Tuesday, 13 December 2016

काशी के अफसर और ‘बुल फाइटिंग’ का शौक


काशी के अफसर और ‘बुल फाइटिंग’ का शौक

इन दिनों ----------
दूरदर्शी ने सुना है कि स्पेन के मेलियाना की ‘बुल फाइटिंग’ (सांड की लड़ाई) समूची दुनिया में प्रसिद्ध है। इस अनोखी लड़ाई में शामिल होने वाले सांड़ों की सींगों पर आग के दहकते गोले बांधे जाते हैं। जांबाज लड़ाके इन सांड़ों को चुनौती देते हैं। खेल-खेलने वाले ही नहीं, दर्शक भी घायल होते और मरते हैं। मगर यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है। स्पेन से सीख लेकर काशी के पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने अब अपने शहर को ‘बुल फाइटिंग’ का अखाड़ा बना दिया है। कोई भी भीड़ जुटाने की अर्जी लेकर जाता है तो रंगुआ सियार की तरह वे नकली पट्टा थमा देते हैं। ‘बुल फाइटिंग’ की पटकथा काशी के राजघाट पुल पर भी दोहराई गई। प्रशासन के नकली पट्टे को स्वर्ग का परवाना समझकर पहुंचे बाबा जयगुरुदेव के दो दर्जन से अधिक भक्त खुदा को प्यारे हो गए। दिल दहला देने वाले हादसे के मंजर से दूरदर्शी जार-जार रो रहा है, लेकिन अब लगता है कि प्रशासनिक रूप से अक्षम अफसरों को बनारस में ‘बुल फाइटिंग’ खूब भाने लगी है।
कहते हैं कि ‘अंधों के आगे रोना, अपना दीदा खोना।’ आखिर कोई कितना रोए? काशी के लोगों की आंखों में आंसुओं का सीमित स्टाक है। आतंकियों ने जब कैंट स्टेशन पर, संकटमोचन मंदिर में, कचहरी पर और गंगा घाट पर बम फोड़ा था, तभी लोगों की आंखों से आंसुओं का स्टाक खत्म हो गया था। आंसू कोई खून तो हैं नहीं, जो बेवजह बहने लगे? जरुरत पड़ने पर आईएमए से हासिल कर लें।
राजघाट हादसे के बाद दूरदर्शी रोने के बजाए ‘बुल फाइटिंग’ का पट्टा थमाने वाले पुलिस और प्रशासनिक अफसरों को पुरस्कृत करना चाहता है। उन्हें इसलिए दाद देना चाहता है कि उनकी कारस्तानियों पर समूचा शहर फिदा है। कोबरा सांपों को भी शर्म आने लगी है कि शहर के पुलिस और प्रशासनिक अफसर नोटों की खनक के चलते उनसे भी ज्यादा खतरनाक और जहरीले हो गए हैं। राजघाट हादसे के बाद काशी के लोगों को लगन लगा है कि नागफनी के कांटे से भी अधिक कंटीले हो गए हैं, इनके नकली पट्टे।
पड़ोसी मंगरू चचा ने दूरदर्शी से सवाल किया कि काशी में सड़कों पर यमराज और उनके दूतों ने मनमानी क्यों मचा रखी है? आखिर कब बंद होगा यह सिलसिला? दूरदर्शी ने चचा को समझाया कि काशी के कलेक्टर व कप्तान पर ‘बुल फाइटिंग’ का नया-नया शौक चढ़Þा है। पैदल चलने वालों को खून से लथपथ और साइकिल वालों को शरीर से बेकार बनाने का करतब इन्हें खूब भा रहा है। शायद इन अफसरों को लगता है कि लोग अफवाहजनित हादसों में नहीं मरेंगे तो बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी हो जाएगी। फिर नौकरी मांगेगी। जिंदा बच गए तो लोगों को बेवजह बुढ़ापा सताएगा। वैसे जनता क ा दिल पत्थर की तरह हो गया है। कुछ लोगों का दिमाग भी कुंद हो चुका है। किसी की लच्छेदार बातें सुनकर जान की परवाह किए बगैर लोग-बाग चल देते हैं किसी तरफ, कहीं भी।
मंगरू चचा को लगता है कि सिर्फ अखबार वाले ही ‘शनीचर’ को ‘मरणीचर’ मानते हैं। ‘मंगल’ को ‘अमंगल’ मानते हैं। काशी के कलेक्टर और कप्तान को लगता है कि कुसूरवार वे नहीं, अखबारनवीस हैं। वे जानबूझकर बाल की खाल निकालते हैं। जनता के क्रोध के ब्रेक को फेल करते हैं।
दूरदर्शी को लगता है कि बनारस प्रशासन ने अब निर्दोष जनता के खाक होने के कई दरवाजे खोल दिए हैं। काशी के कुछ मठाधीशों को चाइनीज लकड़ी का इंतजार है। श्मशान घाटों पर नकली लकड़ी की खोज भले ही न हो पाई हो, लेकिन असली लकड़ी में मिलाने के लिए जानवरों की हड्डियों वाला देशी घी और चंदन का नकली बुरादा जमकर समूचे शहर में धड़ल्ले से बनाया व बेचा जा रहा है। यह सब इसलिए हो रहा है कि काशी के अफसरों पर ‘बुल फाइटिंग’ का भूत जो चढ़ा है। इसके चलते मरने वालों की प्रगति चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही है।
कहावत है कि काशी में मरने वाले सीधे स्वर्ग जाते है, इसलिए अफसर आए दिन बाबा विश्वनाथ के दरबार में मन्नत मांगते नजर आते हैं कि ‘हे प्रभु, अगले जनम भी मुझे काशी ही भेजो।’ दूरदर्शी चाहता है कि अफसर खुद ‘बनारसी बुल फाइटिंग’ को अपनी आंख से देखें और झेलें। हो सकता है कि दूर से खड़े आग को देखते-देखते चिताओं का धुआं और तपन से इस घिनौने खेल की तासीर का पता चल जाए। कानून-व्यवस्था के बजाए ओडीएफ (शौचमुक्त गांव) को अहमियत देकर केंद्र से बड़ा ईनाम लेने का ख्वाब पालने वाले अफसर को भी शायद अक्ल आए कि ना-बाबा ना, यह तो हमें भी खाक कर देगा।
और अंत में...
गुजरते वक्त के साथ, इक दिन यूं ही गुजर जाएंगे।
करके कुछ आंखों को नम, दुनिया से रुखसत कर जाएंगे।
अफसरों की ‘बुल फाइटिंग’ का शौक तो पूरा होगा।
पर कुछ दिलों को यादें और हम सालों-साल याद आएंगे।।
0 दूरदर्शी

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