Tuesday, 13 December 2016

श्रीला गोकर्ण के चित्रों में रंग और ऋतुओं की नई वर्तनी


प्रकृति से परदा उठाते रंग----------
0 कमिश्नर नितिन गोकर्ण की पत्नी हैं श्रीला, जिनके डिजिटल चित्रों में घुली है प्रकृति 
विजय विनीत 
वाराणसी। ऋतुओं के बदलते, पतझड़-बसंत का संकेत देते, प्रकृति के रहस्य से परदा उठाते रंगों की अनगिनत बहुरंगी तानें और वातावरण के पल-पल बदलते मिजाज हैं श्रीला गोकर्ण के डिजिटल चित्रों की नई वर्तनी। इनके चटक रंगों में घुली प्रकृति में सिर्फ भारतीय ऋतुओं के नहीं, परंपराओं के भी दर्शन होते हैं। वह कल्पना का ऐसा संसार रचती हैं जिसमें न टूटन है और न तनाव है। चित्रों की शैली में रवानी है, मिठास है, रोशनी है और सुगंध है। रंगों का माधुर्य और सरलता इतनी संयत है कि वह सीधे दिलों में उतर जाती है।
न्यू मीडिया आर्ट के क्षेत्र में श्रीला गोकर्ण एक बड़ा नाम है। इसलिए नहीं कि वह बनारस के कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण की पत्नी हैं, उन्होंने डिजिटल आर्ट की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। वह मूलरूप से प्रोफेशनल और सिद्धहस्त इंटीरियर डिजाइनर हैं। लेकिन इन्होंने डिजिटल कला की एक नई शैली विकसित की है, जिसमें प्रकृति के तमाम रंग, आकार, लय-ताल के चटक रंग यथार्थ और स्वप्न के बीच लहराते नजर आते हैं। इनके चित्रों में पठनीयता के गुण इतने आसान हैं जो हर किसी को आकर्षित करते हैं। चित्रों में प्रकृति और जीवन की अनुकृति भी प्रकृति और जीवन से एक कदम आगे है।
श्रीला गोकर्ण ने कला को गढ़ा नहीं है, कला ने इन्हें गढ़ा है। कला की दुनिया का साज-संगीत इन्होंने अपनी मां से सीखा है। अब वह प्रकृति और जीवन दृश्यों की महक डिजिटल चित्रकला के माध्यम से कैनवस पर रच रही हैं। इनके चित्रों में शरद, बसंत, ग्रीष्म, वर्षा ही नहीं, जंगल और मंगल भी है। चित्र कहीं पतझड़ के और कहीं गर्मी आने का संकेत देते हैं तो कहीं ठंडी हवाओं का झोंका और चिड़ियों की चहचहाहट वातावरण को रंगीन बनाते हैं। गर्मी की ऊष्मा है तो फूलों का सुगंध और पत्तियों का निखार भी है। श्रीला के चित्र बारिश में घूमने और नंगे पांव पानी में चलने की सुखद अनुभूति का एहसास कराते हैं। जंगलों का वीरानापन कई बार मन को जीव-जंतुओं की दुनिया के करीब लाता है।
बनारस में पहली मर्तबा डिजिटल आर्ट की एकल प्रदर्शनी लगाकर श्रेया गोकर्ण ने कला प्रेमियों को यह बताने की कोशिश की है कि मनुष्य खुद एक सागर की तरह गहराई लिए होता है। डिजिटल कला भी रेगिस्तान की खामोशी को आवाज दे सकती है और अविनाशी काशी को रच सकती है।
श्रीमती गोकर्ण के चित्रों में प्रकृति के चटक रंग और कल्पना है। खुद को रंगों से जोड़ें तो नृत्य का भाव और स्वतंज महसूस करें तो ऊर्जा का संचार होगा। उत्सवी माहौल के साथ आनंद की अनुभूति का एहसास कराते हैं। श्रीला का मानना है कि डिजिटल-चित्रकारी में भी जलरंग, तैलरंग, लैंडस्केप, पोट्रेट, स्टिल-लाइफ, लाइफ स्टडी और एब्स्ट्रैक्ट, फोटोग्राफी आदि से अर्जित हुनर काम आते हैं। यह कला पुराने माध्यम व मान्यताओं को तोड़ रही है और कला-कर्म के प्रति सोच बदल रही है। लोग अब पुराने प्रतीकों, संयोजनों और आकारों से हटकर कुछ अलग देखना चाहते हैं। उस कला कर्म, सृजन का हिस्सा बनना चाहते हैं खोजना चाहते हैं कि इसमें मैं कहां हूं। इसे सिर्फ मशीनी प्रस्तुति नहीं कह सकते। डिजिटल कला-प्रयोगोन्मुखी होने के साथ ही विज्ञान और तकनीक से भी रूबरू कराती है।

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