत्नियां अगर उन्हें भारतीय महिलाओं की तरह स्नेह और समर्पण का सुखद एहसास कराएं तो प्यार पर उनका शोध व नजरिया दोनों बदल जाएगा। डा.रितु को ही लें,यदा-कदा सार्वजनिक तौर पर मैं उनपर तीखे और झनझनाते सवाल भी दागता हूं, लेकिन वह कभी रिएक्ट नहीं करतीं। आंखों में भले ही आंसू होते हैं, लेकिन चेहरे पर होती है मीठी मुस्कान। ठीक वैसी ही, जैसे मेडिकल की पढ़ाई के दौरान पहली बार मिली थीं, उन पर रीझीं थीं। तब से आज तक न तो उनका व्यवहार बदला और न बातचीत का अनोखा अंदाज। न तो उन्होंने कभी गहनों की फरमाइश की और न ही कोई ऐसा तोहफा मांगा जिसके लिए कभी ताना मारने की जरूरत पड़े। बेमेल कुंडली के बावजूद मैने डा.रितु से शादी की और सफलता की सीढ़ी चढ़ता गया।’ दरअसल डा.संजय गर्ग का स्त्रियों की स्वतंत्रता को लेकर विचार काफी उदारवादी है। ये मानते हैं कि परिजन सहयोग दें तो स्त्रियां हर रोज तरक्की का नया आयाम रच सकती हैं।
इनसेट-----
क्या है ‘प्यार’ पर चीन का नया शोध
वाराणसी। पेकिंग विवि के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर माओ लिहुआ के हालिया शोध के मुताबिक किसी के प्रति आकर्षित होने पर तंत्रिका तंत्र के जरिए फेरोमोन्स दिमाग में पहुंचकर पीयुष ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन के स्राव को बढ़ाते हैं। इससे दिल की धड़कन तेज हो जाती है और बढ़ जाती है सांसों की गति। इंसान इसे प्यार मान बैठता है,जबकि यह एक रासायनिक क्रिया है और कुछ नहीं।

बनारस में दुनिया का अनूठा कवि सम्मेलन

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भांग, पान और ठंडाई की जुगलबंदी के साथ अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़बाजी के रंगों में घुली बनारसी होली की बात ही निराली है। फागुन का सुहानापन बनारस की होली में ऐसी जीवंतता भरता है कि फिजा में रंगों का बखूबी अहसास होता है। फाल्गुनी बयार में किसी को रंगे बिना नहीं छोड़ने वाली काशी की होली ही नहीं, गालियां भी नायाब होती हैं। दुनिया की सांस्कृतिक राजधानी में होली के दिन शाम को टाउनहाल मैदान (मैदागिन) में अनूठा कवि सम्मेलन होता है, जिसमें जुटते हैं बड़ी संख्या में शहर के गण्यमान्य नागरिक और काव्य प्रेमी। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां सिर्फ गालियों की कविता पढ़ी जाती है, जिसमें होता है व्यग्य का पुट। यहां श्रोताओं को कोई रचना उत्तम नहीं लगती तो हूट नहीं करते, बल्कि बनारसी अंदाज में कहते हैं भाग-भाग भोसड़ी के...।
बाबा विश्वनाथ की नगरी में 1980 में इस अनूठे कवि सम्मेलन की शुरुआत की थी मशहूर कवि चकाचक बनारसी ने। पहले यह सम्मेलन अस्सी पर होता था। चकाचक के निधन के बाद पिछले 21 साल से टाउनहाल में यह सम्मेलन हो रहा है। इस कवि सम्मलेन में हास्य रचनाएं पढ़ने वाले कवि भाषा की सभी वर्जनाओं को खुला छोड़ देते हैं। कविता की मुख्य धारा से उनका कोई सीधा संबंध नहीं होता। देश का कोई मंत्री हो या संतरी, भारत की सरकार हो या अमेरिका की, बनारस के कलेक्टर हों या पुलिस कप्तान। यहां गालियों की बौछार से सबकी बखिया उधेड़ी जाती है। हंसी-मजाक के बीच संस्कृति, समाज और राष्ट्र की मौजूदा गतिविधियों पर तंज कसते हुए उससे रूबरू कराया जाता है। गाली से पिरोई गई रचनाओं पर बनारस के लोग खूब झूमते हैं और ठहाके लगाते हैं। भांग-ठंडई के सुरूर और अबीर-गुलाल की रंगीनियत के बीच अल्हड़पन अंदाज में हास्य कविताओं का ऐसा दौर शुरू होता है कि शाम से आधी रात कब हो जाती है, किसी को पता ही नहीं चलता। होली के दिन काशी में गालियां शुभ मानी जाती हैं और इससे किसी को परहेज भी नहीं होता। इस सम्मेलन में पढ़ी गई कविताओं का एक संकलन भी निकलता है जिसे हर कोई पढ़ना चाहता है, लेकिन घर में रखना कोई नहीं चाहता।
मित्रों के विशेष आग्रह पर अनूठे कवि सम्मेलन में इस साल मैने भी शिरकत की। जैसे कवि थे, श्रोता भी उनसे उन्नीस नहीं थे। हर कोई गाली को सम्मान देता नजर आया। अश्लीता के सवाल पर चकाचक बनारसी को अपना गुरु बताने वाले मंच संचालक बद्री विशाल का तर्क था कि यह मंच साहित्य परोशने के लिए नहीं, सामाजिक और राजनीतिक सच को बेबाकी के साथ उधेड़ने के लिए है। गालियां सिर्फ बेहूदगी और फूहड़पन का पर्याय नहीं। पूर्वांचल में शादी-विवाह जैसे अवसरों पर महिलाएं भी गालियों की बैछार करती हैं, जिसे शुभकर माना जाता है। समाज कोई भी हो गाली अपना स्थान खुद ही तलाश लेती है...।

ये छल, ये धोखा व जुल्म भी नहीं तोड़ पाए सोनी के घुंघरू

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0 घात-परिघात से जुड़ी है काशी की कथक नृत्यांगना की जिंदगी
हौसले को सलाम---
0 फौलादी हौसलों में दफन कर दी अथाह दर्द और सिसकियां
0 घिनौने खेल में उलझकर बाहर निकली है बनारस की बिटिया
0 शिखर पर पहुंचने का जज्बा लाया रंग, बनाती चली गई रिकार्ड
विजय विनीत
वाराणसी। विश्व रिकार्ड बनाने वाली कथक नृत्यांगना सोनी चौरसिया के फौलादी हौसले को समूचा देश सलाम कर रहा है। एक वक्त वह भी था जब सोनी टूट गई थी, हताश थी और अवसाद से भरी थी। शादी के चंद रोज बाद ही कथित साफ्टवेयर इंजीनियर पति से तलाक हो गया। ससुराल वालों के छल, धोखे और जुल्म के बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी। घात-परिघात से बाहर निकली तो पुरुष बनकर। इतिहास रचने के बुलंद हौसले के साथ। अथाह दर्द सीने में दफन कर लिया। शिखर पर पहुंचने का जज्बा रंग लाया और वह रिकार्ड पर रिकार्ड बनाती चली गई।
गिनीज बुक आफ वल्ड रिकार्ड बनाने वाली सोनी चौरसिया का नाम अब हर किसी के जुबान पर है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं उसकी निजी जिंदगी में कितना दर्द और कितनी सिसकियां हैं। सोनी बचपन से ही प्रतिभा की धनी थी। एक टीवी शो में दिल्ली के कथित इंजीनियर संजीव चौरसिया के घर वालों ने उसे देखा तो उसके पिता अपने बेटे के लिए सोनी का हाथ मांगने बनारस चले आए। सोनी के परिजनों को लगा कि लड़का इंजीनियर है। मोटी तनख्वाह है तो शादी करने में हर्ज क्या है। सोनी के पिता श्याम चंद्र चौरसिया को रिश्ता पसंद आया। उन्होंने अपनी बेटी को संजीव के साथ वैवाहिक बंधन की डोर से बांध दिया। उन्हें इस बात का कतई एहसास नहीं था कि संजीव और उसके परिवार वाले छलिया हैं, धोखेबाज हैं और जुल्मी हैं।
पति के घर पहुंचते ही सोनी के साथ उत्पीड़न का खेल शुरू हो गया। सोनी के अनुसार उसके सुहागरात के अगले दिन पति ने कहा कि उसकी नौकरी छूट गई है। वह इस बात की किसी से चर्चा न करे। यह सुनते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। बाद में यह भी पता चला कि उसका पति बेरोजगार ही नहीं, आवारा और बदचलन भी है। ससुराल वाले दहेजलोभी हैं। फकत पंद्रह दिनों में सोनी टूट गई। उसकी दुनिया उजड़ गई। ससुराल वालों के छल, धोखे और जुल्म के चलते सोनी के अरमा धुल गए। सिसकियों और आहों के बीच उसे तलाक लेना पड़ा। जीवन भर का साथ निभाने के अथाह दर्द ने सोनी को इस कदर तोड़ दिया कि उसके लिए उठ पाना मुश्किल था। सोनी के पिता और शुभचिंतकों ने उसका हौसला बढ़ाया। दर्द को दिल में दफन करके बुलंद हौसले के साथ कथक की दुनिया में रिकार्ड बनाने निकल पड़ी और इतिहास रचती चली गई। उसने जब ससुराल छोड़ा तभी निर्णय लिया कि वह कथक की दुनिया में विश्व रिकार्ड जरूर बनाएगी। सोने ने सबसे पहले 24 घंटे तक रोलर पर स्केटिंग कर लिम्का बुक रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराया। इसी बीच उसे हरियाणा के हिसार स्थित विद्या देवी जिंदल स्कूल में संगीत शिक्षिका की नौकरी मिल गई। विश्व रिकार्ड बनाने के लिए उसे पर्याप्त धन की जरूरत थी। अपने सपनों में पंख लगाने के लिए उसने नौकरी छोड़ दी। इतिहास रचने के लिए उसने रात-दिन मेहनत शुरू कर दी। उसे सिर्फ एक ही नशा था। वह था कथक। पूरे मनोयोग से घंटों रियाज करती रही। अंततः उसका ख्वाब हकीकत में बदल गया।

बाबा की नगरी में मोक्ष की तमन्नाः गिरिजा देवी

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'ठुमरी की रानी' पद्मविभूषण गिरिजा देवी को दुनिया में भला कौन नहीं जानता। 'बनारस घराने' की अदायगी का विशिष्ट माधुर्य इनकी खनकती आवाज में आज भी मौजूद है। सालों बाद मुलाकात हुई तो लगा कि शास्त्रीय संगीत के प्रति उनका जुनून तनिक भी कम नहीं हुआ है। इनकी कंठ का जादू आज भी हर किसी को तालियां बजाने पर विवश कर देता है। चाहे वह शास्त्रीय संगीत का महारथी हो अथवा अनपढ़। ठुमरी ही नहीं, होरी, कजरी, झूला, दादरा, भजन और चैती में बनारस का खास लहजा और विशुद्धता का पुट इनके गायन में विशेष आकर्षण पैदा करता है। 
गिरिजा देवी काशी को जन्नत मानती हैं। इन्हें समूची दुनिया से न्योता मिलता है, लेकिन काशी को छोड़ इनका दिल कहीं नहीं लगता। कहती हैं कि दुनिया में सबसे सस्ती चीज है, पैसा। मुझे टाटा-बिड़ला नहीं बनना। मेरा बस एक सपना है कि काशी की सिद्धपीठमें संगीतकारों के लिए बने कलाधाम। काशी ने मुझे प्रसिद्धि दी है और चाहती हूं कि मोक्ष भी बाबा की नगरी में ही मिले। वह शास्त्रीय संगीत के कलाकारों को यह संदेश देना चाहती हैं कि संगीत की विधा कोई भी हो, रियाज करें तो डूबकर करें, सुकून से करें। शार्टकट रास्ते से चलने वाले जिस रफ्तार से ऊपर पहुंचते हैं, उससे कई गुना तेज रफ्तार से नीचे आते हैं। आज भी कोशिश होती है कि मेरी हर रचना खूबसूरत हो। प्रबुद्ध समाज को दिशा दे। अध्यात्म का, साहित्य का और तरक्की का.....।

बनारस के किसानों ने कर दी अरहर की विदाई

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0 घड़रोजों के आतंक के चलते इसकी खेती से मुंह मोड़ने लगे अन्नदाता
0 मानसून की बेरुखी के बीच नौ महीने की फसल को बचाना बड़ी चुनौती
0 बीएचयू के कृषि वैज्ञानिक विकसित नहीं कर पाए कोई लोकप्रिय प्रजाति 
विजय विनीत 
वाराणसी। अरहर की खेती पर लागत के मुकाबले मुनाफा काफी कम होने के कारण जिले के किसान अब इसकी खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं। पिछले कुछ सालों की बात की जाए तो वाराणसी के किसानों ने अरहर को अब हमेशा के लिए विदाई दे दी है। जो किसान इसकी खेती में रुचि दिखाते हैं, उन्हें घड़रोज (नीलगाय) तबाह कर देते हैं। उचित दाम न मिलने के कारण जिले के किसानों का रुझान धान-गेहूं की ओर तेजी से बढ़ रहा है। प्रोत्साहन के अभाव में किसानों ने अरहर की खेती बंद ही कर दी है। 
आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो वर्ष 2010-11 से अब तक में कृषि विभाग के पास वाराणसी जिले में अरहर के उत्पादन का कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है। कृषि विभाग हर साल खेती का क्षेत्रफल तो तय करता है, लेकिन न तो उत्पादकता का ब्योरा जुटा पाता है और न ही उत्पादन का। कारण-अरहर की जिले से हमेशा के लिए विदाई। अरहर से किसानों के मुंह मोड़ने की कई ठोस वजहें हैं। पूर्वांचल में आमतौर पर इसकी खेती ऐसी जमीन में की जाती है जो उर्वरता के मामले में बेहद कमजोर होती है। फसल नौ महीने में पकती है। लंबी अवधि तक 
अरहर की देखभाल में किसानों के छक्के छूट जाते हैं और धैर्य जवाब देने लगता है। बनारस में अरहर की विदाई की सबसे बड़ी वजह हैं घड़रोज। गंगा, वरुणा और सरयू नदियों के कछार इनकी शरणगाह हैं। अरहर की फसल चट करने में घड़रोजों को आसानी होती है, क्योंकि उन्हें गर्दन झुकाने की जरूरत नहीं पड़ती। घड़रोज सबसे पहले इसी फसल को अपना आहार बनाते हैं। 
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक अरहर की उत्पादकता गिरने की एक और बड़ी वजह है अरहर की पुरानी प्रजातियां। पूर्वांचल में सर्वाधिक लोकप्रिय प्रजाति अरहर बहार दो दशक पुरानी हो चुकी है। बीएचयू की प्रजाति मालवीय-13 भी करीब 12 साल पुरानी है। हाल के सालों में बीएचयू के कृषि वैज्ञानिकों ने इसकी कोई ऐसी प्रजाति विकसित नहीं की जिससे पूर्वांचल में इसकी खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ सके। अरहर पर मौसम की मार सबसे ज्यादा पड़ती है। कभी ओले का तो कभी पाले का। दोनों ही स्थितियों में इसके फूल झड़ जाते हैं, जिससे किसान तबाह हो जाते हैं। 
चोलापुर ब्लाक के बबियांव के प्रगतिशील किसान शैलेंद्र सिंह रघुवंशी कहतेहैं कि अरहर की फसल में बीमारियों का भय अधिक बना रहता है। सरल बीमा प्रणाली न होने के कारण अरहर की खेती में रिस्क काफी ज्यादा होता है। बनारस में इनदिनों निजी कंपनियों में हाईब्रिड धान का बीज बेचने में गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है। प्रलोभन देकर किसानों को बरगलाया जा रहा है। इस वजह से किसान अरहर की खेती की बजाए धान को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। 
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दलहन क्लस्टर से ही बढ़ सकता है उत्पादन
वाराणसी। जिला कृषि अधिकारी संजय सिंह का कहना है कि क्लस्टर में दलहन की खेती से ही अरहर का उत्पादन बढ़ सकता है। इसके लिए राज्य स्तर पर योजना बननी चाहिए। इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए अनुदान का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। पूर्वांचल के किसान अब खेती में रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं है। मौसम के उतार-चढ़ाव के चलते अरहर की खेती चुनौती मानी जाने लगी है। कृषि विभाग को अरहर की खेती का लक्ष्य आवंटित करने के साथ ही किसानों को नई और अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियों का बीज मुफ्त में देना होगा। अनुदान की पुख्ता व्यवस्था करनी होगी। घड़रोजों पर शिकंजा कसने के लिए सोलर फेंसिंग ही एकमात्र उपाय है। यह अभी बेहद महंगा है। अनुदान मिलने पर ही किसान इसे अपना सकेंगे। अरहर की खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य में 450 रुपये प्रति कुंतल की बढ़ोतरी की है। पहले समर्थन मूल्य सिर्फ 4200 रुपये प्रति कुंतल था। लागत अधिक होने के कारण समर्थन मूल्य बढ़ने से किसानों की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं।

पूर्वांचल में हींग है, फिटकरी है, लेकिन रंग नहीं चोखा


० धान के कटोरे’ से अब नहीं आती आदमचीनी व कालानमक की बयार
घटा सुगंधित धान का रकबा-------------
अमेरिका-कनाडा में क्यों नहीं बिकता पूर्वांचल का चावल
बासमती की खेती में यूपी से आगे निकला पड़ोसी एमपी
विजय विनीत
वाराणसी। हींग है, फिटकरी है, लेकिन रंग चोखा नहीं है। यह हाल है पूर्वांचल में सुगंधित धान की खेती का। मोटे धान के सहारे किसानों की तरक्की के सपने चूर-चूर हो रहे हैं। हालात अनाथों जैसी होती जा रही है। जानते हैं क्यों? अमेरिका और कनाडा में अगर किसी चावल की सर्वाधिक डिमांड है तो वह है बासमती की। यह चावल पंजाब और हरियाणा से एक्सपोर्ट होता है। इस दौड़ में यूपी का पड़ोसी राज्य एमपी भी शामिल हो गया है। धान के बंपर उत्पादन के बावजूद यूपी सरकार का ध्यान नहीं है। हालत यह है कि इस राज्य में जो भी धान होता है उसकी पूछ सिर्फ राशन की दुकानों पर ही होती है।
खेती के मामले में चंदौली को धान का कटोरा का रुतबा हासिल है। गाजीपुर और जौनपुर में •ाी रिकार्ड उत्पादन होता है। पूर्वांचल में जो धान पैदा होता है उसकी गुणवत्ता इतनी घटिया होती है कि सरकारी सस्ते गल्ले के कोटेदारों को •ाी बेचना •ाारी पड़ता है। यूपी का पड़ोसी राज्य बासमती उत्पादन के मामले में पंजाब और हरियाणा को मात देने लगा है। धान के लिए पूर्वांचल में उम्दा जलवायु होने के बावजूद बासमती की बयार नहीं बहती। दरअसल यूपी के अफसरों ने पूर्वांचल में एक्सपोर्ट क्वालिटी की सुगंधित धान की खेती को आज तक गंभीरता से नहीं लिया। हाईब्रिड धान के बीजों की बिक्री में कमीशनखोरी का जोर है। एक्सपोर्ट क्वालिटी का धान पैदा कराने की चिंता कतई नहीं है। पूर्वांचल के किसान बासमती का रिकार्ड उत्पादन कर चुके हैं, लेकिन वे बेच नहीं पाए। एक्सपोर्ट क्वालिटी का बासमती धान काफी लंबा होता है, जिससे चावल निकालने के लिए पूर्वांचल में कहीं कोई संयंत्र ही नहीं है। लाचारी में किसानों को परंपरागत ढंग से पूसा बासमती (बौनी), सुगंधा अथवा जीआर-32 की खेती करनी पड़ रही है। धान की इन प्रजातियों में सुगंध तो है, लेकिन यह तारांकित होटलों और धनाड्य लोगों की पसंद नहीं है। यही वजह है कि बनारस मंडल में सुगंधित धान का रकबा तेजी से घटता जा रहा है।
सरकारी आंकड़ों से इतर देखा जाए तो मंडल में चंदौली में अधिसंख्य किसान बौनी मंसूरी और सोनम की खेती करते हैं। सूखे की स्थिति में भी किसान इसकी फसल उगा लेते हैं। सुगंधित धान का वाजिब दाम न मिल पाने के कारण किसान मुंह मोड़ते जा रहे हैं। वर्ष 2016-17 के लिए शासन ने सुगंधित धान की खेती का लक्ष्य 2 लाख 42 हजार 671 हेक्टेयर का दिया है। पिछले एक दशक के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो बनारस मंडल में कभी 35 से 36 हजार हेक्टेयर से अधिक सुगंधित धान नहीं बोए जा सके। कुछ चुनिंदा किसान निजी उपयोग के लिए पूसा बासमती, सुगंधा अथवा जीआर-32 की खेती कर रहे हैं। धान के लिए मशहूर चंदौली में भी सुगंधित धान का रकबा 1200 हेक्टेयर से ज्यादा नहीं बढ़ पाता है।
पूर्वांचल में सुगंधित धान में पूसा बासमती सबसे अधिक लोकप्रिय है। इसके अलावा सुगंधा-एक, सुगंधा-दो और सुगंधा-तीन की खेती होती है। गुजरात की प्रचलित प्रजाति जीआर-32 का उत्पादन नहीं के बराबर होता है। सुगंधित धान की प्रजातियों पर सरकार पहले सात सौ रुपये प्रति कुंतल की दर से अनुदान देती थी, लेकिन अब यह भी देना बंद कर दिया है। वाराणसी के प्रगतिशील किसान चंद्रशेखर सिंह कहते हैं कि पूर्वांचल के किसान सुगंधित धान की खेती को ‘हाथी पालने’ की तरह मानते हैं।
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जीआई में शामिल नहीं हो सकी ‘आदमचीनी’
वाराणसी। धान के कटोरा के रूप में विख्यात चंदौली में डेढ़ दशक पहले तक करीब 10 हजार हेक्टेयर में आदमचीनी, काला नमक, बादशाह •ोग जैसे सुगंधित धान की खेती होती थी, लेकिन अब इसका रकबा करीब दस गुना घट गया है। पूर्वांचल की आदमचीनी, काला नमक, बादशाह •ोग की सुगंध के आगे बासमती की कोई प्रजाति नहीं टिकती। इसकी खेती के लिए किसानों को न तो प्रोत्साहन दिया गया, न पर्याप्त अनुदान मिला और न ही तीनों प्रजातियों को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) में शामिल कराने के लिए बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आईपीएबी) चेन्नई में क•ाी अपील दर्ज कराई गई। जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) में क्षेत्र विशेष में वस्तु अथवा उत्पाद के उत्पादन को कानूनी मान्यता गुणवत्ता व लक्षणों के आधार पर विशिष्ट पहचान मिलती है। जीआई होने के बाद दूसरा व्यक्ति अथवा क्षेत्र इसके उत्पादन पर रजिस्ट्रेशन के लिए दावा पेश नहीं कर सकता। उत्पाद विशेष के निर्यात व वाणिज्यिक कारोबार के लिए क्षेत्र विशेष का दावा पुख्ता हो जाता है। यूपी के अफसरों ने तीनों प्रजातियों को पहचान देने की कोशिश नहीं की।
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ब्रांडिंग को तरसीं धान की मशहूर प्रजातियां
वाराणसी। जिला कृषि अधिकारी संजय सिंह कहते हैं कि पूर्वांचल के किसान हाईब्रिड धान की खेती पर जोर दे रहे हैं। ऐसा करना इनकी मजबूरी है। एक्सपोर्ट क्वालिटी की बासमती उगा भी लें तो उन्हें सिर्फ खुद्दी (टूटा चावल) ही मिलेगा, जिसे एक्सपोर्ट तो दूर, बाजार में बेच कर खर्च निकाल पाना कठिन होगा। बासमती को प्रोत्साहन देने के बाजाय आदमचीनी, काला नमक और बादशाह •ोग की ब्राडिंग की जाए तो इस चावन का आसानी से एक्सपोर्ट किया जा सकता है। पुख्ता कार्ययोजना और प्रोत्सान पूर्वांचल में सुगंधित धान की खेती की दिशा बदल सकती है।
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पूर्वांचल में धान के गढ़
चंदौली में चकिया, सैयदराजा, चंदौली, जौनपुर में धर्मापुर, सिरकोनी, खुटहन और गाजीपुर में मुहम्मदाबाद, जमानियां, जहूराबाद आदि।

..तो क्या वाकई ऐसा हो रहा कप्तान साहब!


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साहब! वैसे नहीं हैं। ईमानदारी का व्रत लेकर आए हैं। जैसे हैं, वैसे ही बने रहेंगे। यह जुमला दूरदर्शी ने तब सुना था, जब बनारस के कप्तान साहब ने पदभार संभाला था। दूरदर्शी की आंखों में चमक उभरी थी और लगा था कि शायद पहली दफा यहां उस आदमी का आना हुआ है, जिसकी सालों से तलाश थी। लेकिन पता नहीं बनारस की हवा में ऐसी कौन सी मादकता है कि चंद दिनों बाद जिम्मेदारियां ऊंघने लगती हैं। सारा का सारा रुतबा बिजुका के मनिंद हवा में झूलने लगता है।
दूरदर्शी यह बात किसी सिद्धांत के तहत नहीं कह रहा है, बल्कि उसका अनुभव बोल रहा है। दरअसल यह बनारस की परंपरा रही है कि यहां जब कोई बड़ा पुलिस अफसर आता है तो आते ही चौके-छक्के जड़ने शुरू कर देता हैं। इस बार भी यही हुआ। कप्तान साहब बनारस आए तो ‘रामराज’ वाली हरकतें शुरू कर दी। कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए थानों ने अंगड़ाइयां लेनी शुरू कर दी। पुलिस के रोजनामचे ‘गुडवर्क’ से भरने लगे।
शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो जब पुलिस दो-चार बोतल शराब, आठ-दस पुड़िया चरस-हेरोइन, एक-दो तमंचों की बरामदगी न करती हो। कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता होगा जब एक-आधा दर्जन ‘छुटभैया’ किस्म के लोगों को बनारस पुलिस मेहमान न बनाती हो। हालांकि यह सिलसिला सालों से जारी है। हैरत की बात यह है कि बनारस के बड़े पुलिस कप्तान आज तक यह पता क्यों नहीं लगा पाए कि आखिर ये कौन लोग हैं, जो अवैध शराब और चरस बेचते हैं अथवा वे कौन लोग हैं जो अवैध हथियारों के सप्लायर हैं?
दूरदर्शी को लगता है कि पुलिस की इस धंधे में मिलीभगत है या फिर इतनी काहिल हो गई है कि पका-पकाया खाना ही जानती है, उद्यम करना नहीं। पुलिस गुडवर्क तो बना रही है, लेकिन पूछ की परछाई तक नहीं छू पा रही है। दरअसल पुलिस इन दिनों एक दूसरे काम में व्यस्त है। वह है वाहनों से वसूली। बेशर्मी तो यह है कि यह वसूली खुद नहीं करती। नौनिहाल करते हैं। शहर का शायद ही कोई इलाका होगा, जहां गाड़ियों से वसूली करते बच्चे न दिखते हों। मौके पर पुलिसकर्मी मौजूद होते हैं और बच्चे उगाही करके उनकी थैली भरते जाते हैं। कत्ल, चोरी, डकैती, तस्करी, छेड़खानी, गुंडागर्दी भले ही न रुक रही हो, लेकिन पुलिस का ‘खेल’ जारी है।
यह सच्चाई है कप्तान साहब! इन दिनों आपकी पुलिस सिर्फ विदूषक की तरह हवा में तलवारें भांजकर अपना जौहर दिखा रही है। असुरक्षा और अविश्वास का माहौल बनता जा रहा है पुलिस के खिलाफ। भई, कुछ तो करो अब, ताकि दूरदर्शी को भी लगे कि कुछ ठोस किया जा रहा है, इन सब माहौल के खिलाफ। यह कानाफूसी अब जोरों पर होने लगी है कि पुलिस सारा काम छोड़कर सिर्फ उगाही करने-कराने में जुटी है। आलस्य और नकारापन छिपाने के लिए खुद ही बड़ी तादाद में शराब-चरस मंगवाती है और लोगों को चरस, शराब व गांजे के साथ सींखचों में डाल देती है। पहले यजमानों से उगाही में बनारस के कुछ पंडे बदनाम थे और अब पुलिस, तो क्या वाकई ऐसा हो रहा है कप्तान साहब?
चलते-चलते
आप सत्यवादी हैं, विनोदी हैं, प्रशांत हैं, सुनयन हैं, सुंदर हैं, समाज को आनंद पहुंचाने का काम करते हैं, दीन-दुखियों के प्रति स्रेही हैं, भानु से आलोकित जग को सत्यपथ दिखाते हैं तो सावधान! पुलिस आपके पीछे है। पुलिस हमेशा अच्छे लोगों का पीछा करती है। दूरदर्शी यह नहीं कह रहा है कि आप पुलिस के डर से अच्छाई से तलाक ले लें।
दूरदर्शी चाहता है कि आप ‘हृदयेश’ बनें और गिरिराज पर विजय प्राप्त करें। कुलदीप नहीं, विश्वदीप बनें, लेकिन जरा पुलिस से बचकर रहें। यदि पुलिस को मालूम हो गया कि वाकई आप अच्छे हैं, तो गई भैंस पानी में। क्या यह परेशानी-हैरानी की बात नहीं है?
और अंत में
जैसे-जैसे ‘उनके’ चेहरों से हट रहे नकाब।
खतरनाक ईमानदारी के बादल छंट रहे जनाब।।
० दूरदर्शी

जी हां! हम गंदे हैं, मनाइए अच्छे दिन का जश्न

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कुछ लोगों को शिकायत है कि अपना शहर बहुत गंदा है। तरक्की नहीं, गंदगी में नाम रौशन कर रहा है। दूरदर्शी को इस तरह की बातें कतई पसंद नहीं हैं। अगर शहर गंदा नहीं होता तो भारत में उसका शुमार टॉप डर्टी शहर में कैसे होता? स्मार्ट सिटी का खेल कैसे होता। लोग क्योटो और अच्छे दिन का ख्वाब कैसे देखते। जरा सोचिए कितना अच्छा लगता है जब आप सुबह लकालक कुर्ता अथवा पैंट-शर्ट पहनकर निकलते हैं और शाम को जब घर वापस आते हैं तो काली छींटदार शर्ट पहने होते हैं। मोहल्ले वाले जान ही नहीं पाते कि आपके पास कितनी कमीजें हैं। रहा पैंट का सवाल तो उसे साफ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। हां, यह जलन जरूर रहती है कि उसकी पैंट मेरी पैंट से कम गंदी कैसे...? लेकिन जिनकी कमीज छींटदार नहीं हो पाती, उन्हें गंदगी बहुत खलती है। जिन्हें खलती है, खलती रहे। दूरदर्शी का तो सीधा सा फंडा है-हम गंदे थे, गंदे हैं और गंदे रहेंगे।
पड़ोसी मगरू चचा सुबह नाक पर रुमाल लगाए मिले। मैं पूछ बैठा-क्या कोई बीमारी हो गई है? बोले, नालियों की बदबू से नाक दबाए हुए हूं। कागज पर सफाई हो गई है और नालियों कीचड़ भरा है। सड़कों पर गंदगी है। कूड़े के पहाड़ हैं। मैने मंगरू चचा को समझाया कि हमारे गंदे नगर निगम ने नालियां बनाई ही इसीलिए है कि कीचड़ बहे, उसमें कीचड़ भरे। जब नालियां बनाई जा रही थीं, तब सभी खुश थे। अब कीचड़ भरा है तो खल रहा है। नगर आयुक्त साहब... आप चिंता न कीजिए। शहर के लोगों को तो शिकायतें पालने का शौक चढ़ा हुआ है।
दूरदर्शी ने सुना है कि बेनिया में चाय की अड़ी पर रोजाना चर्चा होती है आजकल शहर में सड़क पर जानवर बहुत घूमते हैं। आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। पता नहीं लोग कैसे चलते हैं सड़क पर। दूरदर्शी को तो कहीं जानवर दिखते ही नहीं हैं। मान लें कि सड़क पर गाय-सांड घूम रहें हैं तो कौन सी आफत है। सांड़ तो काशी की पहचान हैं। जब आदमी मुंह उठाए हांफता-डांफता इधर-उधर घूम सकता है तो बेजुबान जानवरों के घूमने पर लोगों को एतराज क्यों हैं? नगर आयुक्त साहब आप लोगों को समझाइए कि कभी जानवरों की तरफ से तो यह आपत्ति नहीं आई कि सड़क पर आने-जाने वाले बहुत बढ़ गए हैं। लोगों को पास गाड़ियां भी बढ़ गई हैं। टैंपो वाले, रिक्शे वाले बढ़ गए हैं। जाम का झाम भी बढ़ गया है। दूरदर्शी का तो कहना है कि जैसे जानवरों के हृदय में हमारे लिए भाईचारे की भावना है, वैसी भावना हमारे हृदय में भी होनी चाहिए ताकि आदमी और जानवर का भेद मिट सके। सब एक-दूसरे को चाट सकें, सींघ मार सकें, गाहे-बहाहे पटककर सीने पर चढ़ सकें। दरअसल सड़क पर जगह की कमी नहीं हैं। हममें चलने की तमीज ही नहीं है।
गीलटबाजार के पत्रकारपुर में एक बुजुर्गवार पत्रकार इनदिनों कुछ ज्यादा ही खफा हैं कि सड़कें खुदी पड़ी हैं। मेनहोलों का मुंह बंद ही नहीं होता। कोई कूड़ा नहीं उठाता। आने दो वोट मांगने वाले सभासदों को। मुंह पर कीचड़ लगा दूंगा। उम्मीद थी कि सभासदगण जिंदगी और गंदगी में कुछ फर्क जरूर करेंगे, लेकिन जैसे होता आया है, वैसा ही हुआ। हमने जिसे वोट दिया जिंदगी उसके पास चली गई। हम लोगों के लिए वही पुरानी चिर-परिचित गंदगी रह गई। आपको भले ही गंदगी से परहेज हो,लेकिन दूरदर्शी को तो अब बिना गंदगी के नींद ही नहीं आती। बड़ी अजीब सी आदत हो गई है। सुबह से शाम तक कोई सभासद मिले अथवा बजबजाता कूड़े का ढेर। अगर इन दोनों में से किसी एक के दर्शन नहीं होते तो नींद ही नहीं आती। वैसे आपको बता दूं, आज तक ऐसी रात कोई नहीं बीती, जब नींद न आई हो। शहर में चहुंओर कूड़े का पहाड़ दिखता है और सभासद भी। इनदिनों तो हालत यह है कि सड़कों के खुद जाने से कदम-कदम पर कीचड़ है और हर चौराहे पर सभासद। चाहें कीचड़ देखकर सो जाएं, चाहे सभासद को देखकर।
गंदगी के छींटों से कमीज जब हसीन दिखती है।
बिन पिए जाम मन की महफिल मदहोश करती है।।
0 दूरदर्शी

....और किसी के हिस्से में ‘जाम’ आया

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किसी के हिस्से में ‘प्यास’ आई, किसी के हिस्से में ‘जाम’ आया...। फिल्म ‘दो बदन’ के गीत की ये पंक्तियां इन दिनों अपने काशी के पर सटीक बैठती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अपने शहर के हिस्से में ‘प्यास’ भी आई और ‘जाम’ भी आया। प्यास के नाम पर न जाने कितने अरब रुपये खर्च हो गए। टंकियां बनीं भी तो शो-पीस बन गईं। प्यास के नाम पर न जाने कितने हैंडपंप उखड़ गए...। कागजों पर कुएं भी खुद गए...। इतना ही नहीं, कई मंत्री भी बने-बिगड़े। पीएम भी बने, पर प्यास है कि यहां ‘घर जवाई’ बनकर बैठ गई है। प्यासे शहर के हिस्से में जो ‘जाम’ आया (कांच के गिलास वाला नहीं...) वह ऐसा है जो सड़कों पर लुढ़कता है और बंद कर देता है लोगों के दिलों की धड़कनें...कुछ की जान समय से अस्पताल न पहुंच पाने के लिए जाती है तो कुछ की खून के लिए...। शहर में न जाने कितने पुलिस अफसर आए पर जाम नहीं रोक पाए। कुछ महीने पहले दूरदर्शी ने सुना कि जाम का झाम खत्म करने के लिए नए ‘साहब’ आए हैं। कमल भी हैं और किशोर भी हैं। दूरदर्शी को लगा कि काशी की जनता को ‘मदहोश’ करने वाले जाम से निजात दिलाएंगे...। तब दूरदर्शी की आंखों में चमक उभरी थी कि शायद पहली बार इस शहर में किसी ऐसे अफसर का आना हुआ है जो ‘जाम’ से बेहाल शहर को मुक्ति दिलाएगा। ट्रैफिक इंतजाम दुरुस्त कराएगा... पर ‘जाम’ है कि ‘बेताल’ की तरह लटका ही हुआ है... और उतरने का नाम नहीं ले रहा है...।
कुछ दिनों पहले की तो बात है। दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरू चचा की रिश्तेदारी में शादी थी। उन्हें अपनी बहन को ‘इमली घोंटाना’ था। सुबह घर से निकले तो जाम के झाम में फंस गए। जाम में ऐसे फंसे कि अगले दिन पहुंच पाए...। तब से मंगरू चचा की बहिन मुंह फुलाए है...ताना मारती है कि भैया बहाना मारते हैं...। चलो इमली घोंटा न सकते थे तो कम से कम भांजी की शादी में तो समय से पहुंच जाते तब भी कलेजा जुड़ाय जाता। मंगरू चचा ने अपना दर्द बयां किया और एक जिम्मेदारी भी सौंप दी कि दूरदर्शी तुम ‘जाम’ पर शोध करो...। पता करो कि ‘जाम’ यूं ही छलक रहा है या अफसर छलका रहे हैं...? मंगरू चचा की बहिन को यकीन दिलाने के लिए दूरदर्शी ने ‘जाम’ पर शोध करने की जिम्मेदारी ओढ़ ली। आनन-फानन में शोध कर डाला...। काशी में जाम तीन तरह के होते हैं। पहला-आकस्मिक जाम, दूसरा-आयोजनगत जाम और तीसरा-नेता पोषित जाम। आकस्मिक जाम तो ‘नो इंट्री’ में रिश्वत देकर आने वाली गाड़ियों अथवा स्कूल की लंबी बसों के शहर में घुसने से लगता है। काशी में जाम के लिए लोगों की आपाधापी और भांग का गोला लगाकर चलने वाले भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। हालांकि ये जाम ज्यादा दुखदायी नहीं होते...। जैसे लगते हैं, वैसे ही हट जाते हैं। काशी में सर्वत्र जाम लगता रहता है। काशी के कुछ लोग इस जाम से बुरा नहीं मानते...। जानते हैं क्यों? जितने समय में जाम लगता है उतने में दुकानों पर पहुंचकर पान की गिलौरी मुंह में दबा लेते हैं। जो पनखौव्वे नहीं, वे अपनी जेब से चुनौटी निकालकर सुर्ती मलना शुरू कर देते हैं। कुछ मजनूं टाइप युवक और युवतियां बाइकों पर बैठकर अपने ‘प्यार’ का इजहार करने का मौका भी निकाल लेते हैं...।
दूसरे तरह का जाम वह है जो किसी आंदोलन के समय लगता है...। फिर वहां पुलिस आती है... भाषण होते हैं, लाठियां चलती हैं...और जब कोई नेता आता है तो जाम खत्म हो जाता है। दूरदर्शी की नेक सलाह है कि समझदार बनिये। इन दिनों एक पार्टी के नेता-कार्यकर्ता थाने पर प्रदर्शन कर रहे हैं। काशी में ज्यादातर थाने सड़कों पर हैं। यदि आप समझदार हैं तो उस रास्ते पर जाने का इरादा त्याग दें, जिन रास्तों पर थाना है... पुलिस है...। यदि नहीं तो आपका घर पहुंचना, न पहुंचना आंदोलन पर निर्भर करेगा।
तीसरे तरह का जाम सबसे ज्यादा टिकाऊ, खतरनाक, रोमांचक है और उद्देश्यपूर्ण होता है। यह नेतागिरी की जमीन पर नाम पाने के लालच में... आम जनता की सुविधाओं के नाम पर लगता है। ये जाम मुद्दा हो या न हो कहीं भी...कभी भी लगाए जा सकते हैं। यह फैशनेबल जाम नेताओं की फोटो खिंचते ही हट जाता है। कभी-कभी (यदि पुलिस और जाम लगाने वाले आमने-सामने हो जाएं तो) देर तक जीवित रहता है। इस तरह के जाम में फंसे लोग यदि अपना काम-धाम भूलकर जाम में खो जाएं तो ‘थ्री डी’ का आनंद मिलता है।
दूरदर्शी के शोध से यह भी निष्कर्ष निकला है कि शीशे की गिलास में भरा पूरा ‘जाम’ होने से लोगों की प्यास बुझती है, पर ये जाम तो लोगों को प्यासा मार सकता है...। किसी को खून की जरुरत है और लहुराबीर स्थित आईएमए के ब्लड बैंक आना है तो मरीज की आसानी से जान ले सकता है...। बाबा की नगरी में ‘जाम’ अब मरीज को खून की बोतल समय से न पहुंचने की गारंटी देता है। सैकड़ों घायलों...बीमारों ने अस्पताल पहुंचने से पहले ‘जाम’ पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए। हजारों रिश्ते टूट गए। कई जोड़ों की मंगनी टूट गई तो कई जाम स्थल पर ही जोड़ीदार हो गए। हजारों के साक्षात्कार और परीक्षाएं छूटीं तो कइयों ने भूख-प्यास का साक्षात्कार किया। शायद ही कोई शख्स ऐसा हो जिसे देर से घर पहुंचने पर ‘घरवाली’ ने हड़काया न हो...। दूरदर्शी को ऐसे सभी लोगों से हमदर्दी है जो जाम में फंस चुके हैं और वह बाबा भोले से प्रार्थना करता है कि जाम लगाने वाले...सड़कों और थानों पर धरना-प्रदर्शन करने वाले टिकाऊ जाम के झाम में फंसें ताकि उन्हें भी पता चल सके कि ‘जाम’ लगाने और ‘जाम’ ढालने में फर्क क्या है। एसपी ट्रैफिक, पुलिस कप्तान और कलेक्टर को दूरदर्शी की सलाह है कि वे ‘जाम’ के लिए कुछ नहीं कर सकते तो उसे काशी की संस्कृति में जरूर शामिल करा दें...। रांड, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी... वाली कहावत के आगे ‘जाम’ भी जोड़वा दें...। काशी के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करा दें...। जाम पर शोध होंगे तो पीएचडी की डिग्री लेने वाले तमाम युवाओं का जीवन संवर जाएगा।
‘जाम’ पी लिया करते हैं जीने की तमन्ना में।
‘डगमगाना’ भी ज़रूरी है संभालने के लिए।।
0 दूरदर्शी

चाचा-भतीजे’ की जंग नहीं, सत्ता-विमर्श है जनाब!


इन दिनों------
बनारस के गली-कूचों में, मोहल्लों-चौबारों में, चाय-पान की अड़ियों और हजामत बनाने वालों में जब से चाचा-भतीजे की चर्चा ने जोर पकड़ी है तब से तेलियाबाग में सिनेमाघर पर हुजूम जुट रहा है। सिनेमाघर के मालिक पर बड़ा दबाव है। रिक्शावाले, ठेलावाले, सब्जीवाले, मोची और पल्लेदारों की डिमांड है कि इन दिनों ‘चाचा-भतीजा’ फिल्म दिखाएं। वे भी ‘बुरे काम का बुरा नतीजा, क्यों भई चाचा.., हां भतीजा... गुनगुनाएं...।’
दूरदर्शी ने सुना है कि इन दिनों ये गाना लखनऊ में झमझमा रहा है। गाना इतना झक्कास है कि समूचे यूपी के लोग ‘दाद’ दे रहे हैं। मनोरंजन के लिए कोई शिवपाल को सराह रहा है, कोई अमर को। कुछ लोग मुलायम और अखिलेश के कसीदे पढ़ रहे हैं। जूते की ताल पर बज रहा यह फिल्मी गाना काशी के लोगों को भी दीवाना बना रहा है।
बुजुर्गवार पड़ोसी मंगरू चचा घर आए तो उन्होंने भी ‘चाचा-भतीजा’ राग छेड़ दिया। बोले, ‘दूरदर्शी तुमने बहुत फिल्म देखी होगी, लेकिन ‘चाचा-भतीजा’ जैसी नहीं। इसके सभी एक्टर समाजवादी कुनबे के हैं। जो बाहरी हैं, वे मुलायमवादी है। शायद अखिलेश को सत्ता जाने का डर है। इसलिए वह चाहते हैं कि सभी पात्र खुद तय करें। मगर शिवपाल हैं कि मानते ही नहीं।’
जब से चाचा-भतीजे में जंग शुरू हुई है तब से दूरदर्शी को महाभारत काल याद आ रहा है। उस समय भी कौरवों-पांडवों के कुनबे में भीषण युद्ध हुआ था। तब फसाद की जड़ में थे गांधारी के भाई शकुनी। अबकी मुलायम के कुनबे में, घर में, पार्टी में जूतम-पैजार हो रही है तो शकुनी का रोल अदा कर रहे हैं अमर सिंह। यह दूरदर्शी नहीं, मुलायम के भाई रामगोपाल कह रहे हैं। वे बेहद भयभीत हैं। उन्हें लग रहा है कि अमर सिंह अब समर सिंह बन बैठे हैं। कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते। जिन लोगों ने उन्हें अपमानित कर पार्टी से निकलवाया था, शकुनी की तरह वह भी उन्हें बरबाद करके छोड़ेंगे।
लखनऊ से सैफई तक अखिलेश-शिवपाल समर्थकों में चल रही लट्ठ से मगरू चचा दहल गए हैं। वह इस बात से आहत हैं कि अखिलेश एक ओर विपक्षी दलों से लड़ रहे हैं तो दूसरी ओर, अपने कुनबे से। अब उनके समर्थक भी आपस में जूतम-पैजार कर रहे हैं। यह सब कब तक चलेगा? आखिर चाल और चरित्र भी कोई चीज होती है?
दूरदर्शी ने कहा, ‘राजनीति और चरित्र का परस्पर मेल कैसा? ये दो अलग-अलग ध्रुवों की भिन्न विचारधाराएं हैं! असली नेता वही है जो जिस थाली में खाए, उसी में छेद करे। सपाइयों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए। उनके पास मल्ल-युद्ध का पुराना अनुभव है। वे आपस में निपट लेंगे। रही बात मुलायम की तो उनकी महिमा विचित्र है। बड़े-बड़े नेता और समाजवादी कहते हैं कि उनकी भक्ति के बिना उनको समझा नहीं जा सकता। भक्ति के बाद भी उन्हें कोई जान ले इसकी गारंटी नहीं है। वह ऐसे समाजवादी हैं जो शायद ही किसी को जीवन भर साथ लेकर चले हों। देखा नहीं, विहार चुनाव में उन्होंने नीतीश-लालू को कैसा झटका दिया? कभी माया से दोस्ती गांठी तो कभी ममता से। मौका आया तो वामपंथियों को, कांग्रेसियों को, कल्याण को, अजित को किनारे करने में तनिक संकोच नहीं किया।’
पिछली दफा सपा सत्ता में आई थी, तब भी चाचा-भतीजे में ‘टशन’ हुई थी। उस समय मुलायम की आंखों पर पुत्र मोह की पट्टी बंधी थी। अब उतर गई है। इन दिनों भाई के साथ खड़े हैं। लोग-बाग कह रहे हैं कि उन्हें डर सता रहा है कि अगर पार्टी और सरकार, अखिलेश के कब्जे में रही तो वे शिवपाल को, उनके बीवी-बेटे को दूध की मक्खी की तरह बाहर फेंक सकते हैं। डर मुलायम को ही नहीं, शिवपाल को भी है, उनकी बीवी और बेटे को भी है। लोग-बाग कहते हैं कि इस्तीफा बम में लुत्ती मुलायमवादी अमर सिंह के अलावा उनकी पत्नी और बेटे ने लगाई थी।
मुलायम इन दिनों अपने कुनबे की पंचायत में मशगूल हैं तो राहुल बाबा खाट सभा और मूढ़ा पंचायत में। काशी के ज्योतिषी नेताओं का भाग्य बांचने में जुटे हैं। शिवपाल पर राहू और अखिलेश पर केतु का प्रकोप बता रहे हैं। ज्योतिषीय गणना से निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि ये युद्ध विराम स्थायी नहीं, तात्कालिक है। वर्चस्व की ये लड़ाई बड़े युद्ध का आगाज है। मुलायम के कुनबे का झगड़ा काशी के लोगों को मजा दे रहा है। जहां देखिए, दो पक्ष मंचासीन होकर खम ठोकते नजर आते हैं।
लड़ाई सड़क पर है, लेकिन मुलायम का कुनबा दुहाई दे रहा है कि मीडिया को चाचा-भतीजा का घर झांकने की आदत सी पड़ गई है। कहते हैं, ‘यह तो मीडिया ही है, जो हमें लड़ाए जा रहा है। इन दिनों जो कुछ हो रहा है वह समाजवादी सत्ता-विमर्श है। दूरदर्शी को पता है कि जिस पार्टी में कुनबा सर्वोपरि होता है, वहां थालियां खनकती ही हैं। मुद्दा चाहे माफिया को समाजवादी बनाने का हो अथवा मंत्रियों की बर्खास्तगी का।’
और अंत में....
तमन्ना जब किसी की नाकाम होती है,
जिंदगी उसकी एक उदास शाम होती है।
दिल के साथ दौलत ना हो जिसके पास,
मोहब्बत उस गरीब की नीलाम होती है।।
0 दूरदर्शीhttps://www.facebook.com/vijay.vineet.9/posts/1171169979588170

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कप्तान साहब ! पेटेंट करवा दीजिए 'चोरी' का फार्मूला

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कप्तान साहब! अपनी काशी में इन दिनों किसी की बहार है तो चोरों की। नदियों में बाढ़ है-तो चोरियों की भी बाढ़ है। अपने अनोखे शहर को चोरों का स्वर्ग बनाने के लिए शुक्रिया। यहां-वहां-जहां-तहां मन चाहे वहां चोरी कीजिए। जल, नभ, अचल, अतल-वितल पर भी हाथ साफ कीजिए। हीरों का हार चुराइए या हिरोइन अथवा हेरोइन। जी-भरकर चोरी कीजिए। ज्यादा से ज्यादा चुराइए। कोई कुछ नहीं कहेगा। बस दरोगा साब को खुश रखिए। काशी के चोर खुशनसीब हैं। इन्हें खुश रहने और खुश करने का समीकरण आता है। शहर के चोरों के हाथ लंबे हैं। अगर आप थाने जाकर कहेंगे कि दरोगा जी चोरी हो गई तो समझिए घर में जो कुछ बचा है वह भी साफ।
शहर में जब से चोरियों की बाढ़ आई है तब से दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरू चचा चिंता में फुंके जा रहे हैं। उनकी भीम जैसी काया डेढ़ पसली की हो गई है। खून बनने से पहले ही पानी बन जाता है। चिंता के कारण कमर 'समकोण' पर झुकी जा रही है। चोर कब घर का सारा माल साफ कर दें? भला कौन जानता है? मंगरू चचा ने अपना दर्द साझा किया तो दूरदर्शी ने पता लगाया कि इन दिनों लंका थाना क्षेत्र में चोर नया रिकार्ड बनाने में जुटे हैं। दूरदर्शी ने दुर्भाग्य से वहां पुलिस का मेहमान बने एक चोर से पूछा-भई चोरी-चकारी क्यों करते हो? कोई काम-धाम करो। कुछ तो ख्याल करो अपने मां-बाप का। बीवी-बच्चों का। यह सुनकर चोर बोला, 'दूरदर्शी हमें भले ही गाली दे लीजिए, लेकिन 'चोरी' का नाम श्रद्धा से लीजिए। हमें चोर नहीं, श्रीमान चोर जी कहिए। आपसे किसने कह दिया कि चोरी करना कोई काम नहीं है। अरे, चोरी तो चौसठ कलाओं में से एक है। मैं चोरी का रिकार्ड बनाने में जुटा हूं और आप हमें कोस रहे हैं। जिसने चोरी की कला सिखाई वह 'भगवान' बन गया। यकीन न हो तो कृष्ण को पढ़िए। श्रीकृष्ण ने बचपन में ही चोरी शुरू कर दी थी और वह भगवान बन गए थे। काश मैं बचपन में ही चोरी की कला सीख जाता तो अब तक न जाने कहां होता।'
चोर के तर्कों को सुना तो दूरदर्शी का जी कचोटने लगा कि पत्रकार-लेखक क्यों बन गया। दूसरी गलती की अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की। पैदा होते ही मैं भी उन्हें चोरी की ट्रेनिंग दिलवा देता तो शायद हमारे भी भाग्य खुल जाते। बेटे का नाम कृष्ण रखता। बेटा भगवान बन जाता और लोगों को कंसों के सीकचों से मुक्त कराता। कप्तान साहब आप धन्य है और आपके मातहत भी। अपने फार्मूले को पेटेंट करा लीजिए-चोरी कराइए, भगवान बनाइए। दूरदर्शी तो बंदर की तरह है, भला अदरक का स्वाद कैसे जान सकता है। कप्तान साहब चोर और चोरी की महिमा तो सही मायने में सिर्फ आप और आपका महकमा ही जानता है। हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह चोर की महिमा भी अनंत है...।
दूरदर्शी ने सुना है कि गांधीजी ने भी बचपन में एक बार चोरी की थी। आज दुनिया में उनका नाम है। मतलब यह है कि दुनिया में जितने भी बड़े आदमी हैं उनका, चोर और चोरी से चोली दामन का साथ है। शहर के पत्रकारों को दूरदर्शी की नेक सलाह है कि वे अपने बेटे-बेटियों को चोर-चोरनी बनाएं। बाइक-कार चोरी कराएं। सेंध लगाने की कला में महारत हासिल कराएं, वरना जिंदगी भर 'कलम घिस्सू' बनकर रह जाएंगे...। इस महान काम को कोई ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा थोड़े ही कर सकता है। चोरी वह कर सकता है जिसके सिर पर पुलिस का हाथ होता है। कलयुग में तो चोरी ही सफलता का मूल मंत्र हैं। दूरदर्शी को पता चला है कि आजकल चोरों के पौ बारह हैं। शहर में कई महीनों से इनकी संख्या दिन दूनी-रात चौगुनी बढ़ रही है। दूरदर्शी अब कलेक्टर विजय किरण आनंद से मिलने को सोच रहा है। उन्हें राय देना चाहता है कि 'चोरी' को कौशल विकास मिशन में शामिल करा दें। चोर बेरोजगारी दूर करने के राष्ट्रीय कार्यक्रम में फोकट में सहयोग कर रहे हैं। आखिर चोर भी कोई ऐरे-गैरे नहीं हैं। भगवान श्रीकृष्ण के वंशज हैं। उनकी श्रेष्ठ परंपरा के वाहक हैं। सावन का मेला आने वाला है। इसलिए दूर-दूर से चोरगण काशी आ रहे हैं। खुद कमा रहे हैं और दूसरों को भी कमवा रहे हैं। शहर की जनता को क्या मालूम कि श्रम, न्याय, वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य समेत तमाम महकमों में चोरों को अब सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। काशीवासी चोरों को अब चोर नहीं, श्रीमान चोर जी कहिए....।

गए थे हरि भजन को....
अपने कलेक्टर साहब बेहद फुर्तीले हैं। चाहते हैं कि उन जैसी फुर्ती सभी दिखाएं। कुछ रोज पहले उन्होंने परिवहन महकमे के आधा दर्जन अफसरों को रात में अपने बंगले पर तलब किया। भेज दिया ओवरलोड वाहनों को पकड़ने के लिए। अफसर दौड़ पड़े। धर-पकड़ शुरू हुई तो भाग-म-भाग में एक ट्रक चालक अपनी टांग तुड़वा बैठा। आरोप लगा कि परिवहन कर्मियों की पिटाई से उसके पांव टूटे गए। परिवहन महकमे के अफसर कलेक्टर के पास पहुंचे और सच्चाई बयां की। इससे पहले कई परिवहनकर्मियों के नाम पुलिस रोजनामचे में चढ़ गए। इनकी हालत अब ऐसी हो गई है जैसे-गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास..। अपने कलेक्टर अब सुनते ही नहीं और पुलिस वाले हैं कि सरकारी धन की उगाही करने वाले विभाग से ही 'उगाही' में जुटे हैं..।

और अंत में......

बहुत ऊंची दुकानों में कटाते जेब सब अपनी/मगर मजदूर मांगेगा तो सिक्के बोल जाते हैं...।
ये कुर्सी मुल्क खा जाए तो कोई कुछ नहीं कहता/मगर रोटी की 'चोरी' हो तो सारे बोल जाते हैं..।।
0 दूरदर्शी

विजय विनीत(Vijay Vineet) :साहसिक पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर

विजय विनीत ने उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में आतंकवाद और सांप्रदायिक दंगों की उस समय रिपोर्टिंग की, जब लोग साहसिक रिपोर्टिंग करने के बारे में सोच भी नहीं पाते थे। उन्होंने न सिर्फ  पत्रकारिता को नैतिक स्वर दिया, बल्कि पीड़ित समाज के उत्थान के लिए कई बार अपने जीवन की बाजी भी लगाई। वह न कभी झुके, न टूटे और न कभी हताश हुए। पेशेवर नहीं, एक जिम्मेदार नागरिक की तरह उन्होंने देशप्रेम ही नहीं, सामाजिक दायित्वों को बखूबी निभाया है। सरकार कोई भी रही हो, उसका प्रवक्ता अथवा सुपारी किलर बनकर कभी काम नहीं किया।

बेहद जुझारू, अक्खड़, ठेठ बनारसी पत्रकार विजय हर समय  पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत ‘तटस्थता’ का और पाठकों के प्रति ईमानदारी का मूल्य अदा किया। इनकी रचनाओं में जीवन का मुक्त सच, जीवन का संघर्ष झलकते हैं। देश के किसानों और आम आदमी की विवशता का दर्दनाक चित्रण करना विजय विनीत का प्रिय शगल रहा है। ग्रामीण परिवेश में बदरंग जन-जीवन और कमजोर हो चुकी जिंदगियों को बचाने में, भ्रष्टाचारियों को राष्ट्रवाद और समाजवाद का इंजेक्शन लगाने में कभी पीछे नहीं रहे।

विजय विनीत हमेशा मानते रहे हैं कि पत्रकार खुद खबर नहीं होते, लेकिन समाज उससे एक बुनियादी और ईमानदारी की मांग हमेशा जरूर करता है। पत्रकार के लिए खबर से अधिक अहम कुछ नहीं है, अपनी जिंदगी भी नहीं। वर्ष 2002 में बनारस के ओंकालेश्वर मंदिर परिसर में हुए दंगे में इनके सिर में गंभीर चोटें आईं, फिर भी बुलंद हौसले के साथ खबरें लिखीं।[5]

समाज में लगातार बढ़ती बेईमानी, छल-कपट और सियासी हथकंडों के दौर में भी विजय विनीत कभी न झुके, न टूटे। तमाम अवसर आए जब झूठ के खिलाफ, पाखंड के खिलाफ पूरे दमखम और साहस के साथ कलम की ताकत से लड़े। खासतौर पर समाज के आखिरी के मुद्दों पर किसी खबर को मरने नहीं दिया। चाहे एमसीसी के नक्सलियों के गढ़ रहे नौगढ़ (चंदौली) के कुबराडीह की भुखमरी रही हो या भूख से बिलखती महिलाओं और तड़पते लकड़ी चबाते बच्चों की बेबसी। इनकी बेबसी को अपनी कलम की ताकत देकर तरक्की की नई इबारत लिखी। पत्रकार विजय विनीत के संघर्षों की देन है कि नौगढ़ में अब नक्सली नहीं, कंगाली नहीं-हरियाली है। रूदन के स्थान पर मंगल गीत गाए जा रहे हैं। घर-घर में टीवी है, डिश एंटिना है, कुकर पर भोजन पकता है। साइकिल के बदले मोटरसाइकिल और नंग-धड़ंग बच्चे और अधनंगे बूढ़े अब चमचमाते कपड़ों से लैस हैं। सिर्फ कुबराडीह ही मगन नहीं, मानो समूचा नौगढ़ मुस्कुरा रहा हो।
सिर्फ पूवार्चल ही नहीं, उत्तर प्रदेश उत्तराखंड के तराई इलाकों में जिन रास्तों पर कंक्रीट नहीं ढले थे, जिन छतों को लिंटर नहीं मिला था, जो पैर चमड़े के जूते से दूर थे, जिन हाथों ने कभी घड़ी नहीं पहनी और जो कमजोर आंखें चश्मों के लिए मोहताज़ थे, उनके उत्थान के लिए, उनकी तरक्की के लिए विजय विनीत एक बड़े वेग साबित हुए।

दिल्ली, लखनऊ के तमाम तथाकथित बड़े पत्रकारों के नाम आज भी आधी आबादी के लिए कोई मायने नहीं रखते जिन्हें दो वक्त की रोटी किसी तरह से नसीब हो पाती है, जिन्हें नैसर्गिक न्याय नहीं मिल पाता। 13 जुलाई 1991 को विजय विनीत की एक खोजी रपट ने 25 बरस बाद उन 11 निर्दोष नागरिकों के परिजनों को न्याय दिलाई है जिन्हें पीलीभीत पुलिस ने उग्रवादी बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था। मारे गए सभी सिख तीर्थयात्रा से लौट रहे थे। सीबीआई के विशेष जज लल्लू सिंह ने 29 मार्च 2016 को फैसला सुनाते हुए 47 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

कलम के जादूगर विजय विनीत ने स्वस्थ समाज के लिए आतंकवाद के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ, तमाम बिद्रुपों के खिलाफ अनगिनत रपटें लिखीं। समाज की खुरदरी और विशाल चट्टानों को पिघलाने में कामयाब रहे। कठिन चुनौतियों के बावजूद न कभी झुके, न कभी टूटे...।
बदायूं का दंगा रहा हो अथवा बरेली का। बुलंद हौसले के साथ शोषित समाज के लिए हमेशा लड़ते रहे। पत्रकारिता को हमेशा को आजीविका का साधन नहीं, मिशन माना। यही वजह रही कि उन्होंने न तो कभी मर्यादा के पहाड़ को लांघा और न ही पथरीले रास्तों पर फिसले। सिर्फ दिलेरी ही नहीं, हौसला ही नहीं, अपनी रचनाओं में समाज को बोल-चाल की भाषा ही परोसी।

वरिष्ठ  पत्रकार विजय विनीत को साहसिक पत्रकारिता के लिए कई अवार्ड मिल चुके हैं। इसमें पीपुल्स विजलेंस कमेटी आन ह्यूमन राइट्स (पीवीसीएचआर) एवं ह्यूमन राइट्स ला नेटवर्क (एचआरएलएन) का जनमित्र अवार्ड भी शामिल है। 10 दिसंबर 2013 को दिल्ली के रफी मार्ग स्थित कांस्ट्यूशन क्लब के स्पीकर हाल में इन्हें सम्मानित किया गया।[3]

चंदौली (यूपी) के चकिया प्रखंड के उतरौत गांव में 29 मार्च 1965 को किसान परिवार में जन्मे विजय विनीत के पिता डा.रणवीर सिंह पेशे से शिक्षक और चिकित्सक रहे हैं। वे उन्हें पिता अपनी थाती सौंपना चाहते थे, लेकिन उन्होंने चुना पत्रकारिता का रास्ता। देश के जाने-माने अखबार दैनिक जागरण, अमर उजाला [6] और हिन्दुस्तान में लंबे समय तक साहसिक पत्रकरिता की। मौजूदा समय में वे जनसंदेश टाइम्स के वाराणसी संस्करण में सशक्त रूप से संपादकीय टीम का नेतृत्व कर रहे हैं। दूरदर्शी के नाम से इनका विशेष कालम इन दिनों काफी लोकप्रिय है।[2]

संपर्कः +91-7068509999, +91-9415201470
Email: vijayvineet.vns@gmail.com
वाराणसी,उत्तर प्रदेश
 
#vijayvineet #kashi #varanasi #pvchr


Source: https://www.everipedia.com/8218abca-88e8-415f-bd6c-1de9c76f084b/#ixzz4SjxilIuX

क्योटो घूमकर मगन मेयर उर्फ...वादा गुरु


‘रेस्पेक्टेबल मेयर जी उर्फ महापौर जी उर्फ नगर प्रमुख उर्फ भाजपा के नेता जी गंदगी और शहर में सड़कों की चौतरफा खोदाई से बेहाल नागरिकों की ओर से ‘हाय’ स्वीकार करें। ‘हाय’ इसलिए कि आप क्योटो से मॉडर्न होकर लौटे हैं। आपने नागरिकों को सपना दिखाया था कि काशी जल्द ही क्योटो बन जाएगी। समूचा शहर साफ-सुथरा होगा और सड़कें चमचमाती मिलेंगी। जाम का झाम भी खत्म हो जाएगा। शहर स्मार्ट हो जाएगा। लेकिन पड़ताल हुई तो काशी गंदगी के पायदान पर 65वें नंबर पर निकली। दूरदर्शी को भी आपका वादा खूब भाया था। अब मुस्कुरा रहा है...। वह नेता ही क्या जो वादा न करे..। दूरदर्शी को पता है कि नेता ऐसा प्राणी है जो वादों की बरसात तो खूब करता है, लेकिन पूरा नहीं करता।
शहर भर में गंदगी और सड़कों पर चौतरफा खोदाई से नागरिक सहमे हुए हैं क्योंकि मानसून दस्तक देने वाला है। मामूली बारिश में शहर की हालत कोढ़ में खाज जैसी हो सकती है। दूरदर्शी लोगों को समझा रहा है कि सस्ती होती जा रही जिंदगी को बचाने के लिए खुद इंतजाम कर लें। इन दिनों बनारस के किसानों से ज्यादा हड्डी के डाक्टरों को बारिश का इंतजार है। जानते हैं क्यों? सड़कों पर गड्ढों में गिरकर लोगों के हाथ-पैर टूटेंगे तो चांदी हड्डी के डाक्टर ही काटेंगे। आपको क्या है? महल में रहते हैं। जहां आपका स्कूटर खड़ा होता था, इन दिनों वहां गाड़ियों की फ्लीट खड़ी होती है। नौकरों-चाकरों की फौज है। हाथ-पैर टूटेंगे तो पब्लिक के।
शहर के लोगों के सामने समस्याएं ही समस्याएं हैं। यह तो आप जानते ही हैं। समस्याओं का कोई अंत नहीं है, मतलब समस्याएं अनंत हैं। यह दूरदर्शी भी जानता है। लेकिन आप एक चीज नहीं जानते। जानते होते तो कुछ जमीनी काम करते, कुछ करवाते। आपके खासमखास भी कहते हैं कि आप जानकर अनजान बने हुए हैं। तभी तो आप सुकून से हैं। दूरदर्शी आपको उस दिन की याद दिलाता है जब आप केबल का तार जुड़वाने के लिए गली-गली भटकते थे। चुनाव आया तो भी लोगों के आगे हाथ जोड़कर घूमे। मतलब वोट मांग रहे थे। तब आप कहते थे-आप हमें वोट दें हम काशी को जन्नत बना देंगे। वोटर भी पसीज गए। क्योटो से लौटे थे तब भी यही जुमला दोहराया था। शहर क्योटो तो नहीं, दिल्लगी जरूर समझ में आने लगी।
नरेंद्र मोदी चुनाव में उतरे तब भी आपने शहर को सपना दिखाया कि तरक्की के लिए खूब पैसा मिलेगा। जनता ने दोबारा आप पर भरोसा किया। मोदी पीएम बन गए। पिछले चार सालों से शहर के लोग प्यासे हैं। पानी की 43 टंकियां सफेद हाथी बन गई हैं। मामूली बारिश में लोग नरक झेलते हैं। गंदगी से मरते हैं। आप कह सकते हैं कि गंदगी कराने और जाम लगवाने का काम मेरा नहीं, किसी और का है। अब किसी को कुछ कहने से कौन रोक सकता है। फिर आप तो पुराने ‘कहवइया’ हैं। कौन जाने आप कब क्या कह दें। आप नगर प्रमुख जो ठहरे। सभासद आपके हैं। विधायक आपके हैं। देश आपका है।
आप धन्य हैं। शहर प्यास से, जाम से और जगह-जगह अचानक शुरू हुई खोदाई से बेहाल है। आप कलेक्टर के साथ फटफटहिया से घूमकर मगन हैं। आप का भी क्या दोष। दूरदर्शी शहर के नागरिकों को समझा देगा। बता देगा कि रोम जल रहा था तो नीरो वंशी बजा रहा था। सोमनाथ मंदिर लुट रहा था और पुजारी पूजा में व्यस्त थे। आपने पुरानी यादें ताजा कर दी, इसलिए थैक्यू, धन्यवाद, शुक्रिया..। बस आप क्योटो...क्योटो मत खेलिए। स्मार्ट सिटी का सपना मत दिखाए।
और अंत मे
अब झूठी तसल्ली की जरुरत नहीं मुझे
कह दो वादा निभाने की फुरसत नहीं तुझे
० दूरदर्शी

श्रीला गोकर्ण के चित्रों में रंग और ऋतुओं की नई वर्तनी


प्रकृति से परदा उठाते रंग----------
0 कमिश्नर नितिन गोकर्ण की पत्नी हैं श्रीला, जिनके डिजिटल चित्रों में घुली है प्रकृति 
विजय विनीत 
वाराणसी। ऋतुओं के बदलते, पतझड़-बसंत का संकेत देते, प्रकृति के रहस्य से परदा उठाते रंगों की अनगिनत बहुरंगी तानें और वातावरण के पल-पल बदलते मिजाज हैं श्रीला गोकर्ण के डिजिटल चित्रों की नई वर्तनी। इनके चटक रंगों में घुली प्रकृति में सिर्फ भारतीय ऋतुओं के नहीं, परंपराओं के भी दर्शन होते हैं। वह कल्पना का ऐसा संसार रचती हैं जिसमें न टूटन है और न तनाव है। चित्रों की शैली में रवानी है, मिठास है, रोशनी है और सुगंध है। रंगों का माधुर्य और सरलता इतनी संयत है कि वह सीधे दिलों में उतर जाती है।
न्यू मीडिया आर्ट के क्षेत्र में श्रीला गोकर्ण एक बड़ा नाम है। इसलिए नहीं कि वह बनारस के कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण की पत्नी हैं, उन्होंने डिजिटल आर्ट की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। वह मूलरूप से प्रोफेशनल और सिद्धहस्त इंटीरियर डिजाइनर हैं। लेकिन इन्होंने डिजिटल कला की एक नई शैली विकसित की है, जिसमें प्रकृति के तमाम रंग, आकार, लय-ताल के चटक रंग यथार्थ और स्वप्न के बीच लहराते नजर आते हैं। इनके चित्रों में पठनीयता के गुण इतने आसान हैं जो हर किसी को आकर्षित करते हैं। चित्रों में प्रकृति और जीवन की अनुकृति भी प्रकृति और जीवन से एक कदम आगे है।
श्रीला गोकर्ण ने कला को गढ़ा नहीं है, कला ने इन्हें गढ़ा है। कला की दुनिया का साज-संगीत इन्होंने अपनी मां से सीखा है। अब वह प्रकृति और जीवन दृश्यों की महक डिजिटल चित्रकला के माध्यम से कैनवस पर रच रही हैं। इनके चित्रों में शरद, बसंत, ग्रीष्म, वर्षा ही नहीं, जंगल और मंगल भी है। चित्र कहीं पतझड़ के और कहीं गर्मी आने का संकेत देते हैं तो कहीं ठंडी हवाओं का झोंका और चिड़ियों की चहचहाहट वातावरण को रंगीन बनाते हैं। गर्मी की ऊष्मा है तो फूलों का सुगंध और पत्तियों का निखार भी है। श्रीला के चित्र बारिश में घूमने और नंगे पांव पानी में चलने की सुखद अनुभूति का एहसास कराते हैं। जंगलों का वीरानापन कई बार मन को जीव-जंतुओं की दुनिया के करीब लाता है।
बनारस में पहली मर्तबा डिजिटल आर्ट की एकल प्रदर्शनी लगाकर श्रेया गोकर्ण ने कला प्रेमियों को यह बताने की कोशिश की है कि मनुष्य खुद एक सागर की तरह गहराई लिए होता है। डिजिटल कला भी रेगिस्तान की खामोशी को आवाज दे सकती है और अविनाशी काशी को रच सकती है।
श्रीमती गोकर्ण के चित्रों में प्रकृति के चटक रंग और कल्पना है। खुद को रंगों से जोड़ें तो नृत्य का भाव और स्वतंज महसूस करें तो ऊर्जा का संचार होगा। उत्सवी माहौल के साथ आनंद की अनुभूति का एहसास कराते हैं। श्रीला का मानना है कि डिजिटल-चित्रकारी में भी जलरंग, तैलरंग, लैंडस्केप, पोट्रेट, स्टिल-लाइफ, लाइफ स्टडी और एब्स्ट्रैक्ट, फोटोग्राफी आदि से अर्जित हुनर काम आते हैं। यह कला पुराने माध्यम व मान्यताओं को तोड़ रही है और कला-कर्म के प्रति सोच बदल रही है। लोग अब पुराने प्रतीकों, संयोजनों और आकारों से हटकर कुछ अलग देखना चाहते हैं। उस कला कर्म, सृजन का हिस्सा बनना चाहते हैं खोजना चाहते हैं कि इसमें मैं कहां हूं। इसे सिर्फ मशीनी प्रस्तुति नहीं कह सकते। डिजिटल कला-प्रयोगोन्मुखी होने के साथ ही विज्ञान और तकनीक से भी रूबरू कराती है।

अजूबा रोग है 'टिकटहिया'... चाहे तो रो लें, चाहे तो हंस लें

https://www.facebook.com/vijay.vineet.9/posts/1131002920271543

इन दिनों----- 
शहर के डाक्टरों के लाख चाहने के बावजूद डायरिया रुक नहीं पा रहा है। ऊपर से बड़ी संख्या में लोगों को 'टिकटहिया' हो गया है। अपने शहर में डायरिया तो अफसरों और डाक्टरों की मेहरबानी से फैल रहा है। 'टिकटहिया' दिल्ली और लखनऊ की ओर से आ रहे वायरस की वजह से लोगों को जकड़ रहा है। डायरिया में जान जा भी सकती है और बच भी सकती है, लेकिन 'टिकटहिया' तो सौ फीसदी खतरनाक होती है। जहन्नुम में जाने तक छोड़ती ही नहीं। 'टिकटहिया' तो घर जंवाई की तरह है। इसका कीड़ा एक बार शरीर में घुसा नहीं कि लाख एहतियात बरतरने पर भी रोगी के प्राण संकट में रहते हैं। साथ ही मोहल्ले वालों के प्राण भी हवा में झूला करते हैं। दूरदर्शी चाहता है कि इस रोग की ज्यादा से ज्यादा चर्चा हो ताकि अपने शहर के लोग 'टिकटहिया' के लक्षण भी समझ लें और निदान का तरीका भी बूझ लें।
'टिकटहिया' के बारे में सुन-सुनकर मंगरू चचा के कान पक गए तो चाय पीने के बहाने घर आ धमके। दूरदर्शी बताओ, 'आखिर ये 'टिकटहिया' बला क्या है...? यह राजनीतिक बीमारी पकड़ती कैसे है...? 'टिकटहिया' पर लोग लाखों-करोड़ों रुपये क्यों न्योछावर कर देते हैं... ?' दूरदर्शी ने मंगरू चचा को समझाया कि 'टिकटहिया' वायरस का प्रकोप हर पांच साल में फड़फड़ाता है। कुछ राज्यों में यह बीमारी साल-दो साल में ही मचलने लगती है। डायरिया में पेट, पीलिया में लीवर खराब होता है, लेकिन 'टिकटहिया' में रोगी का दिमाग हमेशा के लिए खराब हो जाता है। दरअसल यह बीमारी ही ऐसी है कि इसका कीड़ा हर समय हलचल मचाता रहता है। दिल्ली या लखनऊ पहुंचने का हौल दिल में बार-बार उठता है। मन में खदबदाहट पैदा करता है। जिसे यह बीमारी लगती है उसे न तो भूख लगती है, न प्यास...न बीवी भाती है, न बच्चे...। उसे बस मोदी, मुलायम, माया, राहुल...वगैरह ही प्यारे, दुलारे और न्यारे लगते हैं। काशी में इन दिनों 'टिकटहिया' वारयरस का प्रकोप ज्यादा हो गया है। दूरदर्शी के एक साथी ने बताया कि 'टिकटहिया' दिलफेंक हसीना की तरह है। इस हसीना की 'नथ' उतारने के लिए शहर के एक सज्जन दो-तीन करोड़ रुपये की पुजैया करके लौटे हैं, तब उन्हें कामयाबी मिल पाई।
एक रोज मगरू चचा रास्ते में मिले तो दोबारा फिर सनसनाता हुआ सवाल दाग दिया, 'दूरदर्शी बताओ कि अपने शहर में 'टिकटहिया' के रोगी गली, चौराहों, पान की दुकानों और अपने परिजनों में जरूरत से ज्यादा बक-बक क्यों करते हैं... ?' दूरदर्शी ने मंगरू चचा को समझाया कि जिन लोगों के शरीर में 'टिकटहिया' के थोड़े भी वायरस भी घुस जाते हैं वह हिनहिनाने लगता है। दिन भर टिकट-टिकट ही चिल्लाता है..? ऐसे रोगियों को आप चाहे सिनेमा का टिकट लाकर दें या रेल-बस या सरकस का। रोगी टिकट-टिकट... चिल्लाना बंद नहीं करता। ऐसे रोगियों में एक अचरज की बात जरूर देखने को मिलती है कि वे अपने आकाओं के स्वागत-सत्कार में इस तरह बिछते हैं, जैसे वे अपनी बेटी अथवा बहन की शादी कर रहे हों...। आकाओं का फरमान मिलते ही बनारस से दिल्ली और लखनऊ की ओर तो ऐसे भागते हैं जैसे कई दिनों का भूखा रोटी के लिए भागता है। काशी में 'टिकटहिया' का प्रकोप कुछ ज्यादा ही है। हर गली और हर चौराहे के नुक्कड़ पर ऐसे लोगों को देखा और परखा जा सकता है जिनके अंदर हर समय इस खतरनाक बीमारी के कीड़े कुलबुलाते नजर आते हैं। 'टिकटहिया' पीड़ितों से मिलकर आप हंस सकते हैं....रो सकते हैं...।
दूरदर्शी मानता है कि जिन लोगों के अंदर 'टिकटहिया' का कीड़ा घुस जाता है वे चाहे जितना भी भागें, थकते ही नहीं...। चाहे जितना भी चिल्लाएं गला बैठता ही नहीं...। चाहे जितना भी बेइज्जत किया जाए, बुरा मानते ही नहीं...। ये रोगी इतने 'थेथर' हो जाते हैं कि इनके आगे एड्स भी शरमाता है। अपने शहर में इन दिनों ऐसे रोगी ज्यादा हैं जो टिकट पाने से ज्यादा कटवाने के चक्कर में बकबका रहे हैं। कोई झंडा-होर्डिंग फुंकवा रहा है तो कोई बैनर...।
दूरदर्शी अपने शहर के लोगों को फोकट में सलाह देना चाहता है कि अगर आपके आसपास किसी को 'टिकटहिया' हो गया हो तो कतई परेशान न हों। यह एक समयबद्ध बीमारी है। यह तभी तक रहती है जब तक सभी राजनीतिक दल टिकट बांट नहीं देते। सांसदी-विधायकी का टिकट मिलने पर कुछ इस बीमारी को लेकर दिल्ली अथवा लखनऊ उड़ जाते हैं। बाकी बगैर इलाज के हौले-हौले ठीक हो जाते हैं। जिस तरह बारिश के दिनों में डायरिया फड़कता है उसी तरह चुनावी सीजन में 'टिकटहिया' का ज्वार उठता है। तभी दिमाग में बैठे इसके शांत कीड़े दोबारा रेंगने शुरू कर देते हैं।
काशी के लोग इस बीमारी को कतई हल्के में न लें। विधायकी का चुनाव अगले साल होना है, मगर बयार अभी से बह रही है। जिनके अंदर 'टिकटहिया' का कीड़ा घुस चुका है उसके प्रति नरमी दिखाएं। प्यार करें, दुलराएं अथवा सहानुभूति रखें। सबसे पहले रोगी की हरकत परखें। देखें कि हरकत कमलनुमा है या पंजानुमा। हाथीनुमा अथवा सायकिलनुमा भी हो सकती है। रोगी निर्दल की तरह भी हिनहिना सकता है। हैंडपाइप की तरह 'चपाचप'और लालटेन की तरह 'भभक' सकता है। रात में सोते-सोते हंसना, चिल्लाना, ताली बजाना, जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने के लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं। गंभीर रोगी ऊंघते-ऊंघते भी भाषण देने लग सकते हैं। कभी-कभी वह पागलों की तरह हरकत भी कर सकता है।
प्लीज! ऐसे रोगियों को पांडेयपुर के पागलखाने में न ले जाएं। उसका पूरा भाषण शिद्दत से सुनें। अगर कुछ अच्छा लगे तो ताली बजाएं...। हौसला बढ़ाएं...। घर में फूलमाला हो तो रोगी को पहना दें...। 'टिकटहिया' पीड़ित मरीज की हरकत चाहे जैसे भी हो, सिर्फ एक ही दवा कारगर होती है। रोगी से मिलते ही नमस्ते-बंदगी करें और थोक में वोट दिलाने के लिए आश्वासन की घुट्टी पिलाएं...। आप देखेंगे कि थोड़ी देर में ही मरीज अपना भाषण खत्म कर देगा। आपको दुआएं देगा। गरीबों को साड़ी, दारू, पैसा, झुमका, नथिया...कुछ भी बांट देगा। यह बात दीगर है कि लखनऊ अथवा दिल्ली पहुंचने के बाद इतनी गहरी नींद में सो जाएगा कि आप पूरे पांच साल तक ढूंढते रह जाएंगे...। काशी के लोगों को बताना बेहद जरूरी है कि यह 'टिकटहिया' ही तो है, जिसकी वजह से देश के चुनिंदा पागलों ने अपने शहर को शानदार ढंग से बर्बाद और जानदार ढंग से तबाह किया है। इसी बीमारी का असर है कि भगवान इंद्र तनिक भी मेहरबान होते हैं तो बाबा भोले की नगरी अथाह और विशाल समुद्र सरीखी नजर आने लगती है।
पुछल्ला....
एक नेता ने अपने नालायक बेटे को समझाते हुए कहा-राजनीति में आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता। यह सदाबहार होती है। हिन्दुस्तानी बीवी भी कभी-कभी अपने बुजुर्ग पति से कन्नी काटने लगती है, लेकिन राजनीति एक ऐसी 'बाला' है जिसे बुजुर्ग ही दिलकश लगते हैं। हालांकि इन दिनों राजनीति को उम्र का बंधन पसंद नहीं है। राजनीति में घुसकर लोग चंगे रहते हैं और नजरें जवान। इसीलिए वे हर तरफ देखते ही रहते हैं। इन्हीं के लिए एक शायर ने कहा है-
हमेशा नजरें मिलाता हूं मैं हसीनों से।
इसलिए नहीं लगती मेरी निगाह को जंग।।
0 दूरदर्शी