Tuesday, 13 December 2016

....और किसी के हिस्से में ‘जाम’ आया

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किसी के हिस्से में ‘प्यास’ आई, किसी के हिस्से में ‘जाम’ आया...। फिल्म ‘दो बदन’ के गीत की ये पंक्तियां इन दिनों अपने काशी के पर सटीक बैठती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अपने शहर के हिस्से में ‘प्यास’ भी आई और ‘जाम’ भी आया। प्यास के नाम पर न जाने कितने अरब रुपये खर्च हो गए। टंकियां बनीं भी तो शो-पीस बन गईं। प्यास के नाम पर न जाने कितने हैंडपंप उखड़ गए...। कागजों पर कुएं भी खुद गए...। इतना ही नहीं, कई मंत्री भी बने-बिगड़े। पीएम भी बने, पर प्यास है कि यहां ‘घर जवाई’ बनकर बैठ गई है। प्यासे शहर के हिस्से में जो ‘जाम’ आया (कांच के गिलास वाला नहीं...) वह ऐसा है जो सड़कों पर लुढ़कता है और बंद कर देता है लोगों के दिलों की धड़कनें...कुछ की जान समय से अस्पताल न पहुंच पाने के लिए जाती है तो कुछ की खून के लिए...। शहर में न जाने कितने पुलिस अफसर आए पर जाम नहीं रोक पाए। कुछ महीने पहले दूरदर्शी ने सुना कि जाम का झाम खत्म करने के लिए नए ‘साहब’ आए हैं। कमल भी हैं और किशोर भी हैं। दूरदर्शी को लगा कि काशी की जनता को ‘मदहोश’ करने वाले जाम से निजात दिलाएंगे...। तब दूरदर्शी की आंखों में चमक उभरी थी कि शायद पहली बार इस शहर में किसी ऐसे अफसर का आना हुआ है जो ‘जाम’ से बेहाल शहर को मुक्ति दिलाएगा। ट्रैफिक इंतजाम दुरुस्त कराएगा... पर ‘जाम’ है कि ‘बेताल’ की तरह लटका ही हुआ है... और उतरने का नाम नहीं ले रहा है...।
कुछ दिनों पहले की तो बात है। दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरू चचा की रिश्तेदारी में शादी थी। उन्हें अपनी बहन को ‘इमली घोंटाना’ था। सुबह घर से निकले तो जाम के झाम में फंस गए। जाम में ऐसे फंसे कि अगले दिन पहुंच पाए...। तब से मंगरू चचा की बहिन मुंह फुलाए है...ताना मारती है कि भैया बहाना मारते हैं...। चलो इमली घोंटा न सकते थे तो कम से कम भांजी की शादी में तो समय से पहुंच जाते तब भी कलेजा जुड़ाय जाता। मंगरू चचा ने अपना दर्द बयां किया और एक जिम्मेदारी भी सौंप दी कि दूरदर्शी तुम ‘जाम’ पर शोध करो...। पता करो कि ‘जाम’ यूं ही छलक रहा है या अफसर छलका रहे हैं...? मंगरू चचा की बहिन को यकीन दिलाने के लिए दूरदर्शी ने ‘जाम’ पर शोध करने की जिम्मेदारी ओढ़ ली। आनन-फानन में शोध कर डाला...। काशी में जाम तीन तरह के होते हैं। पहला-आकस्मिक जाम, दूसरा-आयोजनगत जाम और तीसरा-नेता पोषित जाम। आकस्मिक जाम तो ‘नो इंट्री’ में रिश्वत देकर आने वाली गाड़ियों अथवा स्कूल की लंबी बसों के शहर में घुसने से लगता है। काशी में जाम के लिए लोगों की आपाधापी और भांग का गोला लगाकर चलने वाले भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। हालांकि ये जाम ज्यादा दुखदायी नहीं होते...। जैसे लगते हैं, वैसे ही हट जाते हैं। काशी में सर्वत्र जाम लगता रहता है। काशी के कुछ लोग इस जाम से बुरा नहीं मानते...। जानते हैं क्यों? जितने समय में जाम लगता है उतने में दुकानों पर पहुंचकर पान की गिलौरी मुंह में दबा लेते हैं। जो पनखौव्वे नहीं, वे अपनी जेब से चुनौटी निकालकर सुर्ती मलना शुरू कर देते हैं। कुछ मजनूं टाइप युवक और युवतियां बाइकों पर बैठकर अपने ‘प्यार’ का इजहार करने का मौका भी निकाल लेते हैं...।
दूसरे तरह का जाम वह है जो किसी आंदोलन के समय लगता है...। फिर वहां पुलिस आती है... भाषण होते हैं, लाठियां चलती हैं...और जब कोई नेता आता है तो जाम खत्म हो जाता है। दूरदर्शी की नेक सलाह है कि समझदार बनिये। इन दिनों एक पार्टी के नेता-कार्यकर्ता थाने पर प्रदर्शन कर रहे हैं। काशी में ज्यादातर थाने सड़कों पर हैं। यदि आप समझदार हैं तो उस रास्ते पर जाने का इरादा त्याग दें, जिन रास्तों पर थाना है... पुलिस है...। यदि नहीं तो आपका घर पहुंचना, न पहुंचना आंदोलन पर निर्भर करेगा।
तीसरे तरह का जाम सबसे ज्यादा टिकाऊ, खतरनाक, रोमांचक है और उद्देश्यपूर्ण होता है। यह नेतागिरी की जमीन पर नाम पाने के लालच में... आम जनता की सुविधाओं के नाम पर लगता है। ये जाम मुद्दा हो या न हो कहीं भी...कभी भी लगाए जा सकते हैं। यह फैशनेबल जाम नेताओं की फोटो खिंचते ही हट जाता है। कभी-कभी (यदि पुलिस और जाम लगाने वाले आमने-सामने हो जाएं तो) देर तक जीवित रहता है। इस तरह के जाम में फंसे लोग यदि अपना काम-धाम भूलकर जाम में खो जाएं तो ‘थ्री डी’ का आनंद मिलता है।
दूरदर्शी के शोध से यह भी निष्कर्ष निकला है कि शीशे की गिलास में भरा पूरा ‘जाम’ होने से लोगों की प्यास बुझती है, पर ये जाम तो लोगों को प्यासा मार सकता है...। किसी को खून की जरुरत है और लहुराबीर स्थित आईएमए के ब्लड बैंक आना है तो मरीज की आसानी से जान ले सकता है...। बाबा की नगरी में ‘जाम’ अब मरीज को खून की बोतल समय से न पहुंचने की गारंटी देता है। सैकड़ों घायलों...बीमारों ने अस्पताल पहुंचने से पहले ‘जाम’ पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए। हजारों रिश्ते टूट गए। कई जोड़ों की मंगनी टूट गई तो कई जाम स्थल पर ही जोड़ीदार हो गए। हजारों के साक्षात्कार और परीक्षाएं छूटीं तो कइयों ने भूख-प्यास का साक्षात्कार किया। शायद ही कोई शख्स ऐसा हो जिसे देर से घर पहुंचने पर ‘घरवाली’ ने हड़काया न हो...। दूरदर्शी को ऐसे सभी लोगों से हमदर्दी है जो जाम में फंस चुके हैं और वह बाबा भोले से प्रार्थना करता है कि जाम लगाने वाले...सड़कों और थानों पर धरना-प्रदर्शन करने वाले टिकाऊ जाम के झाम में फंसें ताकि उन्हें भी पता चल सके कि ‘जाम’ लगाने और ‘जाम’ ढालने में फर्क क्या है। एसपी ट्रैफिक, पुलिस कप्तान और कलेक्टर को दूरदर्शी की सलाह है कि वे ‘जाम’ के लिए कुछ नहीं कर सकते तो उसे काशी की संस्कृति में जरूर शामिल करा दें...। रांड, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी... वाली कहावत के आगे ‘जाम’ भी जोड़वा दें...। काशी के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करा दें...। जाम पर शोध होंगे तो पीएचडी की डिग्री लेने वाले तमाम युवाओं का जीवन संवर जाएगा।
‘जाम’ पी लिया करते हैं जीने की तमन्ना में।
‘डगमगाना’ भी ज़रूरी है संभालने के लिए।।
0 दूरदर्शी

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