पहुना’ को पोटियाने में जुटी ‘टोनही’ नौकरशाही
इन दिनों-----
काशी नरेश के पूर्वज भेष बदलकर प्रजा का हालचाल जानने निकलते थे। पहले राजा को ऐसी ड्रेस डिजाइन करानी पड़ती थी कि कोई पहचान ही न पाए। अपने शहर के सांसद देश के प्रधानमंत्री (राजा) हैं। जनता का हालचाल लेने धूम-धड़ाके के साथ काशी आ रहे हैं। इन दिनों उनके लिए पूरे शहर का भेष बदला जा रहा है। अबकी भाजपाइयों ने, एसपीजी ने, पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने ड्रेसकोड जारी किया है कि जो भी मोदी को देखने-सुनने आए वे काले कपड़े में न आए।
भाजपाइयों के फरमान से दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरु चचा आहत हैं। परेशान हैं, हैरान हैं। वह समझ नहीं पा रहे हैं कि कलफदार कपड़े लाएं कहां से? जब भी नए कपड़े सिलवाते हैं कीचड़, गंदगी और धूल-गर्दे से अगले दिन ही काले हो जाते हैं। शहर की अधिसंख्य सड़कों पर बहने वाले सीवर के गंदे पानी से, नालों के कीचड़ से सब के सब काले हो गए हैं। मोदी को देखने-सुनने की हसरत आखिर पूरी हो भी तो कैसे?
दूरदर्शी को याद है कि समूची काशी कई सालों से भाजपाई सांसदों, विधायकों और मेयरों की रहनुमाई में पाली जाती रही है। इस शहर को फैंसी जनप्रतिनिधियों ने इस रंग में रंग दिया है कि नेताओं को छोड़ शायद ही किसी के पास सफेद और कलफदार कपड़े बचे हों।
मोदी जब काशी में आते हैं तब सरकारी मशीनरी टेंपरेरी कल्पवृक्ष बन जाती है। शहर भले ही बदहाल रहे, पर डीरेका इलाके के लोग जो मांगते हैं, अफसर सब कुछ दे देते हैं। उनके लौटते ही सब कुछ वापस मांग लेते हैं। प्रधानमंत्री काशी आने वाले हैं। अफसर चाहते हैं कि मोदी जब भी बनारस आएं तो जल्द से जल्द खिसक जाएं। अपने शहर के लोग चाहते हैं कि वे चंद घंटों के लिए नहीं, कुछ रोज यहां जरूर गुजारें। जाहिर है कि अगर पीएम काशी में कुछ दिन टिकेंगे तो जनता की सेहत सुधरेगी, लेकिन अफसरों की सेहत खराब हो जाएगी, वे बीमार हो जाएंगे। घोटालेबाज अफसरों को जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। निकम्मे और काहिल जनप्रतिनिधियों का टिकट कट सकता है। तोंद निकालकर राजनीतिक गोंटी लाल करने वाले नेताओं का पत्ता कट सकता है। मैनहोल का ढक्कन चुराकर करोड़पति बने कुछ धनकुबेर जनप्रतिनिधियों पर पीएम ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करा सकते हैं।
मोदी के काशी दौरे से दूरदर्शी गदगद है। काशी की सड़कों पर पैबंद लग गया है। कुछ जानलेवा गड्ढे भर गए हैं। लेकिन पूरे शहर में नहीं। सिर्फ उन्हीं इलाकों में जहां से पीएम गुजर सकते हैं। वैसे भी काशी के अफसरों को रातों-रात पेड़ लगाने, सब कुछ संवार देने का खासा तजुर्बा है। ठीक वैसे ही जैसे दफ्तर के बाद घर लौटने वाले साहबों के इंतजार में उनकी बीवियां ‘रगड़ा क्लब’ में जाने के लिए सज-धजकर तैयार रहती हैं।
अपने शहर के अफसर इन दिनों काशी के सांसद को ‘पहुना’ बनाने के मूड में हैं। वे चाहते हैं कि ‘पहुना’ को अपना शहर चकाचक दिखे। समूची काशी भले ही बदसूरत हो..., बेहाल हो..., तिल-तिलकर मर रही हो..., पर अफसर दुनिया की सारी सुंदरता बटोरकर डीरेका में पोत देना चाहते हैं। शायद इन्हें लगता है कि मोदी काम से भले ही न रीझें, लेकिन उनके ‘एक्ट्रा करीकुलम’ पर जरूर भौंचक्का हो जाएं। उनका प्रमोशन हो जाए। आज बनारस में हैं, कल वे भी दिल्ली पहुंच जाएं। वे जी-भरकर दिल्ली में दिल्लगी करें।
मंगरू चचा ने कल दूरदर्शी से सवाल किया कि मोदी अबकी दिवाली से पहले क्यों आ रहे हैं? मैने चचा को याद दिलाया कि दिवाली पास होती है तो मोहनी मंत्र अच्छी तरह जगती है। दिवाली के दिन ‘टोनही’ भी अपना लाइसेंस रिन्यू (जाटू-टोना जगाना) कराती है। दिवाली में ही पता चलता है कि ‘टोनही’ को विद्या का नियम-कायदा मालूम है या भूल गई है। दिवाली के समय ही अफसरों की काबिलियत का ट्रायल होता है। ये पास होते हैं तो कुछ दिनों के लिए बाबा की नगरी में लूटने-खसोटने के लिए इनके लाइसेंस का रिन्यूवल हो जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे आरटीओ वाले लाइसेंस रिन्यू करते हैं।
सरकारी मशीनरी के लिए प्रधानमंत्री की काशी यात्रा दिवाली का त्योहार है। अपने शहर में हजारों पुलिस और प्रशासनिक अफसरों का रेला जुटा है। मोदी की यात्रा में सब के सब अपनी मोहनी विद्या का रिन्यूवल कराना चाहते हैं। इनका जादू दोतरफा चलता है। एक ओर जनता पर टोना करते हैं और दूसरी ओर प्रधानमंत्री को नजरबंद कर देते हैं। जहां पानी नहीं, वहां समुद्र दिखा देते हैं। जहां हरियाली नहीं, वहां पेड़ दिखा देते हैं। प्रधानमंत्री की यात्रा का फरमान आया नहीं, अफसरों की विद्या का ट्रायल शुरू हो जाता है। टोना की विद्या में फेल रहने वाले अफसर बाहर कर दिए जाते हैं।
दूरदर्शी का मानना है कि ‘टोनही’ निरंतर रही है और उसे चैलेंज करने वाले ही मरते रहे हैं। अधिकारी वैसे ही बने रहते हैं, जैसे ‘टोनही’ अपनी जादू आजमाती रहती है। मोदी आ रहे हैं तो शेर, भालू, लोमड़ी, चीतल, सियार, सांप, बिच्छू के लिए भी सरकार का खजाना खुल गया है। काशी के लोग खुश हैं कि हुजूर आएं। चाहे जनतंत्री घोड़े पर सवार होकर, चाहे सामंती खटोले पर। लेकिन ‘टोनही’ नौकरशाही के ‘उच्चाटन’ से राहत दिला दें। उनकी मोहनी विद्या को बेअसर कर दें। कम से कम काशी के लोग भी काले के बजाए सफेद और कलफदार कपड़े पहनकर घर से बाहर निकल सकें। मोदी को देखने-सुनने की सबकी मुराद पूरी हो सके।
और अंत में.....
काशी के सफेदपोशों में वफा ढूंढ रहे हो
क्यूं फरेब सजाने का हुनर सीख रहे हो।
हर बार टूटता है दिल इस कदर संग-दिल
भरी जहर की शीशी में दवा ढूंढ रहे हो।।
o दूरदर्शी
इन दिनों-----
काशी नरेश के पूर्वज भेष बदलकर प्रजा का हालचाल जानने निकलते थे। पहले राजा को ऐसी ड्रेस डिजाइन करानी पड़ती थी कि कोई पहचान ही न पाए। अपने शहर के सांसद देश के प्रधानमंत्री (राजा) हैं। जनता का हालचाल लेने धूम-धड़ाके के साथ काशी आ रहे हैं। इन दिनों उनके लिए पूरे शहर का भेष बदला जा रहा है। अबकी भाजपाइयों ने, एसपीजी ने, पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने ड्रेसकोड जारी किया है कि जो भी मोदी को देखने-सुनने आए वे काले कपड़े में न आए।
भाजपाइयों के फरमान से दूरदर्शी के पड़ोसी मंगरु चचा आहत हैं। परेशान हैं, हैरान हैं। वह समझ नहीं पा रहे हैं कि कलफदार कपड़े लाएं कहां से? जब भी नए कपड़े सिलवाते हैं कीचड़, गंदगी और धूल-गर्दे से अगले दिन ही काले हो जाते हैं। शहर की अधिसंख्य सड़कों पर बहने वाले सीवर के गंदे पानी से, नालों के कीचड़ से सब के सब काले हो गए हैं। मोदी को देखने-सुनने की हसरत आखिर पूरी हो भी तो कैसे?
दूरदर्शी को याद है कि समूची काशी कई सालों से भाजपाई सांसदों, विधायकों और मेयरों की रहनुमाई में पाली जाती रही है। इस शहर को फैंसी जनप्रतिनिधियों ने इस रंग में रंग दिया है कि नेताओं को छोड़ शायद ही किसी के पास सफेद और कलफदार कपड़े बचे हों।
मोदी जब काशी में आते हैं तब सरकारी मशीनरी टेंपरेरी कल्पवृक्ष बन जाती है। शहर भले ही बदहाल रहे, पर डीरेका इलाके के लोग जो मांगते हैं, अफसर सब कुछ दे देते हैं। उनके लौटते ही सब कुछ वापस मांग लेते हैं। प्रधानमंत्री काशी आने वाले हैं। अफसर चाहते हैं कि मोदी जब भी बनारस आएं तो जल्द से जल्द खिसक जाएं। अपने शहर के लोग चाहते हैं कि वे चंद घंटों के लिए नहीं, कुछ रोज यहां जरूर गुजारें। जाहिर है कि अगर पीएम काशी में कुछ दिन टिकेंगे तो जनता की सेहत सुधरेगी, लेकिन अफसरों की सेहत खराब हो जाएगी, वे बीमार हो जाएंगे। घोटालेबाज अफसरों को जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। निकम्मे और काहिल जनप्रतिनिधियों का टिकट कट सकता है। तोंद निकालकर राजनीतिक गोंटी लाल करने वाले नेताओं का पत्ता कट सकता है। मैनहोल का ढक्कन चुराकर करोड़पति बने कुछ धनकुबेर जनप्रतिनिधियों पर पीएम ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करा सकते हैं।
मोदी के काशी दौरे से दूरदर्शी गदगद है। काशी की सड़कों पर पैबंद लग गया है। कुछ जानलेवा गड्ढे भर गए हैं। लेकिन पूरे शहर में नहीं। सिर्फ उन्हीं इलाकों में जहां से पीएम गुजर सकते हैं। वैसे भी काशी के अफसरों को रातों-रात पेड़ लगाने, सब कुछ संवार देने का खासा तजुर्बा है। ठीक वैसे ही जैसे दफ्तर के बाद घर लौटने वाले साहबों के इंतजार में उनकी बीवियां ‘रगड़ा क्लब’ में जाने के लिए सज-धजकर तैयार रहती हैं।
अपने शहर के अफसर इन दिनों काशी के सांसद को ‘पहुना’ बनाने के मूड में हैं। वे चाहते हैं कि ‘पहुना’ को अपना शहर चकाचक दिखे। समूची काशी भले ही बदसूरत हो..., बेहाल हो..., तिल-तिलकर मर रही हो..., पर अफसर दुनिया की सारी सुंदरता बटोरकर डीरेका में पोत देना चाहते हैं। शायद इन्हें लगता है कि मोदी काम से भले ही न रीझें, लेकिन उनके ‘एक्ट्रा करीकुलम’ पर जरूर भौंचक्का हो जाएं। उनका प्रमोशन हो जाए। आज बनारस में हैं, कल वे भी दिल्ली पहुंच जाएं। वे जी-भरकर दिल्ली में दिल्लगी करें।
मंगरू चचा ने कल दूरदर्शी से सवाल किया कि मोदी अबकी दिवाली से पहले क्यों आ रहे हैं? मैने चचा को याद दिलाया कि दिवाली पास होती है तो मोहनी मंत्र अच्छी तरह जगती है। दिवाली के दिन ‘टोनही’ भी अपना लाइसेंस रिन्यू (जाटू-टोना जगाना) कराती है। दिवाली में ही पता चलता है कि ‘टोनही’ को विद्या का नियम-कायदा मालूम है या भूल गई है। दिवाली के समय ही अफसरों की काबिलियत का ट्रायल होता है। ये पास होते हैं तो कुछ दिनों के लिए बाबा की नगरी में लूटने-खसोटने के लिए इनके लाइसेंस का रिन्यूवल हो जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे आरटीओ वाले लाइसेंस रिन्यू करते हैं।
सरकारी मशीनरी के लिए प्रधानमंत्री की काशी यात्रा दिवाली का त्योहार है। अपने शहर में हजारों पुलिस और प्रशासनिक अफसरों का रेला जुटा है। मोदी की यात्रा में सब के सब अपनी मोहनी विद्या का रिन्यूवल कराना चाहते हैं। इनका जादू दोतरफा चलता है। एक ओर जनता पर टोना करते हैं और दूसरी ओर प्रधानमंत्री को नजरबंद कर देते हैं। जहां पानी नहीं, वहां समुद्र दिखा देते हैं। जहां हरियाली नहीं, वहां पेड़ दिखा देते हैं। प्रधानमंत्री की यात्रा का फरमान आया नहीं, अफसरों की विद्या का ट्रायल शुरू हो जाता है। टोना की विद्या में फेल रहने वाले अफसर बाहर कर दिए जाते हैं।
दूरदर्शी का मानना है कि ‘टोनही’ निरंतर रही है और उसे चैलेंज करने वाले ही मरते रहे हैं। अधिकारी वैसे ही बने रहते हैं, जैसे ‘टोनही’ अपनी जादू आजमाती रहती है। मोदी आ रहे हैं तो शेर, भालू, लोमड़ी, चीतल, सियार, सांप, बिच्छू के लिए भी सरकार का खजाना खुल गया है। काशी के लोग खुश हैं कि हुजूर आएं। चाहे जनतंत्री घोड़े पर सवार होकर, चाहे सामंती खटोले पर। लेकिन ‘टोनही’ नौकरशाही के ‘उच्चाटन’ से राहत दिला दें। उनकी मोहनी विद्या को बेअसर कर दें। कम से कम काशी के लोग भी काले के बजाए सफेद और कलफदार कपड़े पहनकर घर से बाहर निकल सकें। मोदी को देखने-सुनने की सबकी मुराद पूरी हो सके।
और अंत में.....
काशी के सफेदपोशों में वफा ढूंढ रहे हो
क्यूं फरेब सजाने का हुनर सीख रहे हो।
हर बार टूटता है दिल इस कदर संग-दिल
भरी जहर की शीशी में दवा ढूंढ रहे हो।।
o दूरदर्शी

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