हाय! मैं सैर-सपाटे पर क्यों न गया?
इन दिनों------
नंगई साफ दिखने लगी है। जिधर देखो..., जहां देखो... वही नंगा। पार्षद हों या चुगलखोर। नेता हो या सरपरस्त। अफसर हों या कर्मचारी। सब के सब नंगे। दूरदर्शी का लगोटिया यार बुद्धूराम भी नंगई पर उतारू है। जब से पार्षदों को सैर-सपटिया रोग लगा है, तब के वह फनफना रहा है। बुद्धूराम की नंगई बढ़ती जा रही है। वह कहता है, ‘साइकिल वाले, पंजे वाले और हाथी वाले फोकट में सैर कर सकते हैं तो वह हवाई सैर का सुख और ऊंटी का लुत्फ क्यों नहीं उठा सकता? रामभक्त है, सिर पर कमल का ताज है। विरोधी दल के पार्षद ऐन बाढ़ में सैर कर सकते हैं तो उसे क्यों रोका जा रहा है?
दरअसल, बुद्धूराम को अजीब बीमारी है। पहले इसे रेल रोग था, फिर महिला रोग हुआ। इन दिनों सैर-सपटिया रोग लग गया है। इसलिए वह नंगई पर उतारू है। वह दर्जनों अकाट्य तर्क देता है। शून्य को निहारकर हाय... सैर-सपाटा....हाय सैर-सपाटा.... बुदबुदाता है। जब नंगई पर उतारू हो जाता है तो चीखने लगता है।
दूरदर्शी ने बुद्धूराम को कई बार समझाया, ‘नंगई छोड़ो, कुछ नेक काम करो। सपा, कांग्रेस और बसपा के पार्षदों की तरह नंगई पर उतरे तो अपने शहर में नंगे लोगों की तादाद बढ़ जाएगी और ‘हमाम’ भी बड़े-बड़े साइज में बनाने पड़ेंगे। वैसे भी गुजरात का सुख लूटकर लौट चुके हो। रामभक्त हो, ‘केसरिया’ की लाज रखो। सैर-सपाटे का इरादा त्याग दो। देखा नहीं, नगर अध्यक्ष सीताराम सरीखे पार्षदों की उनकी पार्टी के ही नेता किस कदर लानत-मलानत कर रहे हैं। सुप्रीमो सोनिया गांधी तक शिकायत पहुंच गई है कि कांग्रेसी पार्षदों ने किस तरह पार्टी की ‘नाक’ कटवाई।’
बुद्धूराम ने सैर-सपाटे को एक्सप्लेनियाते हुए कहा, ‘दूरदर्शी तुम क्या जानो इसका सुख। हीरे का कद्र तो जौहरी ही जानता है। फोकट के सैर को बदनाम मत करो। इसे ‘स्टडी टूअर’ कहो। पार्षदों ने जनता की भलाई का कोई ठेका ले रखा है। जब नगर आयुक्त और मेयर सैर-सुख पहुंचाना चाहते हैं तो लोगों के पेट में मड़ोर क्यों हो रहा है? देखा नहीं, केरल में सैर करने वालों का किस कदर गुणगान हुआ? रसूखदार और बड़ा आदमी बनने के लिए अखबारों में छपना होता है। पूरब की आबो-हवा की मादकता ही ऐसी है। जो जितना बदनाम होता है, वह उतना बड़ा माननीय बनता है। हर दल उसे अपने सिर का ताज बनाने को आतुर हो जाते हैं। चाहे गुंडा-बदमाश, माफिया हो अथवा शराब का तस्कर।’
सैर-सपाटे के लिए बुद्धूराम यूं ही बेकरार नहीं है। चाहता है कि वह भी हाऊस बोट पर ‘लैला’ का भोग करे। पानी की लहरें गिने। केरल की सैर करने वालों की तरह ऊंटी में ईलू...ईलू... गुनगुनाए। सेल्फी...सेल्फी खेले। बनारस के अखबारों में खूब जय-जयकार हो। नेता-परेता मालाओं से मालामाल करें। इंटरव्यू और फोटो के लिए अखबारनवीस बाबतपुर एयरपोर्ट पर दौड़ें...। दरअसल बुद्धूराम नगर निगम के अफसरों के खेल पर फिदा है। वह कहता है, ‘अगर मुझे भी सैर-सपाटे का मौका मिल जाए तो काशी के सारे खबरनवीस खबर जुटाने के लिए लट्टू हो जाएंगे। शोहरत में चार-चांद लगाने लगेंगे। उसके नाम का भी डंका बजेगा। मनौती मान रखी है कि चाहे कुछ भी हो जाए, जनता के पैसे से वह भी सैर-सपाटे पर जरूर जाएगा।
कहता है, ‘ दूरदर्शी तुम्हें क्या बताऊं। सैर-सपाटे पर जाने के लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया। तुम्हें मेरी बात हरकत समझ में आती है और मेरी कोशिश नंगई। लेकिन मुझे लगता है कि दूसरों की तरह तुम भी मुझसे जलते हो। मैंने प्रण कर लिया है, जब तक मैं सैर-सपाटे से लौट नहीं आऊंगा, खाना नहीं खाऊंगा। मेयर और नगर आयुक्त के पांव पकड़ूंगा। राम कसम मिनी सदन में उनके खिलाफ अब एक शब्द नहीं बोलूंगा। पहले काशी गौरव के लिए चिल्लाता था, फ्लाइट सुख लेकर गुरूर की जिंदगी जिऊंगा।’
दूरदर्शी ने बुद्धूराम को बहुत समझाया कि नंगई छोड़कर बारिश से बेहाल और शहर की बह चुकी सड़कों पर ठोकर खाने वालों के जख्मों पर मरहम लगाओ। लोग दुआ देंगे, मसीहा मानेंगे। लाख समझाने के बावजूद बुद्धूराम की उल्टी खोपड़ी में यह बात नहीं बैठी।
ऊंटी और फ्लाइट सुख के लिए छाती धुन रहे बुद्धूराम का तर्क है कि जिसे एक बार सैर-सपाटे का सुख मिल गया, समझिए उसके भाग्य का ताला खुल गया। वे नसीब वाले ही होते हैं जिन्हें सैर-सपाटे का सुख मिलता है। दारू पीकर मचलने और जवान-जवानियों को घूरने का मौका मिलता है। नगर निगम के अफसरान बेईमानों को ठेका और भ्रष्टाचारियों को सरकारी जमीनों पर कब्जे की छूट दे सकती है तो उसे सैर-सपाटे पर क्यों नहीं भेज सकती? यदि ऐसा न हुआ तो उसके जैसे बहुत से लोग पागल होकर नंगई पर उतारू हो जाएंगे।
बुद्धूराम रट लगाए है, ‘हट्टा-कट्टा हूं। स्मार्ट और खाते-पीते घर का हूं...। बड़े-बड़े रामभक्तों से रैट-पैट है...। कमल के साथ चक्कर चला चुका हूं। साइकिल की घंटी ट्रिन...ट्रिन... बजा चुका हूं। पंजे वालों से नैन-मटक्का कर चुका हूं...।’ अब बुद्धूराम को कौन समझाए कि सैर-सपाटे का सुख ऐरे-गैरे को थोड़े ही मिलता है। मिनी सदन में 33 फीसदी आबादी के बावजूद महिला पार्षदों को यह सुख नसीब नहीं हुआ, तो उसे कैसे होगा?
बुद्धूराम की बुदबुदाहट बढ़ती जा रही है। ‘हाय...सैर-सपाटा... हाय...सैर-सपाटा...गुनगुना रहा है।’ वह लगातार हिनहिना रहा है। ‘हाय.... सैर-सपाटिया... तुम खफा क्यों हो? आजा..आजा... गले लग जा...मैं हूं प्यार तेरा।’ दूरदर्शी ने बुद्धूराम को ऊंच-नीच समझाया। कहा, ‘बेहाल जनता की भावनाओं से मत खेलो। सैर-सपाटे और चांदी के जूतों से गाल सूजते हैं और मोतियाबिंद भी होता है। तब न जनता की बेबसी दिखती है और न ही लाचारी। बाढ़ पीड़ितों की न आहें सुनाई देती हैं, न कराहें। लाख कोशिश के बावजूद सैर-सपाटे की जिद छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। लाचार होकर दूरदर्शी उसे पड़ोसी मंगरू चचा के घर ले गया। चचा ने कहा कि बुद्धू है बुद्धूराम तो बुद्धू ही रहेगा। उसे उसके हाल पर छोड़ दीजिए। अगले साल पार्षदी का चुनाव है। जनता का सोटा पीठ पर पड़ेगा तो सारी अकड़-फकड़ दूर हो जाएगी और नंगई भी।
और अंत में....
कलम बिकती है न कलमकार बिकता है
इस महंगाई में न पत्रकार बिकता है।
खून से लहुलूहान हो जाते हैं लिखने वाले हाथ
तब अपने शहर में अखबार बिकता है।।
0 दूरदर्शीhttps://www.facebook.com/vijay.vineet.9/posts/1165183070186861
इन दिनों------
नंगई साफ दिखने लगी है। जिधर देखो..., जहां देखो... वही नंगा। पार्षद हों या चुगलखोर। नेता हो या सरपरस्त। अफसर हों या कर्मचारी। सब के सब नंगे। दूरदर्शी का लगोटिया यार बुद्धूराम भी नंगई पर उतारू है। जब से पार्षदों को सैर-सपटिया रोग लगा है, तब के वह फनफना रहा है। बुद्धूराम की नंगई बढ़ती जा रही है। वह कहता है, ‘साइकिल वाले, पंजे वाले और हाथी वाले फोकट में सैर कर सकते हैं तो वह हवाई सैर का सुख और ऊंटी का लुत्फ क्यों नहीं उठा सकता? रामभक्त है, सिर पर कमल का ताज है। विरोधी दल के पार्षद ऐन बाढ़ में सैर कर सकते हैं तो उसे क्यों रोका जा रहा है?
दरअसल, बुद्धूराम को अजीब बीमारी है। पहले इसे रेल रोग था, फिर महिला रोग हुआ। इन दिनों सैर-सपटिया रोग लग गया है। इसलिए वह नंगई पर उतारू है। वह दर्जनों अकाट्य तर्क देता है। शून्य को निहारकर हाय... सैर-सपाटा....हाय सैर-सपाटा.... बुदबुदाता है। जब नंगई पर उतारू हो जाता है तो चीखने लगता है।
दूरदर्शी ने बुद्धूराम को कई बार समझाया, ‘नंगई छोड़ो, कुछ नेक काम करो। सपा, कांग्रेस और बसपा के पार्षदों की तरह नंगई पर उतरे तो अपने शहर में नंगे लोगों की तादाद बढ़ जाएगी और ‘हमाम’ भी बड़े-बड़े साइज में बनाने पड़ेंगे। वैसे भी गुजरात का सुख लूटकर लौट चुके हो। रामभक्त हो, ‘केसरिया’ की लाज रखो। सैर-सपाटे का इरादा त्याग दो। देखा नहीं, नगर अध्यक्ष सीताराम सरीखे पार्षदों की उनकी पार्टी के ही नेता किस कदर लानत-मलानत कर रहे हैं। सुप्रीमो सोनिया गांधी तक शिकायत पहुंच गई है कि कांग्रेसी पार्षदों ने किस तरह पार्टी की ‘नाक’ कटवाई।’
बुद्धूराम ने सैर-सपाटे को एक्सप्लेनियाते हुए कहा, ‘दूरदर्शी तुम क्या जानो इसका सुख। हीरे का कद्र तो जौहरी ही जानता है। फोकट के सैर को बदनाम मत करो। इसे ‘स्टडी टूअर’ कहो। पार्षदों ने जनता की भलाई का कोई ठेका ले रखा है। जब नगर आयुक्त और मेयर सैर-सुख पहुंचाना चाहते हैं तो लोगों के पेट में मड़ोर क्यों हो रहा है? देखा नहीं, केरल में सैर करने वालों का किस कदर गुणगान हुआ? रसूखदार और बड़ा आदमी बनने के लिए अखबारों में छपना होता है। पूरब की आबो-हवा की मादकता ही ऐसी है। जो जितना बदनाम होता है, वह उतना बड़ा माननीय बनता है। हर दल उसे अपने सिर का ताज बनाने को आतुर हो जाते हैं। चाहे गुंडा-बदमाश, माफिया हो अथवा शराब का तस्कर।’
सैर-सपाटे के लिए बुद्धूराम यूं ही बेकरार नहीं है। चाहता है कि वह भी हाऊस बोट पर ‘लैला’ का भोग करे। पानी की लहरें गिने। केरल की सैर करने वालों की तरह ऊंटी में ईलू...ईलू... गुनगुनाए। सेल्फी...सेल्फी खेले। बनारस के अखबारों में खूब जय-जयकार हो। नेता-परेता मालाओं से मालामाल करें। इंटरव्यू और फोटो के लिए अखबारनवीस बाबतपुर एयरपोर्ट पर दौड़ें...। दरअसल बुद्धूराम नगर निगम के अफसरों के खेल पर फिदा है। वह कहता है, ‘अगर मुझे भी सैर-सपाटे का मौका मिल जाए तो काशी के सारे खबरनवीस खबर जुटाने के लिए लट्टू हो जाएंगे। शोहरत में चार-चांद लगाने लगेंगे। उसके नाम का भी डंका बजेगा। मनौती मान रखी है कि चाहे कुछ भी हो जाए, जनता के पैसे से वह भी सैर-सपाटे पर जरूर जाएगा।
कहता है, ‘ दूरदर्शी तुम्हें क्या बताऊं। सैर-सपाटे पर जाने के लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया। तुम्हें मेरी बात हरकत समझ में आती है और मेरी कोशिश नंगई। लेकिन मुझे लगता है कि दूसरों की तरह तुम भी मुझसे जलते हो। मैंने प्रण कर लिया है, जब तक मैं सैर-सपाटे से लौट नहीं आऊंगा, खाना नहीं खाऊंगा। मेयर और नगर आयुक्त के पांव पकड़ूंगा। राम कसम मिनी सदन में उनके खिलाफ अब एक शब्द नहीं बोलूंगा। पहले काशी गौरव के लिए चिल्लाता था, फ्लाइट सुख लेकर गुरूर की जिंदगी जिऊंगा।’
दूरदर्शी ने बुद्धूराम को बहुत समझाया कि नंगई छोड़कर बारिश से बेहाल और शहर की बह चुकी सड़कों पर ठोकर खाने वालों के जख्मों पर मरहम लगाओ। लोग दुआ देंगे, मसीहा मानेंगे। लाख समझाने के बावजूद बुद्धूराम की उल्टी खोपड़ी में यह बात नहीं बैठी।
ऊंटी और फ्लाइट सुख के लिए छाती धुन रहे बुद्धूराम का तर्क है कि जिसे एक बार सैर-सपाटे का सुख मिल गया, समझिए उसके भाग्य का ताला खुल गया। वे नसीब वाले ही होते हैं जिन्हें सैर-सपाटे का सुख मिलता है। दारू पीकर मचलने और जवान-जवानियों को घूरने का मौका मिलता है। नगर निगम के अफसरान बेईमानों को ठेका और भ्रष्टाचारियों को सरकारी जमीनों पर कब्जे की छूट दे सकती है तो उसे सैर-सपाटे पर क्यों नहीं भेज सकती? यदि ऐसा न हुआ तो उसके जैसे बहुत से लोग पागल होकर नंगई पर उतारू हो जाएंगे।
बुद्धूराम रट लगाए है, ‘हट्टा-कट्टा हूं। स्मार्ट और खाते-पीते घर का हूं...। बड़े-बड़े रामभक्तों से रैट-पैट है...। कमल के साथ चक्कर चला चुका हूं। साइकिल की घंटी ट्रिन...ट्रिन... बजा चुका हूं। पंजे वालों से नैन-मटक्का कर चुका हूं...।’ अब बुद्धूराम को कौन समझाए कि सैर-सपाटे का सुख ऐरे-गैरे को थोड़े ही मिलता है। मिनी सदन में 33 फीसदी आबादी के बावजूद महिला पार्षदों को यह सुख नसीब नहीं हुआ, तो उसे कैसे होगा?
बुद्धूराम की बुदबुदाहट बढ़ती जा रही है। ‘हाय...सैर-सपाटा... हाय...सैर-सपाटा...गुनगुना रहा है।’ वह लगातार हिनहिना रहा है। ‘हाय.... सैर-सपाटिया... तुम खफा क्यों हो? आजा..आजा... गले लग जा...मैं हूं प्यार तेरा।’ दूरदर्शी ने बुद्धूराम को ऊंच-नीच समझाया। कहा, ‘बेहाल जनता की भावनाओं से मत खेलो। सैर-सपाटे और चांदी के जूतों से गाल सूजते हैं और मोतियाबिंद भी होता है। तब न जनता की बेबसी दिखती है और न ही लाचारी। बाढ़ पीड़ितों की न आहें सुनाई देती हैं, न कराहें। लाख कोशिश के बावजूद सैर-सपाटे की जिद छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। लाचार होकर दूरदर्शी उसे पड़ोसी मंगरू चचा के घर ले गया। चचा ने कहा कि बुद्धू है बुद्धूराम तो बुद्धू ही रहेगा। उसे उसके हाल पर छोड़ दीजिए। अगले साल पार्षदी का चुनाव है। जनता का सोटा पीठ पर पड़ेगा तो सारी अकड़-फकड़ दूर हो जाएगी और नंगई भी।
और अंत में....
कलम बिकती है न कलमकार बिकता है
इस महंगाई में न पत्रकार बिकता है।
खून से लहुलूहान हो जाते हैं लिखने वाले हाथ
तब अपने शहर में अखबार बिकता है।।
0 दूरदर्शीhttps://www.facebook.com/vijay.vineet.9/posts/1165183070186861

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