Tuesday, 13 December 2016

कलक्टर साहब! बनारस का माहौल देखिए


इन दिनों-------
आदरणीय नए डीएम साहब उर्फ कलक्टर साहब उर्फ जिलाधिकारी महोदय, दूरदर्शी का सादर प्रणाम। हिन्दू भाइयों की ओर से राम-राम, मुसलमान भाइयों की ओर से सलाम वालेकुम, सिख भाइयों की ओर से सतश्री अकाल, इसाई भाइयों की ओर से गुड मार्निंग और जवान -जवानियों के मुख से कहें तो ‘हाय’ स्वीकार करें।
पिछले कुछ दिनों से सोच रहा था कि आपको पत्र उर्फ चिट्ठी उर्फ खत उर्फ लेटर लिखा जाए। लेकिन क्या करूं घर पहुंचने से पहले बीच रास्ते में मेरी बाइक का पेट्रोल खत्म हो गया। एक दिन पहले ही बीवी ने पेट्रोल के लिए पैसे दिए थे। हिदायत दी थी कि सौ रुपये से ज्यादा पेट्रोल खर्च नहीं मिलेगा..। पाकेट में जो पैसे थे, उससे सब्जी खरीद ली थी। लाचार होकर बाइक घसीटता हनुमान चालीसा का जाप करता और पसीने से तर-बतर घर लौट रहा था कि रास्ते में हमारे पड़ोसी मंगरू चचा मिल गए।
मुझे देखते ही फफक-फफककर रोने लगे। उनके हाथ से कनस्तर छूटकर गिर पड़ा। चचा ने कहा, तुम्हारी चाची जब स्टोव पर खाना बनाती थीं तब रोज मिट्टी के तेल के लिए मिसाइलें दागती थीं। जुगाड़ करके रसोई गैस लिया तो आफत और बढ़ गई। पता ही नहीं चलता कि उसमें कितनी गैस है और कितना ट्रालीमैन निकाल चुका है? अबकी चंद दिनों में रसोई गैस खत्म हो गई तो तुम्हारी चाची ने घर से बाहर कर दिया। साफ-साफ कह दिया कि बगैर गैस के घर के अंदर कदम मत रखना। पड़ोसियों से मिन्नत की। कहीं गैस नहीं मिली। अब कनस्तर लेकर केरोसिन लेने निकला हूं। पता नहीं, वह भी मिल पाएगा या नहीं?
कलक्टर साहब! यह कहानी अकेले मंगरू चचा की नहीं। और भी न जाने कितने मंगरू चचा हैं जो रसोई गैस की चोरी से बेहाल हैं। केरोसिन के लिए हर रोज अपनी बीवियों की फटकार सुनते हैं। आपसे अर्ज उर्फ मिन्नत उर्फ निवेदन उर्फ अनुरोध है कि जनता के घर की लड़ाई सड़क पर न आने दें। दूरदर्शी आपको बताना चाहता है कि पिछले कलक्टरों ने कई सालों से पेट्रोल पंपों पर न तो डीजल-पेट्रोल की मिलावटखोरी व चोरी रोकवाई और न ही रसोई गैस निकालने वाले ट्रालीमैनों अथवा गैस एजेंसी मालिकों पर शिकंजा कसा। अफसरों को ‘न्योछावर’ मिलता है और जनता बीवियों की फटकार सुनती रहती है।
आप आधुनिक तकनीक और जोश से लवरेज हैं, लेकिन यह जानकर आपको खुशी होगी कि काशी में ‘खुश’ होने अथवा खुश करने की परंपरा है। खुश होने के लिए लंबे-चौड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। कागजी योजनाएं बनानी पड़ती हैं। विकास के लंबे-चौड़े दावे किए जाते हैं। कोशिश करनी पड़ती है कि सीएम आंकड़ों को पढ़ें तो फूले न समाएं।
दूरदर्शी लोकतांत्रिक मूल्यों में भरोसा रखता है, इसलिए टाइम उर्फ वक्त उर्फ समय निकालकर कुछ रहस्य की बातें बता रहा है। अच्छी बात है कि गांवों की तरक्की और शहरों की खूबसूरती निखारने के लिए आपने भगीरथ प्रयास शुरू किया है, लेकिन बनारस में काम की परिभाषा दूसरी है। इसलिए आपको बताना उचित समझता हूं। बनारस की परंपरा रही है कि यहां विकास का काम कुछ संत-महात्मा टाइप लोग ही कराते हैं। उनकी काबिलियत को आपको नए सिरे से पढ़नी होगी। स्वार्थ का कूड़ा-करकट लेकर आपसे रोजाना सैकड़ों लोग मिलेंगे, लेकिन यहां ‘शरीफ’आदमी वही माना जाता है जो नजूल व सीलिंग की जमीन, काशी के सगरा तालाब जैसे ताल-पोखरे, फुटपाथ, गली और सड़Þक पर सम्मानजनक और डिलक्स ढंग से कब्जा करने में माहिर हो। बनारस में कुछ ‘शरीफ’ ऐसे भी हैं जिनके घर पर मर्डरर, बलात्कारी, भ्रष्ट पुलिसकर्मी, एनकाउंटर लिस्ट के बदमाशों और दलालों का जमघट लगता है। विश्वास कीजिए आपको अधिक परेशान होने की जरुरत नहीं है। बनारस के ‘शरीफों’ को आप पहले बारीकी और मासूमियत के साथ पढ़िए। हो सकता है कोई हल निकल जाए। दूरदर्शी को आप पर थोड़ा भरोसा है। वजह यह है कि बनारस में आप नए-नए आए हैं और आपका अंदाज कुछ नया है...।https://www.facebook.com/vijay.vineet.9/posts/1156613661043802

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