अबकी कुढ़-कुढ़ के हंसें दिवाली में
इन दिनों----------
मुस्कराना मजबूरी न होती तो दूरदर्शी जी-भरकर रो लेता। काशी में भला कौन नहीं जानता कि अबकी दिवाली से पहले ही कइयों का दिवाला निकल गया। राजघाट के भगदड़ और पितरकुंडा में बारूद में दफन लोगों के परिजनों की आहों ने...कराहों ने... सिसकियों ने...सैकड़ों लोगों की दिवाली काली कर दी। नामुराद पाक सीमा पर दनादन गोले दाग रहा है। जांबाज जवान शहीद हो रहे हैं। त्योहार की खुशियां काफूर हो गई हैं। और लोग हैं कि पटाखे पर पटाखे दागे जा रहे हैं।
पड़ोसी मंगरू चचा ने दूरदर्शी को समझाया, दुनियादार बनो। भावुकता अच्छी बात नहीं। सीखना हो तो पूर्वांचल के नेताओं से सीखो। देखा नहीं, अपने बलिया के नारद राय टीवी पर किस कदर फूट-फूटकर विलख रहे थे। खुद के लिए नहीं, रामगोपाल यादव के लिए। निलंबन से उनकी बहाली के लिए। दिवाली हो या होली, नेताओं की सधी नजर खास निशाने पर होती है। कहीं दीप जले या किसी का दिल टूटे, उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
दरअसल अपनी काशी में, पूरब की माटी में, नेताओं को घड़ियाली आंसू बहाने में महारत हासिल है। वैसे भी सभी नेताओं का राग एक जैसा ही है। वे आम जनता से यही कहते हैं, अच्छे नागरिक बनो। मतलब भूखे मरो...। बेरोजगार रहो...। अन्याय, अत्याचार, पक्षपात सहो...। भ्रष्टाचारी को पनाह दो...। लूटने वाले को डाका डालने दो...।
दूरदर्शी ने सुना है कि पहले काले कंबल पर कोई रंग नहीं चढ़ता था, अब खाकी पर कोई रंग नहीं चढ़ता। खाकी वर्दी भीड़ देखकर बौरा जाती है। चाहे राजघाट का जाम हो या अंधरापुल का। अफसरों के जाम में फंसते ही पुलिस लाठियां भांजने लगती है। आगे-पीछे तो देखती ही नहीं। चाहे कोई मरे या जीए।
कुछ दिनों से अपने शहर में दिवाली का मिजाज बिगड़ा हुआ है। चंद रोज पहले पितरकुंडा में पांच ऐसे लोग मारे गए, बारूद जिनकी जिंदगी थी। उनकी भूख की दवा थी। काशी में हुई दुखद घटनाओं से दूरदर्शी रुआंसा है। दिवाली में लोगों से भेंट-मुलाकात करते वक्त खुश रहना जरूरी था, इसलिए दूरदर्शी ने इसके लिए खासी वर्जिश की। रोनी सूरत पर मुस्कान लाने की कोशिश की। इस कोशिश में वह हास्यास्पद हो गया। न खुलकर हंस सका, न खुलकर रो सका।
मंगरू चचा के लाख समझाने के बावजूद दूरदर्शी बेहद मर्माहत है। एक-दो दिक्कत होती तो झेल भी लेता। अब किस-किस बात का रोना रोया जाए। रसोई का तेल दीयो में खर्च करना पड़ रहा है। अबकी दिवाली में राशन की दुकानों पर फकत एक किलो ही चीनी मिल पाई। गरीबों को केरोसिन तो नसीब ही नहीं हुआ। जो लोग दुकानों पर पहुंचे वे मिठाई कम, कड़वाहट ज्यादा लेकर लौटे।
काशी के लोग बेवजह मोदी पर भभक रहे हैं। महंगाई ऐसी डायन है जो सालों-साल से रुलाती आ रही है...डराती आ रही है...। न कभी मिटी, न उसका खौफ कम हुआ। अगर कहीं महंगाई मिटती नजर आती है तो अफसरों की फाइलों में, नेताओं के लच्छेदार भाषणों में।
मंगरू चचा अड़े हैं कि दिवाली काली न करो। वह तर्क देते हैं, ‘भले ही दिवाली से पहले दिवाला निकल गया है, पर बच्चों की खुशी के लिए खुश रहो। मीठा जरूर खाओ। इससे ‘थोथी प्रगतिशीलता’ थोड़े ही पाताल चली जाएगी।’
दूरदर्शी ने चचा को समझाया, ‘अबकी अपनी काशी में अनगिनत लोग मरे हैं। दुश्मनों ने हमारे कई जांबाज सैनिकों की पत्नियों को बेवा बनाया है। ऐसे में पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध तो होना ही चाहिए।’
चचा ने तर्क दिया, ‘क्यूं भाई? जाने कब से हमारी परंपरा है दिवाली पर पटाखे चलाने की। तुम उसे बंद क्यों कराना चाहते हो?’
हमने कहा, ‘परंपरा है तो क्या हुआ। बुरी चीज तो बुरी होती ही है। जगह-जगह आग लग जाती है। लोग-बाग जल जाते हैं। चेतन उपाध्याय सरीखे लोग छाती कूटने के लिए मजबूर हो जाते हैं।’
चचा ने कहा, ‘पटाखों को वैध और सुरक्षित तरीके से बेचने की व्यवस्था करना नौकरशाही का काम है। जब नौकरशाही फेल होती है तभी अवैध धंधे होते हैं। तेज आवाज वाले पटाखे बनते हैं, बिकते हैं और फूटते भी हैं। हमारी पुलिस रिश्वत लेकर पटाखे बनवाती है। बिकवाती है। सड़क से लेकर गलियों तक में। पहले अपनी पुलिस को सुधारो। जो चीज संभव नहीं, उस पर उसे कतई न रोको। खुश रहो और खुश रहने की कोशिश करो।’
दिवाली में दूरदर्शी को खुश करने के लिए मंगरू चचा ने तर्कों की झड़ी लगा दी। मगर दिल में खुशी का रंचमात्र एहसास नहीं हुआ। फर्क इतना है कि दिवाली के दिन अबकी त्योहारी मांगने वालों की कतार कुछ ज्यादा ही लंबी थी। दिवाली में मुबारकबाद दे-देकर कइयों ने कंगाली में आटा गीला कर दिया। कई सरकारी मुलाजिम भी साल भर की अपनी सेवा के बदले वसूली करने घर-घर पहुंचे। सबके चेहरे पर त्योहारी की नम्रता पुती थी। सिर्फ दूरदर्शी ही नहीं, कइयों ने अपनी कुढ़न जज्ब कर ली। त्योहार भी अब वसूली का जरिया बन गया है। इस वजह से कुछ लोगों को दिवाली की बधाई से चिढ़ होने लगी है। दूरदर्शी के कुछ पड़ोसियों ने अपने अगल-बगल कहलवा दिया है कि वे इन दिनों काशी में हैं ही नहीं। बाहर चले गए हैं, कब लौटेंगे पता नहीं?
और अंत में...
हंसी अबकी नहीं आई खामोश चेहरे पर।
जख्म निकले तो आंखों से पानी बनकर।।
दिवाली है तो अदा है, ख्वाब है, तमाशा है।
जन्नत में सब कुछ है, मगर मौत नहीं है।।
0 दूरदर्शी
इन दिनों----------
मुस्कराना मजबूरी न होती तो दूरदर्शी जी-भरकर रो लेता। काशी में भला कौन नहीं जानता कि अबकी दिवाली से पहले ही कइयों का दिवाला निकल गया। राजघाट के भगदड़ और पितरकुंडा में बारूद में दफन लोगों के परिजनों की आहों ने...कराहों ने... सिसकियों ने...सैकड़ों लोगों की दिवाली काली कर दी। नामुराद पाक सीमा पर दनादन गोले दाग रहा है। जांबाज जवान शहीद हो रहे हैं। त्योहार की खुशियां काफूर हो गई हैं। और लोग हैं कि पटाखे पर पटाखे दागे जा रहे हैं।
पड़ोसी मंगरू चचा ने दूरदर्शी को समझाया, दुनियादार बनो। भावुकता अच्छी बात नहीं। सीखना हो तो पूर्वांचल के नेताओं से सीखो। देखा नहीं, अपने बलिया के नारद राय टीवी पर किस कदर फूट-फूटकर विलख रहे थे। खुद के लिए नहीं, रामगोपाल यादव के लिए। निलंबन से उनकी बहाली के लिए। दिवाली हो या होली, नेताओं की सधी नजर खास निशाने पर होती है। कहीं दीप जले या किसी का दिल टूटे, उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
दरअसल अपनी काशी में, पूरब की माटी में, नेताओं को घड़ियाली आंसू बहाने में महारत हासिल है। वैसे भी सभी नेताओं का राग एक जैसा ही है। वे आम जनता से यही कहते हैं, अच्छे नागरिक बनो। मतलब भूखे मरो...। बेरोजगार रहो...। अन्याय, अत्याचार, पक्षपात सहो...। भ्रष्टाचारी को पनाह दो...। लूटने वाले को डाका डालने दो...।
दूरदर्शी ने सुना है कि पहले काले कंबल पर कोई रंग नहीं चढ़ता था, अब खाकी पर कोई रंग नहीं चढ़ता। खाकी वर्दी भीड़ देखकर बौरा जाती है। चाहे राजघाट का जाम हो या अंधरापुल का। अफसरों के जाम में फंसते ही पुलिस लाठियां भांजने लगती है। आगे-पीछे तो देखती ही नहीं। चाहे कोई मरे या जीए।
कुछ दिनों से अपने शहर में दिवाली का मिजाज बिगड़ा हुआ है। चंद रोज पहले पितरकुंडा में पांच ऐसे लोग मारे गए, बारूद जिनकी जिंदगी थी। उनकी भूख की दवा थी। काशी में हुई दुखद घटनाओं से दूरदर्शी रुआंसा है। दिवाली में लोगों से भेंट-मुलाकात करते वक्त खुश रहना जरूरी था, इसलिए दूरदर्शी ने इसके लिए खासी वर्जिश की। रोनी सूरत पर मुस्कान लाने की कोशिश की। इस कोशिश में वह हास्यास्पद हो गया। न खुलकर हंस सका, न खुलकर रो सका।
मंगरू चचा के लाख समझाने के बावजूद दूरदर्शी बेहद मर्माहत है। एक-दो दिक्कत होती तो झेल भी लेता। अब किस-किस बात का रोना रोया जाए। रसोई का तेल दीयो में खर्च करना पड़ रहा है। अबकी दिवाली में राशन की दुकानों पर फकत एक किलो ही चीनी मिल पाई। गरीबों को केरोसिन तो नसीब ही नहीं हुआ। जो लोग दुकानों पर पहुंचे वे मिठाई कम, कड़वाहट ज्यादा लेकर लौटे।
काशी के लोग बेवजह मोदी पर भभक रहे हैं। महंगाई ऐसी डायन है जो सालों-साल से रुलाती आ रही है...डराती आ रही है...। न कभी मिटी, न उसका खौफ कम हुआ। अगर कहीं महंगाई मिटती नजर आती है तो अफसरों की फाइलों में, नेताओं के लच्छेदार भाषणों में।
मंगरू चचा अड़े हैं कि दिवाली काली न करो। वह तर्क देते हैं, ‘भले ही दिवाली से पहले दिवाला निकल गया है, पर बच्चों की खुशी के लिए खुश रहो। मीठा जरूर खाओ। इससे ‘थोथी प्रगतिशीलता’ थोड़े ही पाताल चली जाएगी।’
दूरदर्शी ने चचा को समझाया, ‘अबकी अपनी काशी में अनगिनत लोग मरे हैं। दुश्मनों ने हमारे कई जांबाज सैनिकों की पत्नियों को बेवा बनाया है। ऐसे में पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध तो होना ही चाहिए।’
चचा ने तर्क दिया, ‘क्यूं भाई? जाने कब से हमारी परंपरा है दिवाली पर पटाखे चलाने की। तुम उसे बंद क्यों कराना चाहते हो?’
हमने कहा, ‘परंपरा है तो क्या हुआ। बुरी चीज तो बुरी होती ही है। जगह-जगह आग लग जाती है। लोग-बाग जल जाते हैं। चेतन उपाध्याय सरीखे लोग छाती कूटने के लिए मजबूर हो जाते हैं।’
चचा ने कहा, ‘पटाखों को वैध और सुरक्षित तरीके से बेचने की व्यवस्था करना नौकरशाही का काम है। जब नौकरशाही फेल होती है तभी अवैध धंधे होते हैं। तेज आवाज वाले पटाखे बनते हैं, बिकते हैं और फूटते भी हैं। हमारी पुलिस रिश्वत लेकर पटाखे बनवाती है। बिकवाती है। सड़क से लेकर गलियों तक में। पहले अपनी पुलिस को सुधारो। जो चीज संभव नहीं, उस पर उसे कतई न रोको। खुश रहो और खुश रहने की कोशिश करो।’
दिवाली में दूरदर्शी को खुश करने के लिए मंगरू चचा ने तर्कों की झड़ी लगा दी। मगर दिल में खुशी का रंचमात्र एहसास नहीं हुआ। फर्क इतना है कि दिवाली के दिन अबकी त्योहारी मांगने वालों की कतार कुछ ज्यादा ही लंबी थी। दिवाली में मुबारकबाद दे-देकर कइयों ने कंगाली में आटा गीला कर दिया। कई सरकारी मुलाजिम भी साल भर की अपनी सेवा के बदले वसूली करने घर-घर पहुंचे। सबके चेहरे पर त्योहारी की नम्रता पुती थी। सिर्फ दूरदर्शी ही नहीं, कइयों ने अपनी कुढ़न जज्ब कर ली। त्योहार भी अब वसूली का जरिया बन गया है। इस वजह से कुछ लोगों को दिवाली की बधाई से चिढ़ होने लगी है। दूरदर्शी के कुछ पड़ोसियों ने अपने अगल-बगल कहलवा दिया है कि वे इन दिनों काशी में हैं ही नहीं। बाहर चले गए हैं, कब लौटेंगे पता नहीं?
और अंत में...
हंसी अबकी नहीं आई खामोश चेहरे पर।
जख्म निकले तो आंखों से पानी बनकर।।
दिवाली है तो अदा है, ख्वाब है, तमाशा है।
जन्नत में सब कुछ है, मगर मौत नहीं है।।
0 दूरदर्शी

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