Tuesday, 13 December 2016

बाबा की नगरी में मोक्ष की तमन्नाः गिरिजा देवी

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'ठुमरी की रानी' पद्मविभूषण गिरिजा देवी को दुनिया में भला कौन नहीं जानता। 'बनारस घराने' की अदायगी का विशिष्ट माधुर्य इनकी खनकती आवाज में आज भी मौजूद है। सालों बाद मुलाकात हुई तो लगा कि शास्त्रीय संगीत के प्रति उनका जुनून तनिक भी कम नहीं हुआ है। इनकी कंठ का जादू आज भी हर किसी को तालियां बजाने पर विवश कर देता है। चाहे वह शास्त्रीय संगीत का महारथी हो अथवा अनपढ़। ठुमरी ही नहीं, होरी, कजरी, झूला, दादरा, भजन और चैती में बनारस का खास लहजा और विशुद्धता का पुट इनके गायन में विशेष आकर्षण पैदा करता है। 
गिरिजा देवी काशी को जन्नत मानती हैं। इन्हें समूची दुनिया से न्योता मिलता है, लेकिन काशी को छोड़ इनका दिल कहीं नहीं लगता। कहती हैं कि दुनिया में सबसे सस्ती चीज है, पैसा। मुझे टाटा-बिड़ला नहीं बनना। मेरा बस एक सपना है कि काशी की सिद्धपीठमें संगीतकारों के लिए बने कलाधाम। काशी ने मुझे प्रसिद्धि दी है और चाहती हूं कि मोक्ष भी बाबा की नगरी में ही मिले। वह शास्त्रीय संगीत के कलाकारों को यह संदेश देना चाहती हैं कि संगीत की विधा कोई भी हो, रियाज करें तो डूबकर करें, सुकून से करें। शार्टकट रास्ते से चलने वाले जिस रफ्तार से ऊपर पहुंचते हैं, उससे कई गुना तेज रफ्तार से नीचे आते हैं। आज भी कोशिश होती है कि मेरी हर रचना खूबसूरत हो। प्रबुद्ध समाज को दिशा दे। अध्यात्म का, साहित्य का और तरक्की का.....।

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