कड़क चाय के साथ खाइए ‘कड़कदार कोड़े’
इन दिनों ------
दूरदर्शी ने सुना है कड़क चाय पिलाने वाला आदमी अगर गलती से सियासत में आता आता है तो जनता को लाइन में लगाकर नीबू की तरह निचोड़ देता है। देश भर में हड़कंप और हंगामा खड़ा कर देता है। कड़कनाथ ने काले नोटों को बहरियाने के लिए कड़क चाय पिलाई तो समूची काशी सड़क पर आ गई। अच्छे दिन में अपनी सात पीढ़ियों को बैठाकर खिलाने का ख्वाब पालने वालों की तीन-तीन पीढ़ियां नोट बदलने के लिए लाइन में लग गईं। सात फेरे लेने से पहले दूल्हा-दुल्हनों को रिश्तेदारों के साथ लाइन लगानी पड़ी...। अपना ही पैसा निकालने के लिए दस-दस कसमें खानी पड़ीं...।
नोटबंदी की घोषणा के बाद से मंगरू चचा चहक रहे हैं। कहते हैं, ‘कड़क चाय, कड़क नेता के हाथ की बनी हो तो खूब लुभाती है। गूंगे नेता भी बोलने लगते हैं। मक्खन सिंह जैसे लोगों के घरों के झगड़े-फसाद खत्म हो जाते हैं। केजरीवालों की कुकुरखांसी ठीक हो जाती है। इलाज का ये सारा नुक्सा कड़कनाथ का है। यह असर उनके कड़क चाय और कड़क फैसले का है।’
जब शोले फिल्म आई थी तो लोग अपने बच्चों को चुप कराने के लिए कहते थे, ‘सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा।’ अब लोग बच्चों से कह रहे हैं, ‘चुप नहीं हुए तो कड़क चाय पिलाने, कड़कनाथ आ जाएंगे।’ काशी में इन दिनों कुछ लोग अपने दुश्मनों से बदला लेने के लिए कड़क चाय बनाने और पिलाने का हुनर सीख रहे हैं। जिनसे खुन्नस है उन्हें कड़क चाय पिलाने का आफर दे रहे हैं।
दूरदर्शी को लगता है, ‘कड़क चाय पीने से आम आदमी का हाजमा खराब हो जाता है। उन्हें कड़क चाय नहीं, उसकी धोवन ही काफी है। कड़कनाथ को जिसे कड़क चाय पिलानी थी, उसे पिलाई ही नहीं। गरीब जनता को परोस दी। इसीलिए सबकी जीभ ऐंठ रही है। कड़क चाय हलक से नीचे उतरकर खाली पेट में अल्सर पैदा कर रही है।’
लक्कड़-पत्थर हजम करने का दावा करने वाले बहरी अलंग के बनारसी महारथी इन दिनों दातून और सुरती तक के लिए तरस रहे हैं। रामनगरिहवा भंटे के चोखा के साथ खिचड़ी, मलाई की कुल्फी, संतरे और कसेरू की बरफी, केसरिया, तिरंगी, रसवंती, खीर कदम्ब, कमलगट्टे का हलुआ, सिंघाड़े की जलबी, छोटकी-बड़की कचौड़ी, खीर मोहन, घुघनी, मठरी, हलवा चाभने वाले बनारसियों को कड़कनाथ की कड़क चाय नहीं ‘पुसा’ रही है। मुट्ठी भर चना-चबैना खाकर संतोष की लंबी डकार मारने वालों को भी कड़क चाय का प्रिपरेशन नहीं सुहा रहा है।
नोटबंदी के बाद अस्सी के पप्पू चाय की अड़ी पर स्वाद का पूरा शास्त्र बूकने वाले अड़ीबाजों की मस्ती में लोटा भर कमी नहीं आई है। वहां इस बात पर रोजाना घनघोर बहस छिड़ रही है कि दाल-बाटी, खीर, चुरमा कचरकूट करने से पहले भांग छानने वालों को आखिर कड़क चाय रास क्यों नहीं आ रही है? कुछ साहित्यकार तर्क दे रहे हैं-जो जन्म से काले हैं, उन्हें सफेद कैसे किया जा सकता है? जो काले नहीं, उन्हें जबरिया कड़क चाय पीनी पड़ेगी तो कड़वाहट कम करने के लिए धिक्कारेगा ही... और थू-थू... करेगा ही। लोग बुरा मानते हैं, तो माने।
मंगरू चचा के आग्रह पर दूरदर्शी ने नेताओं के कड़कपन पर शोध किया। निष्कर्ष यह निकला कि कड़क रहने का नुस्खा सिर्फ कड़क नोटों से ही सीखा जा सकता है। जो जितना कड़क होगा, जिसके कपड़े जितने कड़क होंगे, चुनाव में जनता पर उसका रंग उतना ही चढ़ेगा। समकालीन आर्थिक सुधार का नया फंडा है आम जनता की जेबतराशी। कुछ लोगों को लगता है कि कड़कनाथ की कड़क चाय से देश कम, जनता ज्यादा बदल रही है।
काशी के साधु-संत दुनिया भर के लोगों को बताते रहे हैं कि नश्वर शरीर चला जाएगा, लेकिन माया नहीं जाएगी। कड़कनाथ ने ऐसी कड़क चाय पिला दी कि माया चली गई और शरीर रह गया। अब उनके चेले-चपाटी बनारसियों को समझा रहे हैं, ‘कितने दिन की बात है। कुछ कोड़े लगेंगे, थोड़ा दर्द भी होगा। देश हित में इतना तो बर्दाश्त कीजिए। कुछ सालों बाद आपके नाती-पोते भी इन दिनों को याद करेंगे।’ कहेंगे, ‘मेरे दादा-दादी भी नोटों की अदला-बदली के लिए 20 दिन तक लाइन में खड़े थे। कड़कनाथ के कड़क कोड़े खाए थे।’ हो सकता है कि यूपी में कोई सरकार आए और लोकतंत्र सेनानियों की तरह पेंशन एवं बसों में मुफ्त सफर का लालीपाप थमा दे।
दूरदर्शी को याद है कि मूर्ख और झक्की राजा तुगलक का राज भले ही चला, मगर सोने-चांदी के बदले उसका तांबे-गिलट का सिक्का नहीं चला। तुगलकी जमाने की तरह आजाद भारत में सिक्के नहीं, नोटों की अदला-बदली हो रही है। साइड इफेक्ट यह है कि दस रुपये के नकली सिक्के भी असली नोटों को भारी चोट दे रहे हैं। बड़े नेताओं के फेल होने पर जिस तरह छुटभैये चल जाते हैं, वैसे ही बड़े नोटों के बंद होने से चिल्लर चमक रहे हैं।
जर्नलिस्ट गुरु अनिल उपाध्याय कहते हैं कि समस्या भ्रष्टाचार की हो या कालेधन की। समाज में दोनों बुराइयां बेईमानों की वजह से नहीं, बल्कि ईमानदार लोगों के चुप रहने से उपजती हैं। वह लोगों को सलाह दे रहे हैं कि चैन से जीना है तो कड़कपन से परहेज कीजिए...। कड़े नेताओं और कड़े नोटों से दूर रहिए...। अन्यथा कड़कदार कोड़े खाने पड़ सकते हैं। तब बताना पड़ेगा कि आप कितने लाख वाले अच्छे आदमी हैं? बाद में आप जाने और आपका काम जाने।
और अंत में....
कतारें थककर भी खामोश, नजारे बोल रहे हैं।
नदी बहकर भी चुप, मगर किनारे बोल रहे हैं।
ये कैसा जलजला आया है काशी में इन दिनों।
सबकी हंसी और सबके शौक राज खोल रहे हैं।।
० दूरदर्शी
इन दिनों ------
दूरदर्शी ने सुना है कड़क चाय पिलाने वाला आदमी अगर गलती से सियासत में आता आता है तो जनता को लाइन में लगाकर नीबू की तरह निचोड़ देता है। देश भर में हड़कंप और हंगामा खड़ा कर देता है। कड़कनाथ ने काले नोटों को बहरियाने के लिए कड़क चाय पिलाई तो समूची काशी सड़क पर आ गई। अच्छे दिन में अपनी सात पीढ़ियों को बैठाकर खिलाने का ख्वाब पालने वालों की तीन-तीन पीढ़ियां नोट बदलने के लिए लाइन में लग गईं। सात फेरे लेने से पहले दूल्हा-दुल्हनों को रिश्तेदारों के साथ लाइन लगानी पड़ी...। अपना ही पैसा निकालने के लिए दस-दस कसमें खानी पड़ीं...।
नोटबंदी की घोषणा के बाद से मंगरू चचा चहक रहे हैं। कहते हैं, ‘कड़क चाय, कड़क नेता के हाथ की बनी हो तो खूब लुभाती है। गूंगे नेता भी बोलने लगते हैं। मक्खन सिंह जैसे लोगों के घरों के झगड़े-फसाद खत्म हो जाते हैं। केजरीवालों की कुकुरखांसी ठीक हो जाती है। इलाज का ये सारा नुक्सा कड़कनाथ का है। यह असर उनके कड़क चाय और कड़क फैसले का है।’
जब शोले फिल्म आई थी तो लोग अपने बच्चों को चुप कराने के लिए कहते थे, ‘सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा।’ अब लोग बच्चों से कह रहे हैं, ‘चुप नहीं हुए तो कड़क चाय पिलाने, कड़कनाथ आ जाएंगे।’ काशी में इन दिनों कुछ लोग अपने दुश्मनों से बदला लेने के लिए कड़क चाय बनाने और पिलाने का हुनर सीख रहे हैं। जिनसे खुन्नस है उन्हें कड़क चाय पिलाने का आफर दे रहे हैं।
दूरदर्शी को लगता है, ‘कड़क चाय पीने से आम आदमी का हाजमा खराब हो जाता है। उन्हें कड़क चाय नहीं, उसकी धोवन ही काफी है। कड़कनाथ को जिसे कड़क चाय पिलानी थी, उसे पिलाई ही नहीं। गरीब जनता को परोस दी। इसीलिए सबकी जीभ ऐंठ रही है। कड़क चाय हलक से नीचे उतरकर खाली पेट में अल्सर पैदा कर रही है।’
लक्कड़-पत्थर हजम करने का दावा करने वाले बहरी अलंग के बनारसी महारथी इन दिनों दातून और सुरती तक के लिए तरस रहे हैं। रामनगरिहवा भंटे के चोखा के साथ खिचड़ी, मलाई की कुल्फी, संतरे और कसेरू की बरफी, केसरिया, तिरंगी, रसवंती, खीर कदम्ब, कमलगट्टे का हलुआ, सिंघाड़े की जलबी, छोटकी-बड़की कचौड़ी, खीर मोहन, घुघनी, मठरी, हलवा चाभने वाले बनारसियों को कड़कनाथ की कड़क चाय नहीं ‘पुसा’ रही है। मुट्ठी भर चना-चबैना खाकर संतोष की लंबी डकार मारने वालों को भी कड़क चाय का प्रिपरेशन नहीं सुहा रहा है।
नोटबंदी के बाद अस्सी के पप्पू चाय की अड़ी पर स्वाद का पूरा शास्त्र बूकने वाले अड़ीबाजों की मस्ती में लोटा भर कमी नहीं आई है। वहां इस बात पर रोजाना घनघोर बहस छिड़ रही है कि दाल-बाटी, खीर, चुरमा कचरकूट करने से पहले भांग छानने वालों को आखिर कड़क चाय रास क्यों नहीं आ रही है? कुछ साहित्यकार तर्क दे रहे हैं-जो जन्म से काले हैं, उन्हें सफेद कैसे किया जा सकता है? जो काले नहीं, उन्हें जबरिया कड़क चाय पीनी पड़ेगी तो कड़वाहट कम करने के लिए धिक्कारेगा ही... और थू-थू... करेगा ही। लोग बुरा मानते हैं, तो माने।
मंगरू चचा के आग्रह पर दूरदर्शी ने नेताओं के कड़कपन पर शोध किया। निष्कर्ष यह निकला कि कड़क रहने का नुस्खा सिर्फ कड़क नोटों से ही सीखा जा सकता है। जो जितना कड़क होगा, जिसके कपड़े जितने कड़क होंगे, चुनाव में जनता पर उसका रंग उतना ही चढ़ेगा। समकालीन आर्थिक सुधार का नया फंडा है आम जनता की जेबतराशी। कुछ लोगों को लगता है कि कड़कनाथ की कड़क चाय से देश कम, जनता ज्यादा बदल रही है।
काशी के साधु-संत दुनिया भर के लोगों को बताते रहे हैं कि नश्वर शरीर चला जाएगा, लेकिन माया नहीं जाएगी। कड़कनाथ ने ऐसी कड़क चाय पिला दी कि माया चली गई और शरीर रह गया। अब उनके चेले-चपाटी बनारसियों को समझा रहे हैं, ‘कितने दिन की बात है। कुछ कोड़े लगेंगे, थोड़ा दर्द भी होगा। देश हित में इतना तो बर्दाश्त कीजिए। कुछ सालों बाद आपके नाती-पोते भी इन दिनों को याद करेंगे।’ कहेंगे, ‘मेरे दादा-दादी भी नोटों की अदला-बदली के लिए 20 दिन तक लाइन में खड़े थे। कड़कनाथ के कड़क कोड़े खाए थे।’ हो सकता है कि यूपी में कोई सरकार आए और लोकतंत्र सेनानियों की तरह पेंशन एवं बसों में मुफ्त सफर का लालीपाप थमा दे।
दूरदर्शी को याद है कि मूर्ख और झक्की राजा तुगलक का राज भले ही चला, मगर सोने-चांदी के बदले उसका तांबे-गिलट का सिक्का नहीं चला। तुगलकी जमाने की तरह आजाद भारत में सिक्के नहीं, नोटों की अदला-बदली हो रही है। साइड इफेक्ट यह है कि दस रुपये के नकली सिक्के भी असली नोटों को भारी चोट दे रहे हैं। बड़े नेताओं के फेल होने पर जिस तरह छुटभैये चल जाते हैं, वैसे ही बड़े नोटों के बंद होने से चिल्लर चमक रहे हैं।
जर्नलिस्ट गुरु अनिल उपाध्याय कहते हैं कि समस्या भ्रष्टाचार की हो या कालेधन की। समाज में दोनों बुराइयां बेईमानों की वजह से नहीं, बल्कि ईमानदार लोगों के चुप रहने से उपजती हैं। वह लोगों को सलाह दे रहे हैं कि चैन से जीना है तो कड़कपन से परहेज कीजिए...। कड़े नेताओं और कड़े नोटों से दूर रहिए...। अन्यथा कड़कदार कोड़े खाने पड़ सकते हैं। तब बताना पड़ेगा कि आप कितने लाख वाले अच्छे आदमी हैं? बाद में आप जाने और आपका काम जाने।
और अंत में....
कतारें थककर भी खामोश, नजारे बोल रहे हैं।
नदी बहकर भी चुप, मगर किनारे बोल रहे हैं।
ये कैसा जलजला आया है काशी में इन दिनों।
सबकी हंसी और सबके शौक राज खोल रहे हैं।।
० दूरदर्शी

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