Tuesday, 13 December 2016

अजूबा रोग है 'टिकटहिया'... चाहे तो रो लें, चाहे तो हंस लें

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इन दिनों----- 
शहर के डाक्टरों के लाख चाहने के बावजूद डायरिया रुक नहीं पा रहा है। ऊपर से बड़ी संख्या में लोगों को 'टिकटहिया' हो गया है। अपने शहर में डायरिया तो अफसरों और डाक्टरों की मेहरबानी से फैल रहा है। 'टिकटहिया' दिल्ली और लखनऊ की ओर से आ रहे वायरस की वजह से लोगों को जकड़ रहा है। डायरिया में जान जा भी सकती है और बच भी सकती है, लेकिन 'टिकटहिया' तो सौ फीसदी खतरनाक होती है। जहन्नुम में जाने तक छोड़ती ही नहीं। 'टिकटहिया' तो घर जंवाई की तरह है। इसका कीड़ा एक बार शरीर में घुसा नहीं कि लाख एहतियात बरतरने पर भी रोगी के प्राण संकट में रहते हैं। साथ ही मोहल्ले वालों के प्राण भी हवा में झूला करते हैं। दूरदर्शी चाहता है कि इस रोग की ज्यादा से ज्यादा चर्चा हो ताकि अपने शहर के लोग 'टिकटहिया' के लक्षण भी समझ लें और निदान का तरीका भी बूझ लें।
'टिकटहिया' के बारे में सुन-सुनकर मंगरू चचा के कान पक गए तो चाय पीने के बहाने घर आ धमके। दूरदर्शी बताओ, 'आखिर ये 'टिकटहिया' बला क्या है...? यह राजनीतिक बीमारी पकड़ती कैसे है...? 'टिकटहिया' पर लोग लाखों-करोड़ों रुपये क्यों न्योछावर कर देते हैं... ?' दूरदर्शी ने मंगरू चचा को समझाया कि 'टिकटहिया' वायरस का प्रकोप हर पांच साल में फड़फड़ाता है। कुछ राज्यों में यह बीमारी साल-दो साल में ही मचलने लगती है। डायरिया में पेट, पीलिया में लीवर खराब होता है, लेकिन 'टिकटहिया' में रोगी का दिमाग हमेशा के लिए खराब हो जाता है। दरअसल यह बीमारी ही ऐसी है कि इसका कीड़ा हर समय हलचल मचाता रहता है। दिल्ली या लखनऊ पहुंचने का हौल दिल में बार-बार उठता है। मन में खदबदाहट पैदा करता है। जिसे यह बीमारी लगती है उसे न तो भूख लगती है, न प्यास...न बीवी भाती है, न बच्चे...। उसे बस मोदी, मुलायम, माया, राहुल...वगैरह ही प्यारे, दुलारे और न्यारे लगते हैं। काशी में इन दिनों 'टिकटहिया' वारयरस का प्रकोप ज्यादा हो गया है। दूरदर्शी के एक साथी ने बताया कि 'टिकटहिया' दिलफेंक हसीना की तरह है। इस हसीना की 'नथ' उतारने के लिए शहर के एक सज्जन दो-तीन करोड़ रुपये की पुजैया करके लौटे हैं, तब उन्हें कामयाबी मिल पाई।
एक रोज मगरू चचा रास्ते में मिले तो दोबारा फिर सनसनाता हुआ सवाल दाग दिया, 'दूरदर्शी बताओ कि अपने शहर में 'टिकटहिया' के रोगी गली, चौराहों, पान की दुकानों और अपने परिजनों में जरूरत से ज्यादा बक-बक क्यों करते हैं... ?' दूरदर्शी ने मंगरू चचा को समझाया कि जिन लोगों के शरीर में 'टिकटहिया' के थोड़े भी वायरस भी घुस जाते हैं वह हिनहिनाने लगता है। दिन भर टिकट-टिकट ही चिल्लाता है..? ऐसे रोगियों को आप चाहे सिनेमा का टिकट लाकर दें या रेल-बस या सरकस का। रोगी टिकट-टिकट... चिल्लाना बंद नहीं करता। ऐसे रोगियों में एक अचरज की बात जरूर देखने को मिलती है कि वे अपने आकाओं के स्वागत-सत्कार में इस तरह बिछते हैं, जैसे वे अपनी बेटी अथवा बहन की शादी कर रहे हों...। आकाओं का फरमान मिलते ही बनारस से दिल्ली और लखनऊ की ओर तो ऐसे भागते हैं जैसे कई दिनों का भूखा रोटी के लिए भागता है। काशी में 'टिकटहिया' का प्रकोप कुछ ज्यादा ही है। हर गली और हर चौराहे के नुक्कड़ पर ऐसे लोगों को देखा और परखा जा सकता है जिनके अंदर हर समय इस खतरनाक बीमारी के कीड़े कुलबुलाते नजर आते हैं। 'टिकटहिया' पीड़ितों से मिलकर आप हंस सकते हैं....रो सकते हैं...।
दूरदर्शी मानता है कि जिन लोगों के अंदर 'टिकटहिया' का कीड़ा घुस जाता है वे चाहे जितना भी भागें, थकते ही नहीं...। चाहे जितना भी चिल्लाएं गला बैठता ही नहीं...। चाहे जितना भी बेइज्जत किया जाए, बुरा मानते ही नहीं...। ये रोगी इतने 'थेथर' हो जाते हैं कि इनके आगे एड्स भी शरमाता है। अपने शहर में इन दिनों ऐसे रोगी ज्यादा हैं जो टिकट पाने से ज्यादा कटवाने के चक्कर में बकबका रहे हैं। कोई झंडा-होर्डिंग फुंकवा रहा है तो कोई बैनर...।
दूरदर्शी अपने शहर के लोगों को फोकट में सलाह देना चाहता है कि अगर आपके आसपास किसी को 'टिकटहिया' हो गया हो तो कतई परेशान न हों। यह एक समयबद्ध बीमारी है। यह तभी तक रहती है जब तक सभी राजनीतिक दल टिकट बांट नहीं देते। सांसदी-विधायकी का टिकट मिलने पर कुछ इस बीमारी को लेकर दिल्ली अथवा लखनऊ उड़ जाते हैं। बाकी बगैर इलाज के हौले-हौले ठीक हो जाते हैं। जिस तरह बारिश के दिनों में डायरिया फड़कता है उसी तरह चुनावी सीजन में 'टिकटहिया' का ज्वार उठता है। तभी दिमाग में बैठे इसके शांत कीड़े दोबारा रेंगने शुरू कर देते हैं।
काशी के लोग इस बीमारी को कतई हल्के में न लें। विधायकी का चुनाव अगले साल होना है, मगर बयार अभी से बह रही है। जिनके अंदर 'टिकटहिया' का कीड़ा घुस चुका है उसके प्रति नरमी दिखाएं। प्यार करें, दुलराएं अथवा सहानुभूति रखें। सबसे पहले रोगी की हरकत परखें। देखें कि हरकत कमलनुमा है या पंजानुमा। हाथीनुमा अथवा सायकिलनुमा भी हो सकती है। रोगी निर्दल की तरह भी हिनहिना सकता है। हैंडपाइप की तरह 'चपाचप'और लालटेन की तरह 'भभक' सकता है। रात में सोते-सोते हंसना, चिल्लाना, ताली बजाना, जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने के लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं। गंभीर रोगी ऊंघते-ऊंघते भी भाषण देने लग सकते हैं। कभी-कभी वह पागलों की तरह हरकत भी कर सकता है।
प्लीज! ऐसे रोगियों को पांडेयपुर के पागलखाने में न ले जाएं। उसका पूरा भाषण शिद्दत से सुनें। अगर कुछ अच्छा लगे तो ताली बजाएं...। हौसला बढ़ाएं...। घर में फूलमाला हो तो रोगी को पहना दें...। 'टिकटहिया' पीड़ित मरीज की हरकत चाहे जैसे भी हो, सिर्फ एक ही दवा कारगर होती है। रोगी से मिलते ही नमस्ते-बंदगी करें और थोक में वोट दिलाने के लिए आश्वासन की घुट्टी पिलाएं...। आप देखेंगे कि थोड़ी देर में ही मरीज अपना भाषण खत्म कर देगा। आपको दुआएं देगा। गरीबों को साड़ी, दारू, पैसा, झुमका, नथिया...कुछ भी बांट देगा। यह बात दीगर है कि लखनऊ अथवा दिल्ली पहुंचने के बाद इतनी गहरी नींद में सो जाएगा कि आप पूरे पांच साल तक ढूंढते रह जाएंगे...। काशी के लोगों को बताना बेहद जरूरी है कि यह 'टिकटहिया' ही तो है, जिसकी वजह से देश के चुनिंदा पागलों ने अपने शहर को शानदार ढंग से बर्बाद और जानदार ढंग से तबाह किया है। इसी बीमारी का असर है कि भगवान इंद्र तनिक भी मेहरबान होते हैं तो बाबा भोले की नगरी अथाह और विशाल समुद्र सरीखी नजर आने लगती है।
पुछल्ला....
एक नेता ने अपने नालायक बेटे को समझाते हुए कहा-राजनीति में आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता। यह सदाबहार होती है। हिन्दुस्तानी बीवी भी कभी-कभी अपने बुजुर्ग पति से कन्नी काटने लगती है, लेकिन राजनीति एक ऐसी 'बाला' है जिसे बुजुर्ग ही दिलकश लगते हैं। हालांकि इन दिनों राजनीति को उम्र का बंधन पसंद नहीं है। राजनीति में घुसकर लोग चंगे रहते हैं और नजरें जवान। इसीलिए वे हर तरफ देखते ही रहते हैं। इन्हीं के लिए एक शायर ने कहा है-
हमेशा नजरें मिलाता हूं मैं हसीनों से।
इसलिए नहीं लगती मेरी निगाह को जंग।।
0 दूरदर्शी

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