‘अंग्रेजी में ना बोलूं री आई लव यू..
.’
इन दिनों-----
काशी में जब से दो-हजारी नोट आया है तब से अपने शहर के ‘पिंगलबाजों’ की हवा खराब है। लोग थूक लगाकर नोट गिन रहे हैं और उनकी बीवियां समझ रही हैं मियां ‘मजनू’ बन गए हैं। बाहरवालियों की लिपिस्टिक अपने होठों पर छाप रहे हैं। दो-हजारी की आड़ में नैन-मटक्का कर रहे हैं। कइयों की घर में ‘कुटम्मस’ भी होने लगी है। नोट बदलने के लिए लाइन में लगने वाले अपनी बीवियों का पांव पकड़कर दुहाई दे रहे हैं, ‘अंग्रेजी में ना बोलूं री आई लव यू...।’ दूरदर्शी को लगता है कि नोटबंदी के चलते काशी में ‘पिंगलबाजी’ की महान परंपरा का जनाजा निकलने वाला है।
पीएम नरेंद्र मोदी ‘भगत’ ऐसे हैं कि गरीब बेटियों की मां-बाप को रुला रहे हैं। भाजपा नेताओं के लाडलों की शादी शाही अंदाज में करा रहे हैं। न कोई जांच, न कोई पड़ताल। जनता को अपना ही धन निकालने पर पहरा बैठा रहे हैं। बैंक वालों को थानेदार बना रहे हैं। गरीबों को शादी के लिए पैसा लेने से पहले सीबीआई की तरह पड़ताल करा रहे हैं।
दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरू चचा ‘हुजूर’ की इस अदा के दीवाने हैं। चाहते हैं कि वह अबकी काशी के महामूर्ख सम्मेलन में जरूर आएं। आयोजक बांटे गए सारे तमगे बटोरकर उन्हें समर्पित कर दें। शेखचिल्ली की तरह ‘हुजूर’ को भी लगता है कि कालाधन ऐसी बीमारी है कि हाथ-पैर में हो तो उसे काट दो... दिमाग में हो तो भेजा ही निकाल दो...। रिश्वतखोरों, दलालों, जमाखोरों और हवाला कारोबारियों को फलने-फूलने के लिए ‘हुजूर’ ने दो-हजारी तो चला ही दी है। चूरनवाली नोट का हल्ला महज बनारस ही नहीं, दिल्ली के संसद तक में हो रहा है।
काशी में कहावत है, ‘जबरा मारे और रोए न दे...।’ यह कहावत गुंडई, लूट, यातना, भय, अहंकार, पीड़ा देने और शोषण करने वालों के लिए गढ़ी गई थी। बनारस के ‘पिंगलबाज’ चाहते हैं कि इसमें अपने वित्त मंत्री अरुण जेटली का नाम भी जोड़ दिया जाए। जनाब देश के नामी वकील हैं। मुवक्किलों से मोटी फीस लेते हैं। लोग पूछ रहे हैं कि मुकदमा लड़ने के लिए आपने कितने क्लाइंटों को लेनदारी की रसीद दी? डाक्टरों की तरह देश भर के वकीलों को भी ‘स्वैप मशीन’ थमाने का इरादा है क्या?
दूरदर्शी को याद है कि काशी में गुंडई की परंपरा सैकड़ों साल फली-फूली है। लेकिन तब ‘गुंडा’ शब्द सम्मानसूचक, वीरता, महिला, निर्बल, असहायों के अलावा धर्म-संस्कृति का रक्षक, समाज और देश का संरक्षणकर्ता के रूप में स्वीकार किया जाता था। काशी का ‘गुंडा’ विद्वान होता था। लंगोट का पक्का और संस्कार का धनी था। दासता और अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ भी लड़ता था। काशी के ‘गुंडों’ ने अंग्रेज तानाशाह वारेन हेस्टिंग्स को गड़ासे से मारकर भगाया था। ‘हुजूर’ की ‘गुंडई’ लोगों को ढरकी की तरह आंसू बहाने के लिए विवश कर रही है। धनकुबेर घर बैठे ही अपना सारा कालाधन सफेद कर रहे हैं। जान तो अपने शहर के ‘घुरहू-कतवारू’ की जा रही है..।
दूरदर्शी ने टीवी पर देखा कि पैसा लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की मां भी बैंक गई थीं। ऐसी ही एक लाइन में राहुल गांधी भी नजर आए थे। सीएम अरविंद केजरीवाल दिल्ली में छाती कूटते दिख रहे हैं। लगता है कि ये नेता फोटो खिंचाने और अखबारों में छपवाने का कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहते। अगर नकदी नहीं होगी तो बैंकों की क्या जरुरत है? और अगर बैंक नहीं होंगे, उनके सामने कतारें कैसे लगेंगी?
पुराने जमाने में लोग सामान से सामान (वस्तु-विनिमय प्रणाली) बदलते थे। पड़ोसी जनपद चंदौली से खबरें आ रही हैं कि इन दिनों कुछ लोग धान काटने में जुटे हैं तो बड़ी संख्या में नौगढ़वासी नदी-बांधों में मछली मार रहे हैं। धान और मछली की अदला-बदली हो रही है। नक्सली लालब्रत कोल जेल में न होता तो नौगढ़ पुलिस उसे हजार-दो हजार मछलियों के साथ जरूर पकड़ लेती। ये कैशलेस सुसज्जित समाज का सबसे अच्छा उदाहरण है। न फर्जी मुद्रा का खतरा और न नक्सलियों को पकड़ने के लिए भागदौड़ की जरुरत। जब उनके पास नकदी होगी ही नहीं, तो बम-कारतूस खरीदेंगे कैसे?
मंगरू चचा के सवाल पर दूरदर्शी ने उन्हें याद दिलाया कि अपने सांसद नरेंद्र मोदी और भाजपा की दो बड़ी हसरतें थीं। पहली-अच्छे दिन की, दूसरी-कालाधन निकासी की। सोशल मीडिया के दीवानों की मानें तो मोदीभक्तों की दोनों इच्छाएं पूरी हो गई हैं। ‘हुजूर’ ने आठ नवंबर को एक झटके में देश को ‘कैशलेस’ समाज में बदल दिया। दो हफ्ता गुजरने को है और नकदी के दर्शन फकत नसीब वालों को ही रहे हैं।
हाल ऐसा कि घरों के दरवाजे खुले पड़े हैं, लेकिन न कोई लूट रहा है और न कुछ लेकर भाग रहा है। जो पैसे मांग रहे थे, वह घर आकर दे रहे हैं। जिसका बकाया है, वह ले नहीं रहा है। लग रहा है कि ‘पैसे से मुहब्बत’ की तमन्ना सबकी खत्म हो गई है। ऐसा शासन तो भगवान राम के समय में ही प्रचलित था। न कोई बेईमानी, न धोखाधड़ी। ‘हुजूर’ के ‘कैशलेस’ समाज को सलाम। भक्त गा रहे हैं, इसलिए आप भी कहें, ‘आ गया है रामराज्य...।’
और अंत में....
बांची जा रही ईमान और ईमानदारी
आईना रोने लगे हालात देख हमारी।
अब मिल रही चूरन वाली दोहजारी
मुल्क हैरान है देखकर ऐसा मदारी।।
0 दूरदर्शी
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काशी में जब से दो-हजारी नोट आया है तब से अपने शहर के ‘पिंगलबाजों’ की हवा खराब है। लोग थूक लगाकर नोट गिन रहे हैं और उनकी बीवियां समझ रही हैं मियां ‘मजनू’ बन गए हैं। बाहरवालियों की लिपिस्टिक अपने होठों पर छाप रहे हैं। दो-हजारी की आड़ में नैन-मटक्का कर रहे हैं। कइयों की घर में ‘कुटम्मस’ भी होने लगी है। नोट बदलने के लिए लाइन में लगने वाले अपनी बीवियों का पांव पकड़कर दुहाई दे रहे हैं, ‘अंग्रेजी में ना बोलूं री आई लव यू...।’ दूरदर्शी को लगता है कि नोटबंदी के चलते काशी में ‘पिंगलबाजी’ की महान परंपरा का जनाजा निकलने वाला है।
पीएम नरेंद्र मोदी ‘भगत’ ऐसे हैं कि गरीब बेटियों की मां-बाप को रुला रहे हैं। भाजपा नेताओं के लाडलों की शादी शाही अंदाज में करा रहे हैं। न कोई जांच, न कोई पड़ताल। जनता को अपना ही धन निकालने पर पहरा बैठा रहे हैं। बैंक वालों को थानेदार बना रहे हैं। गरीबों को शादी के लिए पैसा लेने से पहले सीबीआई की तरह पड़ताल करा रहे हैं।
दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरू चचा ‘हुजूर’ की इस अदा के दीवाने हैं। चाहते हैं कि वह अबकी काशी के महामूर्ख सम्मेलन में जरूर आएं। आयोजक बांटे गए सारे तमगे बटोरकर उन्हें समर्पित कर दें। शेखचिल्ली की तरह ‘हुजूर’ को भी लगता है कि कालाधन ऐसी बीमारी है कि हाथ-पैर में हो तो उसे काट दो... दिमाग में हो तो भेजा ही निकाल दो...। रिश्वतखोरों, दलालों, जमाखोरों और हवाला कारोबारियों को फलने-फूलने के लिए ‘हुजूर’ ने दो-हजारी तो चला ही दी है। चूरनवाली नोट का हल्ला महज बनारस ही नहीं, दिल्ली के संसद तक में हो रहा है।
काशी में कहावत है, ‘जबरा मारे और रोए न दे...।’ यह कहावत गुंडई, लूट, यातना, भय, अहंकार, पीड़ा देने और शोषण करने वालों के लिए गढ़ी गई थी। बनारस के ‘पिंगलबाज’ चाहते हैं कि इसमें अपने वित्त मंत्री अरुण जेटली का नाम भी जोड़ दिया जाए। जनाब देश के नामी वकील हैं। मुवक्किलों से मोटी फीस लेते हैं। लोग पूछ रहे हैं कि मुकदमा लड़ने के लिए आपने कितने क्लाइंटों को लेनदारी की रसीद दी? डाक्टरों की तरह देश भर के वकीलों को भी ‘स्वैप मशीन’ थमाने का इरादा है क्या?
दूरदर्शी को याद है कि काशी में गुंडई की परंपरा सैकड़ों साल फली-फूली है। लेकिन तब ‘गुंडा’ शब्द सम्मानसूचक, वीरता, महिला, निर्बल, असहायों के अलावा धर्म-संस्कृति का रक्षक, समाज और देश का संरक्षणकर्ता के रूप में स्वीकार किया जाता था। काशी का ‘गुंडा’ विद्वान होता था। लंगोट का पक्का और संस्कार का धनी था। दासता और अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ भी लड़ता था। काशी के ‘गुंडों’ ने अंग्रेज तानाशाह वारेन हेस्टिंग्स को गड़ासे से मारकर भगाया था। ‘हुजूर’ की ‘गुंडई’ लोगों को ढरकी की तरह आंसू बहाने के लिए विवश कर रही है। धनकुबेर घर बैठे ही अपना सारा कालाधन सफेद कर रहे हैं। जान तो अपने शहर के ‘घुरहू-कतवारू’ की जा रही है..।
दूरदर्शी ने टीवी पर देखा कि पैसा लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की मां भी बैंक गई थीं। ऐसी ही एक लाइन में राहुल गांधी भी नजर आए थे। सीएम अरविंद केजरीवाल दिल्ली में छाती कूटते दिख रहे हैं। लगता है कि ये नेता फोटो खिंचाने और अखबारों में छपवाने का कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहते। अगर नकदी नहीं होगी तो बैंकों की क्या जरुरत है? और अगर बैंक नहीं होंगे, उनके सामने कतारें कैसे लगेंगी?
पुराने जमाने में लोग सामान से सामान (वस्तु-विनिमय प्रणाली) बदलते थे। पड़ोसी जनपद चंदौली से खबरें आ रही हैं कि इन दिनों कुछ लोग धान काटने में जुटे हैं तो बड़ी संख्या में नौगढ़वासी नदी-बांधों में मछली मार रहे हैं। धान और मछली की अदला-बदली हो रही है। नक्सली लालब्रत कोल जेल में न होता तो नौगढ़ पुलिस उसे हजार-दो हजार मछलियों के साथ जरूर पकड़ लेती। ये कैशलेस सुसज्जित समाज का सबसे अच्छा उदाहरण है। न फर्जी मुद्रा का खतरा और न नक्सलियों को पकड़ने के लिए भागदौड़ की जरुरत। जब उनके पास नकदी होगी ही नहीं, तो बम-कारतूस खरीदेंगे कैसे?
मंगरू चचा के सवाल पर दूरदर्शी ने उन्हें याद दिलाया कि अपने सांसद नरेंद्र मोदी और भाजपा की दो बड़ी हसरतें थीं। पहली-अच्छे दिन की, दूसरी-कालाधन निकासी की। सोशल मीडिया के दीवानों की मानें तो मोदीभक्तों की दोनों इच्छाएं पूरी हो गई हैं। ‘हुजूर’ ने आठ नवंबर को एक झटके में देश को ‘कैशलेस’ समाज में बदल दिया। दो हफ्ता गुजरने को है और नकदी के दर्शन फकत नसीब वालों को ही रहे हैं।
हाल ऐसा कि घरों के दरवाजे खुले पड़े हैं, लेकिन न कोई लूट रहा है और न कुछ लेकर भाग रहा है। जो पैसे मांग रहे थे, वह घर आकर दे रहे हैं। जिसका बकाया है, वह ले नहीं रहा है। लग रहा है कि ‘पैसे से मुहब्बत’ की तमन्ना सबकी खत्म हो गई है। ऐसा शासन तो भगवान राम के समय में ही प्रचलित था। न कोई बेईमानी, न धोखाधड़ी। ‘हुजूर’ के ‘कैशलेस’ समाज को सलाम। भक्त गा रहे हैं, इसलिए आप भी कहें, ‘आ गया है रामराज्य...।’
और अंत में....
बांची जा रही ईमान और ईमानदारी
आईना रोने लगे हालात देख हमारी।
अब मिल रही चूरन वाली दोहजारी
मुल्क हैरान है देखकर ऐसा मदारी।।
0 दूरदर्शी

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