Tuesday, 13 December 2016

मोदी की काशी में पब्लिक का ‘नागिन डांस’!

मोदी की काशी में पब्लिक का ‘नागिन डांस’!

इन दिनों----
दूरदर्शी को काशी के रईस फक्कड़ साव और अपने पीएम नरेंद्र मोदी में काफी समानता दिखती है। अपने कारिदों की टोह लेनी होती थी तो फक्कड़ साव उनसे गिन्नी सुखवाते थे। बड़ी चतुराई से उनकी ईमानदारी परख लेते थे। बनारसी रईस गरीबों का स्वाभिमान न टूटे, इसके लिए जानबूझकर उनके कपड़ों पर पान की पीक मारते थे। बाद में सम्मानजनक ढंग से लाभ पहुंचाते थे। शायद यह उनका व्यापारिक व्यसन था। इन दिनों हुजूर को ‘बनारसी रईस’ बनने का हौल उठ रहा है। देश के राजा हैं, इसलिए फक्कड़ साव की तरह लोगों की ईमानदारी जांच रहे हैं। 
दूरदर्शी को याद है कि काशी के रइसों को दूसरों को देने की बात पहले और उसको लाभ के रूप में बदलने की बात बाद में सूझती थी। अंबानी-अडानी के ‘नाथ’ का नजरिया उल्टा है। इन्हें लेने की ज्यादा, देने की कम सूझ रही है। अमीरी-गरीबी का फर्क मिटाने के जुनून में हुजूर जनता को ‘तिगनी का नाच’ नचा रहे हैं। बैंकों के सामने कोई ‘एरियल डांस’ कर रहा है तो कोई ‘ठेठ नागिन’। 
काशी के भारतेंदु बाबू किसी स्त्री के इम्तिहान में पास होने पर साड़ियां भेजकर रईसी का परिचय देते थे। उदासी दूर करते थे और उनके चेहरों पर मुस्कान लाते थे। हुजूर ने तो एक झटके में देश भर की महिलाओं को रुला डाला। सबकी ईमानदारी का इम्तहान ले डाला। दिया तो कुछ नहीं, लेकिन ले लिया सब कुछ। घर चलाने के लिए नन्हे हाथों का गुल्लक भी तड़ा-तड़ फोड़वा डाला। 
हुजूर को जब से रईसी सूझी है तब से पड़ोसी मंगरू चचा बुक्का फाड़-फाड़कर रो रहे हैं। रोएं भी न तो हार्ट फेल होने का खतरा है। बेटी की शादी है इसलिए बड़े नोटों के बैन का साइड इफेक्ट इनके रोम-रोम में घुस गया है। इनका पोर-पोर दर्द कर रहा है। डा. एस.एस.गांगुली से लगायत डा.अजित सहगल तक चचा के बौराहट से परेशान हैं। करेंसी के कोरा कागज बन जाने से वह दिन-रात आंय-सांय बके जा रहे हैं। तर्क पर तर्क दे रहे हैं, हुजूर ईमानदार हैं तो बड़ी करेंसी बैन करने से पहले कई धनकुबेरों की पतलूनों में लंबे-चौड़े जेब सिलवाकर विदेश क्यों भेज दिया...? 
दूरदर्शी ने मंगरू चचा की बौराहट कम करने के लिए समझाया, ‘अपने देश में गेरुआ धन आंख दबाने से..., कपालभाति के स्वांग से... खूब फलता-फूलता है। पूरी तरह स्वदेशी। हवाला की तरह हानिकारक भी नहीं होता।’ कालेधन का भंडार है तो क्या हुआ? बाबा की दुकान से साबुन-आटा का स्टाक कीजिए या दवा-दारू। सुंदर दिखने के लिए ब्यूटी क्रीम रखिए या खिलखिलाकर हंसने वाला मंजन। पुरानी करेंसी के भी भाग्य जग जाएंगे। जो काला है, सफेद हो जाएगा। बस हुनर आनी चाहिए सियासत की..., कारोबार की..., तिकड़म की और जरुरत पड़ने पर औरतों का भेष बदलकर भागने की...। एक बार डंका बजा नहीं कि पूरी दुनिया सलाम करेगी।
काशी में कुछ रोज पहले तक जिन धन कुबेरों को देखकर बैंक वाले पहले दुम हिलाते थे, वे अब आंख दिखा रहे हैं। शक जता रहे हैं। नया फंडा समझा रहे हैं। ज्यादा दौलत मिलने पर जेल का खौफ दिखा रहे हैं। लोग-बाग हैं कि अपनी ही दौलत से परेशान हैं। डर इस बात का है कि कोई बैंक वाला यह न पूछ बैठे कि अकूत धन दबाकर बैठे क्यों थे? पहले दिया होता तो ‘टारगेट’ कम होने पर बैंक मैनेजर का डिमोशन तो रुक जाता...। 
करेंसी बैन होने से एक रोज पहले ही दूरदर्शी ने मंगरू चचा को बताया था कि काशी आदिकाल से व्यापारियों का गढ़ रही है। यहां रईस होना बड़प्पन समझा जाता था। काशी में रईसी का अर्थ धनकुबेरों से नहीं..., उनकी खचीर्ली आदतों से नहीं..., बल्कि रईस तबीयत से समझा जाता रहा है। अस्सी से लगायत भैसासुर घाट तक जितने मुहल्ले बसे हैं, उन्हें किसी न किसी धनकुबेर ने ही बसाया था। देश भर से तमाम राजा-महराजा यहां हुंडियों के साथ रोजगार करने आए थे। बनारस के रईस ईस्ट इंडिया कंपनी ही नहीं, ब्रितानी सरकार तक को लोन देते थे। राजा चेत सिंह ने बनारस के महाजनों से ‘लोन’ लेकर ही वारेन हेस्टिंग्स से अपनी हिफाजत की थी। 
काशी के रइसों को गारंटी-वारंटी पर नहीं, अपनी साख पर भरोसा रहा है। वे असहाय लोगों को ब्याज देकर न सिर्फ खर्च का इंतजाम करते थे, बल्कि मरने पर अंतिम संस्कार तक कराते थे। कुछ रोज पहले तक काशी के लोग फब्ती कसने से बाज नहीं आते थे, ‘चलो-चलो बड़का रईस बने हो...।’ हुजूर ने काशी की इस महान परंपरा और प्रसिद्धि का दीवाला ही पीट दिया। 
काशी के नए रईस जनता की हिफाजत की..., फेक करेंसी की..., हवाला कारोबारियों की... दुहाई देकर नोट बदलने के लिए गारंटी भी ले रहे हैं और गवाही भी। काशी के लोग बड़े नोट जमा करने के लिए रिरिया रहे हैं...। घर चलाने के लिए, रोटी का इंतजाम करने के लिए, हजार का नोट औने-पौने दाम में चला रहे हैं। 
हजार-पांच सौ के जो नोट पहले आंखों में चमक पैदा करते थे... लोगों की बांछें खिला देते थे...हाथों में खुजली का संकेत देते थे, वे कोरे कागज के मिथक भर रह गए हैं। मनहूस बन गए हैं। गुल्लक का चिल्लर भी उन्हें धमका रहा है। लोगों को उसे न तो थूकते बन रहा है, न निगलते। दूरदर्शी को लगता है कि देश की तरक्की के लिए..., हिफाजत के लिए... बदलाव जरूरी है। लेकिन बदलाव पहले ‘मानसिकता’ और ‘व्यवस्था’ की होनी चाहिए, मुद्रा की नहीं।
और अंत में...
करेंसी हो, कागज हो या फिर कोयला
काशी में यादें संजोने वाले कम नहीं।
चाहे तुम खंजर चला लो जितना हुजूर
यहां गम छुपाकर हंसने वाले कम नहीं। 
0 दूरदर्शी

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