Tuesday, 13 December 2016

जी हां! हम गंदे हैं, मनाइए अच्छे दिन का जश्न

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कुछ लोगों को शिकायत है कि अपना शहर बहुत गंदा है। तरक्की नहीं, गंदगी में नाम रौशन कर रहा है। दूरदर्शी को इस तरह की बातें कतई पसंद नहीं हैं। अगर शहर गंदा नहीं होता तो भारत में उसका शुमार टॉप डर्टी शहर में कैसे होता? स्मार्ट सिटी का खेल कैसे होता। लोग क्योटो और अच्छे दिन का ख्वाब कैसे देखते। जरा सोचिए कितना अच्छा लगता है जब आप सुबह लकालक कुर्ता अथवा पैंट-शर्ट पहनकर निकलते हैं और शाम को जब घर वापस आते हैं तो काली छींटदार शर्ट पहने होते हैं। मोहल्ले वाले जान ही नहीं पाते कि आपके पास कितनी कमीजें हैं। रहा पैंट का सवाल तो उसे साफ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। हां, यह जलन जरूर रहती है कि उसकी पैंट मेरी पैंट से कम गंदी कैसे...? लेकिन जिनकी कमीज छींटदार नहीं हो पाती, उन्हें गंदगी बहुत खलती है। जिन्हें खलती है, खलती रहे। दूरदर्शी का तो सीधा सा फंडा है-हम गंदे थे, गंदे हैं और गंदे रहेंगे।
पड़ोसी मगरू चचा सुबह नाक पर रुमाल लगाए मिले। मैं पूछ बैठा-क्या कोई बीमारी हो गई है? बोले, नालियों की बदबू से नाक दबाए हुए हूं। कागज पर सफाई हो गई है और नालियों कीचड़ भरा है। सड़कों पर गंदगी है। कूड़े के पहाड़ हैं। मैने मंगरू चचा को समझाया कि हमारे गंदे नगर निगम ने नालियां बनाई ही इसीलिए है कि कीचड़ बहे, उसमें कीचड़ भरे। जब नालियां बनाई जा रही थीं, तब सभी खुश थे। अब कीचड़ भरा है तो खल रहा है। नगर आयुक्त साहब... आप चिंता न कीजिए। शहर के लोगों को तो शिकायतें पालने का शौक चढ़ा हुआ है।
दूरदर्शी ने सुना है कि बेनिया में चाय की अड़ी पर रोजाना चर्चा होती है आजकल शहर में सड़क पर जानवर बहुत घूमते हैं। आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। पता नहीं लोग कैसे चलते हैं सड़क पर। दूरदर्शी को तो कहीं जानवर दिखते ही नहीं हैं। मान लें कि सड़क पर गाय-सांड घूम रहें हैं तो कौन सी आफत है। सांड़ तो काशी की पहचान हैं। जब आदमी मुंह उठाए हांफता-डांफता इधर-उधर घूम सकता है तो बेजुबान जानवरों के घूमने पर लोगों को एतराज क्यों हैं? नगर आयुक्त साहब आप लोगों को समझाइए कि कभी जानवरों की तरफ से तो यह आपत्ति नहीं आई कि सड़क पर आने-जाने वाले बहुत बढ़ गए हैं। लोगों को पास गाड़ियां भी बढ़ गई हैं। टैंपो वाले, रिक्शे वाले बढ़ गए हैं। जाम का झाम भी बढ़ गया है। दूरदर्शी का तो कहना है कि जैसे जानवरों के हृदय में हमारे लिए भाईचारे की भावना है, वैसी भावना हमारे हृदय में भी होनी चाहिए ताकि आदमी और जानवर का भेद मिट सके। सब एक-दूसरे को चाट सकें, सींघ मार सकें, गाहे-बहाहे पटककर सीने पर चढ़ सकें। दरअसल सड़क पर जगह की कमी नहीं हैं। हममें चलने की तमीज ही नहीं है।
गीलटबाजार के पत्रकारपुर में एक बुजुर्गवार पत्रकार इनदिनों कुछ ज्यादा ही खफा हैं कि सड़कें खुदी पड़ी हैं। मेनहोलों का मुंह बंद ही नहीं होता। कोई कूड़ा नहीं उठाता। आने दो वोट मांगने वाले सभासदों को। मुंह पर कीचड़ लगा दूंगा। उम्मीद थी कि सभासदगण जिंदगी और गंदगी में कुछ फर्क जरूर करेंगे, लेकिन जैसे होता आया है, वैसा ही हुआ। हमने जिसे वोट दिया जिंदगी उसके पास चली गई। हम लोगों के लिए वही पुरानी चिर-परिचित गंदगी रह गई। आपको भले ही गंदगी से परहेज हो,लेकिन दूरदर्शी को तो अब बिना गंदगी के नींद ही नहीं आती। बड़ी अजीब सी आदत हो गई है। सुबह से शाम तक कोई सभासद मिले अथवा बजबजाता कूड़े का ढेर। अगर इन दोनों में से किसी एक के दर्शन नहीं होते तो नींद ही नहीं आती। वैसे आपको बता दूं, आज तक ऐसी रात कोई नहीं बीती, जब नींद न आई हो। शहर में चहुंओर कूड़े का पहाड़ दिखता है और सभासद भी। इनदिनों तो हालत यह है कि सड़कों के खुद जाने से कदम-कदम पर कीचड़ है और हर चौराहे पर सभासद। चाहें कीचड़ देखकर सो जाएं, चाहे सभासद को देखकर।
गंदगी के छींटों से कमीज जब हसीन दिखती है।
बिन पिए जाम मन की महफिल मदहोश करती है।।
0 दूरदर्शी

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