Tuesday, 13 December 2016

..तो क्या वाकई ऐसा हो रहा कप्तान साहब!


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साहब! वैसे नहीं हैं। ईमानदारी का व्रत लेकर आए हैं। जैसे हैं, वैसे ही बने रहेंगे। यह जुमला दूरदर्शी ने तब सुना था, जब बनारस के कप्तान साहब ने पदभार संभाला था। दूरदर्शी की आंखों में चमक उभरी थी और लगा था कि शायद पहली दफा यहां उस आदमी का आना हुआ है, जिसकी सालों से तलाश थी। लेकिन पता नहीं बनारस की हवा में ऐसी कौन सी मादकता है कि चंद दिनों बाद जिम्मेदारियां ऊंघने लगती हैं। सारा का सारा रुतबा बिजुका के मनिंद हवा में झूलने लगता है।
दूरदर्शी यह बात किसी सिद्धांत के तहत नहीं कह रहा है, बल्कि उसका अनुभव बोल रहा है। दरअसल यह बनारस की परंपरा रही है कि यहां जब कोई बड़ा पुलिस अफसर आता है तो आते ही चौके-छक्के जड़ने शुरू कर देता हैं। इस बार भी यही हुआ। कप्तान साहब बनारस आए तो ‘रामराज’ वाली हरकतें शुरू कर दी। कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए थानों ने अंगड़ाइयां लेनी शुरू कर दी। पुलिस के रोजनामचे ‘गुडवर्क’ से भरने लगे।
शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो जब पुलिस दो-चार बोतल शराब, आठ-दस पुड़िया चरस-हेरोइन, एक-दो तमंचों की बरामदगी न करती हो। कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता होगा जब एक-आधा दर्जन ‘छुटभैया’ किस्म के लोगों को बनारस पुलिस मेहमान न बनाती हो। हालांकि यह सिलसिला सालों से जारी है। हैरत की बात यह है कि बनारस के बड़े पुलिस कप्तान आज तक यह पता क्यों नहीं लगा पाए कि आखिर ये कौन लोग हैं, जो अवैध शराब और चरस बेचते हैं अथवा वे कौन लोग हैं जो अवैध हथियारों के सप्लायर हैं?
दूरदर्शी को लगता है कि पुलिस की इस धंधे में मिलीभगत है या फिर इतनी काहिल हो गई है कि पका-पकाया खाना ही जानती है, उद्यम करना नहीं। पुलिस गुडवर्क तो बना रही है, लेकिन पूछ की परछाई तक नहीं छू पा रही है। दरअसल पुलिस इन दिनों एक दूसरे काम में व्यस्त है। वह है वाहनों से वसूली। बेशर्मी तो यह है कि यह वसूली खुद नहीं करती। नौनिहाल करते हैं। शहर का शायद ही कोई इलाका होगा, जहां गाड़ियों से वसूली करते बच्चे न दिखते हों। मौके पर पुलिसकर्मी मौजूद होते हैं और बच्चे उगाही करके उनकी थैली भरते जाते हैं। कत्ल, चोरी, डकैती, तस्करी, छेड़खानी, गुंडागर्दी भले ही न रुक रही हो, लेकिन पुलिस का ‘खेल’ जारी है।
यह सच्चाई है कप्तान साहब! इन दिनों आपकी पुलिस सिर्फ विदूषक की तरह हवा में तलवारें भांजकर अपना जौहर दिखा रही है। असुरक्षा और अविश्वास का माहौल बनता जा रहा है पुलिस के खिलाफ। भई, कुछ तो करो अब, ताकि दूरदर्शी को भी लगे कि कुछ ठोस किया जा रहा है, इन सब माहौल के खिलाफ। यह कानाफूसी अब जोरों पर होने लगी है कि पुलिस सारा काम छोड़कर सिर्फ उगाही करने-कराने में जुटी है। आलस्य और नकारापन छिपाने के लिए खुद ही बड़ी तादाद में शराब-चरस मंगवाती है और लोगों को चरस, शराब व गांजे के साथ सींखचों में डाल देती है। पहले यजमानों से उगाही में बनारस के कुछ पंडे बदनाम थे और अब पुलिस, तो क्या वाकई ऐसा हो रहा है कप्तान साहब?
चलते-चलते
आप सत्यवादी हैं, विनोदी हैं, प्रशांत हैं, सुनयन हैं, सुंदर हैं, समाज को आनंद पहुंचाने का काम करते हैं, दीन-दुखियों के प्रति स्रेही हैं, भानु से आलोकित जग को सत्यपथ दिखाते हैं तो सावधान! पुलिस आपके पीछे है। पुलिस हमेशा अच्छे लोगों का पीछा करती है। दूरदर्शी यह नहीं कह रहा है कि आप पुलिस के डर से अच्छाई से तलाक ले लें।
दूरदर्शी चाहता है कि आप ‘हृदयेश’ बनें और गिरिराज पर विजय प्राप्त करें। कुलदीप नहीं, विश्वदीप बनें, लेकिन जरा पुलिस से बचकर रहें। यदि पुलिस को मालूम हो गया कि वाकई आप अच्छे हैं, तो गई भैंस पानी में। क्या यह परेशानी-हैरानी की बात नहीं है?
और अंत में
जैसे-जैसे ‘उनके’ चेहरों से हट रहे नकाब।
खतरनाक ईमानदारी के बादल छंट रहे जनाब।।
० दूरदर्शी

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