Tuesday, 13 December 2016

बाढ़ में ‘सावन-भादों’ बनीं नेताजी की आंखें

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इन दिनों-------
पड़ोसी मंगरू चचा के साथ दूरदर्शी के घर आए नेताजी की आंखों से इस कदर आंसू टपक रहे थे, जैसे गरीब की झुग्गी-झोपड़ी में बारिश का पानी...। 
वजह पूछी तो मुंह से बोल नहीं फूटे। आंसू क्या थे, मानो तूफानी नदी। हाथ में नेताजी की रुमाल आंसुओं से तर-बतर थी। कुछ ही देर में कई लीटर आंसू बह गए...। 
वह लगातार सुबकते जा रहे थे। लोटा भर मट्ठा पीने के बाद नेताजी बात करने लायक हुए। बोले, ‘जब से बाढ़ आई है तब से मेरी आंखें सावन-भादों हो रही हैं। लोग-बाग बाढ़ से घिरे हैं। न अफसर कुछ कर रहे हैं न ही सरकार...।’ 
दूरदर्शी ने सलाह दी, ‘आप विरोधी दल के नेता हैं। मंत्री भी रह चुके हैं। बाढ़ पीड़ितों को राहत दिलाने के लिए आंदोलन कीजिए। अफसरों के घरों पर नारेबाजी कराइए।’ 
इतना सुनते ही नेताजी ‘हाय...हाय...’ कर सीना कूटने लगे। दूरदर्शी को लगा कि शायद फिर से उन्हें रोने का दौरा पड़ गया है। आंसू समेटने के लिए उन्हें गगरी थमाई और बाहर धकेलकर दरवाजे पर कुंडी चढ़ा दी। 
नेताजी के जाने के बाद मंगरू चचा ने दूरदर्शी से पूछा, ‘वर्षों तक दड़बे में घुसे रहने वाले नेता इन दिनों अचानक बाढ़ से घिरे लोगों के हमदर्द कैसे हो गए? 
दूरदर्शी ने समझाया, ‘सिर्फ खरबूजा ही खरबूजे को देखकर रंग नहीं बदलता। पृथ्वी पर नेता ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जो रंग बदलने में सबसे माहिर होता है। गिरगिट भी मुकाबला नहीं कर सकता। रंग बदलना भी एक महान कला है। हर एक को यह कला नहीं आती। जो साध लेते हैं वे मनस्वी होते हैं।’ 
दूरदर्शी को नेता और खरबूजे की नस्ल एक सी लगती है। गरीब जनता सामने होती है तो स्वार्थ के रंग भी इसी तरह बदलते हैं। बाढ़ और सूखे में भाषण का हौल ज्यादा उठता है तो नेताओं में मसीहाई जागने लगती है। उसे गरीबी सूझने लगती है, गरीब याद आने लगते हैं, विकास दिखने लगता है, किसानों की दुर्दशा याद आने लगती है। वापस राजधानी जाता है तो फिर नया रंग बदल लेता है। मतलब असली नेता वही जो खरबूजे की तरह रंग बदलने में महिर होता है। 
मंगरू चचा अब इस बात से वाकिफ हो गए हैं कि बाढ़ में, महामारी में नेता क्यों गद्गद हो जाते हैं? दरअसल बाढ़ भी इनके लिए उत्सव है। 
अबकी तगड़ी बाढ़ आई है तो हर दल के नेता भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे हैं। चुनाव नजदीक है इसलिए इनकी आंखें घड़ियाली आंसू छलका रही हैं। चुनाव खत्म होते ही ये हठीली नागिन बन जाएंगी। फुंफकार मारेंगी। लगातार पांच साल तक जनता को डंसेंगी। 
बाढ़ग्रस्त इलाकों में नेताओं की कसरत देखकर दूरदर्शी की आंखें चौधिया रही हैं। इन दिनों नेता जिस बाढ़ग्रस्त गांव में जा रहे हैं बिरादरी वाले टोले में उनका रंग छपाक-छपाक गिर रहा है। शायद उन्हें पता है कि यही रंग चुनाव में काम आने वाला है। वोटर का रंग, उम्मीदवार की जात को देखकर रंग बदल लेता है। नेताजी मंत्री बने तो अपने विभाग में अपनी बिरादरी का रंग बरसाएंगे। निर्बल भी जबरिया सबल के रंग में रंग जाएंगे। 
सिर्फ नेता ही नहीं, कुछ अफसरों-कर्मचारियों की बीवियां भी मना रही हैं, ‘हे प्रभु इंद्र... अबकी ऐसी बाढ़ लाओ कि सब कुछ 'गीला-गीला' हो जाए। वे भी बाढ़ उत्सव का जश्न मनाएं।’ 
दूरदर्शी को याद है-पिछली दफा बाढ़ आई थी तो पतिभक्त कई अफसरों की बीवियों ने ‘फारेन टूर’ का आनंद लिया था। राहत फंड से कइयों के घर होम थियेटर और एलसीडी टीवी पहुंच गए थे। कर्मचारियों के घर में राहत फंड से कई ‘राहत कार्य’ हो गए थे। कुछ महिलाओं के जीवन में बाढ़ ही ‘खुशहाली’ बिखेरती है। जितनी तगड़ी बाढ़, उतना सुहाना किटी पार्टी का ‘सुख’ मिलता है। तारांकित होटल में मैरिज एनवर्सरी और लाडले के बर्थ-डे सेलिब्रेट करने की मुराद पूरी हो जाती है...। जनता की बड़ी मुसीबत इन्हें कुछ न कुछ देकर ही जाती है। 
और इन दिनों.....
बाढ़-ए-दर्द जिगर में होता है, तो हूक सी दिल में उठती है। 
नेताजी रात को उठकर रोते हैं, जब सारा आलम सोता है।।
० दूरदर्शी

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