Thursday, 31 March 2016

टूटनी चाहिए यह अश्लील और भौड़ी परंपरा

टूटनी चाहिए यह अश्लील और भौड़ी परंपरा

काशी के टाउनहाल मैदान में होली पर हर साल आयोजित होने वाले तथाकथित कवि
टाउनहाल मैदान में अश्लील कवि  सम्मेलन में मगन दिलफेक श्रोता
सम्मेलन पर मेरा नजरिया यह है कि भौंडी और अश्लील परंपरा टूटनी चाहिए। अनूठी संस्कृति परोशने की शान बघारने वालों को बदलना चाहिए इसका घटिया स्वरूप। कवि सम्मेलन के आयोजक गालियों को काशी की संस्कृति से जोड़ते हैं। लेकिन मुझे इस परंपरा में पुरुषवादी सोच की अभिव्यक्ति नजर आती है। इस साल सम्मेलन के मंच से स्त्रियों के प्रजनन अंगों को खूब निशाना बनाया गया। मुझे लगता है कि काशी में कुंठित लोगों की बड़ी जमात है, जो अपनी बेटियों को शाम पांच बजे के बाद घरों में कैद होने पर विवश कर देते हैं, लेकिन बेटों को छुट्टा सांड़ की तरह शहर में विचरण करने के लिए छोड़ देते हैं। सालों साल से यह सिलसिला चल रहा है। स्त्री के मामले में पुरुष दूसरे पुरुष के प्रति संदेह और भय से भरा हुआ है। इसका खामियाज स्त्री भुगत रही है। कहीं पिता के घर में. कहीं पति के घर में। दोनो जगह कैद है।
सच यह है कि जिस समाज में स्त्री को जितनी अधिक आजादी मिली है उसने अपने यौन व्यवहार से पुरुषों की सामंती सोच को तोड़ा है। पूंजीवादी समाज में सहवास के मिथक टूटते जा रहे हैं। स्त्री के यौनांगों पर हमला करने वाले काशी के टाउनहाल के तथाकथित कवि और रसिक दर्शक किसी महिला के कौमार्य भंग होने पर उसे किसी सम्मानित पुरुष के काबिल मानने का एलान करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाते? मुस्लिम समाज तो दूर, काशी के तथाकथित प्रगतिशाली हिन्दू भी औरतों को मर्दों की बराबरी का अधिकार देने के पक्षधर नहीं दिखते? किचन और बेडरूम से बाहर दिखने वाली स्त्री बेशर्म और छिनाल क्यों मानी जाने लगती है? पुरुष के यौनाचार को इज्जत के बजाए मर्दानगी से क्यों जोड़ा जाता है? काशी में अधिकतर गालियां मां-बहनों को लेकर क्यों गढ़ी गई हैं?
काशी में इन्हीं गालियों के ज़रिये पुरुष समाज स्त्री के प्रजननांगों को अपनी विकृत मानसिकता और हिंसा का निशाना बना रहा है। 23 मार्च की शाम टाउनहाल के मंच से संचालक बद्री विशाल ने गालियों पर गढ़ी अपनी पैरोडी में स्त्री के प्रजनन अंगों पर तीखा प्रहार किया। इनके उकसाने पर दूसरे तथाकथित कवियों ने महिलाओं के जननांगों को लक्ष्य बनाकर गालियों की बौछार की। लगभग सभी ने आदमी के लिंगों का इस तरह से स्मरण कराने की कोशिश की जैसे औरत का कोई वजूद ही न हो। लगता है स्त्री के दर्द और मर्म को सुनने-समझने का रिवाज काशी में है ही नहीं। यदि स्त्री अपनी हकीकत बताने पर उतारू हो जाए तो होली पर टाउनहाल खाली नजर आएगा। मानता हूं कि काशी में स्त्रियां भी गालियां देती हैं। मगर इस जमात में वे ही स्त्रियां शामिल हैं जो पुरुषवादी सोच की चाशनी में लिपटी होती हैं और पुरुषों की गुलामी करती हैं। जिस समाज में स्त्रियों को पुरुषों की तरह आजादी है, वे स्त्रियां पुरुषवादी सोच के तहत गालियां नहीं देतीं।
लगता है कि काशी में नैतिकता और अनैतिकता का हथियार सिर्फ पुरुषों के पास है। उसे स्त्रियों के जननांगों पर पैरोड़ी बनाने की आजादी है, लेकिन अपने घरों की स्त्रियों को आजादी न देने की कुंठा कूट-कूटकर भरी है। कुलीन वर्ग में शामिल होने के लिए बेचैन मध्यवर्गीय समाज में पाखंड सबसे ज्यादा है। महिलाओं पर अत्याचार, अनाचार और दबाव है तो इसी वर्ग में।ज्यादातर लोगों ने अपने घरों की महिलाओं के लिए आदर्शों की हदबंदी बना रखी है। यूं कहा जा सकता है कि काशी का एक बड़ा समाज महिलाओं को घरों में कैद करके रखना चाहता है और खुद घरों से बाहर जाकर गुलछर्रे उड़ाने में तनिक भी संकोच नहीं करता। इन्हें भोजपुरी के दोअर्थी और अश्लील गानें और टाउनहाल के भौड़े सम्मेलन भाते हैं, लेकिन अपनी बेटियों की आजादी के सवाल पर कुंठा और खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं। अश्लीलता की संस्कृति परोशने के बजाए काव्य साधकों को वैचारिक और नैतिक मानदंडों पर भी खरा उतरना होगा। आखिर गाली के बहाने स्त्रियों के जननांगों पर हमला कहां तक उचित है? मेरा मानना है कि राजनीतिक और सामाजिक बुराइयों पर हमला करने के बहाने महिलाओं के जननांगों पर आधारित फूहड़ गालियां परोशने का सिलसिला बंद होना चाहिए।

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