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0 घड़रोजों के आतंक के चलते इसकी खेती से मुंह मोड़ने लगे अन्नदाता
0 मानसून की बेरुखी के बीच नौ महीने की फसल को बचाना बड़ी चुनौती
0 बीएचयू के कृषि वैज्ञानिक विकसित नहीं कर पाए कोई लोकप्रिय प्रजाति
विजय विनीत
वाराणसी। अरहर की खेती पर लागत के मुकाबले मुनाफा काफी कम होने के कारण जिले के किसान अब इसकी खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं। पिछले कुछ सालों की बात की जाए तो वाराणसी के किसानों ने अरहर को अब हमेशा के लिए विदाई दे दी है। जो किसान इसकी खेती में रुचि दिखाते हैं, उन्हें घड़रोज (नीलगाय) तबाह कर देते हैं। उचित दाम न मिलने के कारण जिले के किसानों का रुझान धान-गेहूं की ओर तेजी से बढ़ रहा है। प्रोत्साहन के अभाव में किसानों ने अरहर की खेती बंद ही कर दी है।
आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो वर्ष 2010-11 से अब तक में कृषि विभाग के पास वाराणसी जिले में अरहर के उत्पादन का कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है। कृषि विभाग हर साल खेती का क्षेत्रफल तो तय करता है, लेकिन न तो उत्पादकता का ब्योरा जुटा पाता है और न ही उत्पादन का। कारण-अरहर की जिले से हमेशा के लिए विदाई। अरहर से किसानों के मुंह मोड़ने की कई ठोस वजहें हैं। पूर्वांचल में आमतौर पर इसकी खेती ऐसी जमीन में की जाती है जो उर्वरता के मामले में बेहद कमजोर होती है। फसल नौ महीने में पकती है। लंबी अवधि तक
अरहर की देखभाल में किसानों के छक्के छूट जाते हैं और धैर्य जवाब देने लगता है। बनारस में अरहर की विदाई की सबसे बड़ी वजह हैं घड़रोज। गंगा, वरुणा और सरयू नदियों के कछार इनकी शरणगाह हैं। अरहर की फसल चट करने में घड़रोजों को आसानी होती है, क्योंकि उन्हें गर्दन झुकाने की जरूरत नहीं पड़ती। घड़रोज सबसे पहले इसी फसल को अपना आहार बनाते हैं।
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक अरहर की उत्पादकता गिरने की एक और बड़ी वजह है अरहर की पुरानी प्रजातियां। पूर्वांचल में सर्वाधिक लोकप्रिय प्रजाति अरहर बहार दो दशक पुरानी हो चुकी है। बीएचयू की प्रजाति मालवीय-13 भी करीब 12 साल पुरानी है। हाल के सालों में बीएचयू के कृषि वैज्ञानिकों ने इसकी कोई ऐसी प्रजाति विकसित नहीं की जिससे पूर्वांचल में इसकी खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ सके। अरहर पर मौसम की मार सबसे ज्यादा पड़ती है। कभी ओले का तो कभी पाले का। दोनों ही स्थितियों में इसके फूल झड़ जाते हैं, जिससे किसान तबाह हो जाते हैं।
चोलापुर ब्लाक के बबियांव के प्रगतिशील किसान शैलेंद्र सिंह रघुवंशी कहतेहैं कि अरहर की फसल में बीमारियों का भय अधिक बना रहता है। सरल बीमा प्रणाली न होने के कारण अरहर की खेती में रिस्क काफी ज्यादा होता है। बनारस में इनदिनों निजी कंपनियों में हाईब्रिड धान का बीज बेचने में गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है। प्रलोभन देकर किसानों को बरगलाया जा रहा है। इस वजह से किसान अरहर की खेती की बजाए धान को ज्यादा महत्व दे रहे हैं।
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दलहन क्लस्टर से ही बढ़ सकता है उत्पादन
वाराणसी। जिला कृषि अधिकारी संजय सिंह का कहना है कि क्लस्टर में दलहन की खेती से ही अरहर का उत्पादन बढ़ सकता है। इसके लिए राज्य स्तर पर योजना बननी चाहिए। इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए अनुदान का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। पूर्वांचल के किसान अब खेती में रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं है। मौसम के उतार-चढ़ाव के चलते अरहर की खेती चुनौती मानी जाने लगी है। कृषि विभाग को अरहर की खेती का लक्ष्य आवंटित करने के साथ ही किसानों को नई और अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियों का बीज मुफ्त में देना होगा। अनुदान की पुख्ता व्यवस्था करनी होगी। घड़रोजों पर शिकंजा कसने के लिए सोलर फेंसिंग ही एकमात्र उपाय है। यह अभी बेहद महंगा है। अनुदान मिलने पर ही किसान इसे अपना सकेंगे। अरहर की खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य में 450 रुपये प्रति कुंतल की बढ़ोतरी की है। पहले समर्थन मूल्य सिर्फ 4200 रुपये प्रति कुंतल था। लागत अधिक होने के कारण समर्थन मूल्य बढ़ने से किसानों की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं।
0 घड़रोजों के आतंक के चलते इसकी खेती से मुंह मोड़ने लगे अन्नदाता
0 मानसून की बेरुखी के बीच नौ महीने की फसल को बचाना बड़ी चुनौती
0 बीएचयू के कृषि वैज्ञानिक विकसित नहीं कर पाए कोई लोकप्रिय प्रजाति
विजय विनीत
वाराणसी। अरहर की खेती पर लागत के मुकाबले मुनाफा काफी कम होने के कारण जिले के किसान अब इसकी खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं। पिछले कुछ सालों की बात की जाए तो वाराणसी के किसानों ने अरहर को अब हमेशा के लिए विदाई दे दी है। जो किसान इसकी खेती में रुचि दिखाते हैं, उन्हें घड़रोज (नीलगाय) तबाह कर देते हैं। उचित दाम न मिलने के कारण जिले के किसानों का रुझान धान-गेहूं की ओर तेजी से बढ़ रहा है। प्रोत्साहन के अभाव में किसानों ने अरहर की खेती बंद ही कर दी है।
आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो वर्ष 2010-11 से अब तक में कृषि विभाग के पास वाराणसी जिले में अरहर के उत्पादन का कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है। कृषि विभाग हर साल खेती का क्षेत्रफल तो तय करता है, लेकिन न तो उत्पादकता का ब्योरा जुटा पाता है और न ही उत्पादन का। कारण-अरहर की जिले से हमेशा के लिए विदाई। अरहर से किसानों के मुंह मोड़ने की कई ठोस वजहें हैं। पूर्वांचल में आमतौर पर इसकी खेती ऐसी जमीन में की जाती है जो उर्वरता के मामले में बेहद कमजोर होती है। फसल नौ महीने में पकती है। लंबी अवधि तक
अरहर की देखभाल में किसानों के छक्के छूट जाते हैं और धैर्य जवाब देने लगता है। बनारस में अरहर की विदाई की सबसे बड़ी वजह हैं घड़रोज। गंगा, वरुणा और सरयू नदियों के कछार इनकी शरणगाह हैं। अरहर की फसल चट करने में घड़रोजों को आसानी होती है, क्योंकि उन्हें गर्दन झुकाने की जरूरत नहीं पड़ती। घड़रोज सबसे पहले इसी फसल को अपना आहार बनाते हैं।
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक अरहर की उत्पादकता गिरने की एक और बड़ी वजह है अरहर की पुरानी प्रजातियां। पूर्वांचल में सर्वाधिक लोकप्रिय प्रजाति अरहर बहार दो दशक पुरानी हो चुकी है। बीएचयू की प्रजाति मालवीय-13 भी करीब 12 साल पुरानी है। हाल के सालों में बीएचयू के कृषि वैज्ञानिकों ने इसकी कोई ऐसी प्रजाति विकसित नहीं की जिससे पूर्वांचल में इसकी खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ सके। अरहर पर मौसम की मार सबसे ज्यादा पड़ती है। कभी ओले का तो कभी पाले का। दोनों ही स्थितियों में इसके फूल झड़ जाते हैं, जिससे किसान तबाह हो जाते हैं।
चोलापुर ब्लाक के बबियांव के प्रगतिशील किसान शैलेंद्र सिंह रघुवंशी कहतेहैं कि अरहर की फसल में बीमारियों का भय अधिक बना रहता है। सरल बीमा प्रणाली न होने के कारण अरहर की खेती में रिस्क काफी ज्यादा होता है। बनारस में इनदिनों निजी कंपनियों में हाईब्रिड धान का बीज बेचने में गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है। प्रलोभन देकर किसानों को बरगलाया जा रहा है। इस वजह से किसान अरहर की खेती की बजाए धान को ज्यादा महत्व दे रहे हैं।
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दलहन क्लस्टर से ही बढ़ सकता है उत्पादन
वाराणसी। जिला कृषि अधिकारी संजय सिंह का कहना है कि क्लस्टर में दलहन की खेती से ही अरहर का उत्पादन बढ़ सकता है। इसके लिए राज्य स्तर पर योजना बननी चाहिए। इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए अनुदान का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। पूर्वांचल के किसान अब खेती में रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं है। मौसम के उतार-चढ़ाव के चलते अरहर की खेती चुनौती मानी जाने लगी है। कृषि विभाग को अरहर की खेती का लक्ष्य आवंटित करने के साथ ही किसानों को नई और अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियों का बीज मुफ्त में देना होगा। अनुदान की पुख्ता व्यवस्था करनी होगी। घड़रोजों पर शिकंजा कसने के लिए सोलर फेंसिंग ही एकमात्र उपाय है। यह अभी बेहद महंगा है। अनुदान मिलने पर ही किसान इसे अपना सकेंगे। अरहर की खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य में 450 रुपये प्रति कुंतल की बढ़ोतरी की है। पहले समर्थन मूल्य सिर्फ 4200 रुपये प्रति कुंतल था। लागत अधिक होने के कारण समर्थन मूल्य बढ़ने से किसानों की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं।

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